Sanjaya Kumar Singh
चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार की कारगुजारियों पर इंडियन एक्सप्रेस की कल की रिपोर्ट के बाद एक और बात गौरतलब है. आपने पढ़ा होगा कि भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी के साथ तीन चुनाव आयुक्तों में से एक, सुखबीर सिंह संधू को भी नोटिस भेजा गया है. अगर यह औपचारिकता भी है तो हास्यास्पद है. तुर्रा यह कि भारत सरकार के खर्च पर आम नागरिकों के खिलाफ भी किया जा रहा है. इसमें लाखों लोग मताधिकार से वंचित रह गए. बंगाल में सरकार भी बदल गई लेकिन सब चंगा सी क्योंकि कई नंगे हैं.
नंगों पर फिर कभी. अभी तो यह कि एसआइआर में 2002 की मतदाता सूची से मैपिंग जरूरी है. यही हो रहा है, होने दिया जा रहा है और इसमें लाखों फूंके जा रहे हैं, नागरिकों को परेशान किया जा रहा है सो अलग. अगर तीन चुनाव आयुक्तों में से एक और सत्तारूढ़ दल के मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों में एक भारत रत्न, लाल कृष्ण आडवाणी को भी अपना मामला साबित करना है तो इस 'कार्य' की जरूरत या व्यर्थता को समझा जा सकता है. दुर्भाग्य कि यह सब सुप्रीम कोर्ट या भारत के मुख्य न्यायाधीश की जानकारी में हो रहा है.
भारत के सॉलिसीटर जनरल सुप्रीम कोर्ट में कह चुके हैं, "कानून का निर्माण नक्सलियों के विचारों के हिसाब से नहीं हो सकता.” कल सुप्रीम कोर्ट में मेधा रूपम के मामले में जो हुआ वह यही है कि कानून (या संविधान) का अनुपालन संघ के विचारों से हो सकता है. चुनाव आयोग जैसे चल रहा है उसका खुलासा कल के इंडियन एक्सप्रेस में हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ बताया जा चुका है, कल जो खुलासे हुए उसका अंदेशा जताने वाली कई खबरें हैं. बंगाल में कई शिकायतें थीं फिर भी कुछ नहीं हुआ तो चुनाव आयोग भी संघ के विचारों के हिसाब से चल रहा है.
फिर भी, लाल कृष्ण आडावाणी का मामला मैपिंग में फंस गया तो उसका कारण है. मैपिंग में देखा जाता है कि 2002 में माता-पिता मतदाता थे कि नहीं. कायदे से उम्रदराज लोगों के मामले में देखा जाना चाहिए कि वह खुद मतदाता था कि नहीं और कब से है. लाल कृष्ण आडवाणी के मामले में तो सब कुछ सार्वजनिक है फिर भी बहुत सारे उम्रदराज लोगों का नाम कट गया है और कारण यही लगता है कि उनका नाम तो होगा लेकिन उनके पिता का नहीं होगा. इसलिए लाल कृष्ण आडवाणी के बेटे का नाम है.
बेसिरपैर की इस मनमानी और जबरदस्ती में एक और चीज दिलचस्प है. क्या भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार उन्हीं की परिभाषा और परीक्षण से भारत के नागरिक हैं? तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य साकेत गोखले के अनुसार दिल्ली के ड्राफ्ट एसआईआर वोटर लिस्ट में, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को एक वोटर के तौर पर दिखाया गया है. वे सुबोध कुमार के बेटे, ज्ञानेश कुमार के नाम से रजिस्टर्ड हैं. तथ्य है कि अगर किसी व्यक्ति का नाम 2002/2003 की पिछली एसआईआर लिस्ट से मैच नहीं होता है, तो उसे "लॉजिकल गड़बड़ी" (logical discrepancy) माना जाता है और उन्हें नोटिस भेजा जाता है.
सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध रिकार्ड के अनुसार, ज्ञानेश कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था, वे केरल कैडर के आइएएस ऑफिसर हैं और दिल्ली में भी पोस्टिंग कर चुके हैं. इसलिए उन्होंने इन तीन राज्यों की पिछली एसआईआर लिस्ट में "सुबोध कुमार के बेटे, ज्ञानेश कुमार" को खोजा.
हैरानी की बात है कि तीनों राज्यों में पिछली एसआईआर लिस्ट में "सुबोध कुमार के बेटे, ज्ञानेश कुमार" के नाम से कोई भी व्यक्ति रजिस्टर्ड नहीं है. अगर पिछली एसआईआर में ऐसी कोई एंट्री नहीं है, तो वोटर लिस्ट में उनके मौजूदा नाम को "लॉजिकल गड़बड़ी" माना जाना चाहिए और उन्हें नोटिस मिलना चाहिए था.
साकेत गोखले कई दिनों से पूछ रहे हैं, क्या ECI कृपया स्पष्ट कर सकता है
- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम किस राज्य की पिछली SIR लिस्ट में है?
- क्या ज्ञानेश कुमार 2002/2023 में रजिस्टर्ड वोटर थे?
- अगर केरल, दिल्ली और UP की पिछली SIR लिस्ट में उनका नाम नहीं है, तो मौजूदा वोटर लिस्ट में उनका नाम कैसे है?
- क्या ज्ञानेश कुमार को "लॉजिकल गड़बड़ी" और "अनमैप्ड वोटर" (unmapped voter) होने के लिए कोई नोटिस मिला है?
साफ जानकारी देने के लिए पहले से ही धन्यवाद. देश को यह पता होना चाहिए.
डिस्क्लेमरः लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया से साभार लिया गया है.
