Abhilasha Shahdeo
झारखंड आंदोलन के प्रमुख स्तंभ, प्रखर न्यायविद और सामाजिक न्याय के पक्षधर जस्टिस लाल पिंगला नाथ शाहदेव की आज 14वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है. यह अवसर न केवल उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का है, बल्कि उस संघर्ष, दूरदृष्टि और प्रतिबद्धता को स्मरण करने का भी है, जिन्होंने झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई.
उनका नाम झारखंड आंदोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है. झारखंडवासी उनका योगदान कभी नहीं भुला सकते. जस्टिस एलपीएन शाहदेव झारखंड अलग राज्य की निर्णायक लड़ाई के एक अहम नायक थे. जस्टिस एलपीएन शाहदेव ने अपने जीवन में न्याय, संघर्ष और सेवा को समान महत्व दिया. वे ऐसे विरले व्यक्तित्व थे, जिन्होंने न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखते हुए जनआंदोलन का नेतृत्व किया और न्याय, संघर्ष व सेवा को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाया.

झारखंड आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका
जस्टिस एलपीएन शाहदेव का नाम झारखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है. न्यायिक सेवा में रहते हुए भी उन्होंने आंदोलन को वैचारिक, नैतिक और संवैधानिक मजबूती प्रदान की.1998–99 के दौर में, जब अलग झारखंड राज्य की मांग अपने निर्णायक मोड़ पर थी और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने “झारखंड मेरी लाश पर बनेगा” जैसा बयान दिया था, तब 16 राजनीतिक दल पहली बार एकजुट होकर अलग राज्य के समर्थन में एक मंच पर आए.
इसी क्रम में एक सर्वदलीय झारखंड अलग राज्य निर्माण समिति का गठन किया गया. इस समिति की कमान जस्टिस एलपीएन शाहदेव को सौंपी गई और उन्हें संयोजक बनाया गया. उनके नेतृत्व में आंदोलन को नई धार मिली. 21 सितंबर 1998 को झारखंड बंद का नेतृत्व करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया गया. यह देश के इतिहास में पहली बार था, जब किसी उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को जनआंदोलन के दौरान गिरफ्तार किया गया हो.
जस्टिस शाहदेव की गिरफ्तारी ने झारखंड आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई और राज्य निर्माण की मांग को और मजबूती प्रदान की. उनके अदम्य साहस, दूरदृष्टि और नेतृत्व का ही परिणाम था कि वर्ष 2000 में झारखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया. झारखंड की निर्णायक लड़ाई के नायक के रूप में जस्टिस एलपीएन शाहदेव का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा.

प्रारंभिक जीवन और न्यायिक सफर
जस्टिस लाल पिंगला नाथ शाहदेव के प्रारंभिक जीवन और न्यायिक सफर की बात करें तो उनका जन्म 3 जनवरी 1930 को बिहार-ओड़िशा प्रांत (वर्तमान में झारखंड) के लातेहार जिले के कामता गांव में नागवंशी शाही परिवार में हुआ था. श्री शाहदेव ने प्रारंभिक शिक्षा सरकारी विद्यालय से प्राप्त की. उन्होंने रांची के बालकृष्ण हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की. रांची कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1954 में लॉ की शिक्षा प्राप्त की.
वर्ष1958 में उन्होंने पहली ही बार में पब्लिक सर्विस परीक्षा पास की और न्यायिक सेवा में प्रवेश किया. उनकी पहली पोस्टिंग हजारीबाग में मुंसिफ के रूप में हुई थी. जस्टिस शाहदेव अपनी निष्पक्षता और विद्वता के बल पर 1989 में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने. इसके बाद 1986 में वे पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त हुए.
वे झारखंड के पहले व्यक्ति थे, जो हाईकोर्ट में न्यायाधीश बने. 1992 तक पटना हाईकोर्ट की रांची बेंच में अपनी सेवा देने के बाद वे 1993 में सेवानिवृत्त (रिटायर) हुए. जस्टिस शाहदेव को झारखंड के पहले मूलवासी न्यायाधीश के रूप में भी जाना जाता है. उनके फैसलों में संवेदनशीलता, मानवीय मूल्यों और सामाजिक न्याय की स्पष्ट झलक मिलती थी, जिससे वे आम जनता के बीच अत्यंत सम्मानित बने.

शिक्षा सुधार में अहम योगदान
सेवानिवृत्ति के बाद जस्टिस शाहदेव ने शिक्षा सुधार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अगस्त 2005 में गठित झारखंड एजुकेशन ट्रिब्यूनल (जेईटी) के वे पहले चेयरमैन बने. इस दौरान उन्होंने निजी और सरकारी स्कूलों में व्याप्त अनियमितताओं पर सख्त रुख अपनाया.
उन्होंने शिक्षा के व्यवसायीकरण पर अंकुश लगाने, शिक्षकों और छात्रों के शोषण को रोकने और फीस संरचना को पारदर्शी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण आदेश दिए. इनमें स्कूल बसों में ओवरलोडिंग पर रोक, कक्षा 1 से 4 तक लाइब्रेरी और कंप्यूटर शुल्क पर प्रतिबंध और शिक्षकों को चेक के माध्यम से वेतन भुगतान का निर्देश शामिल हैं.
उनके कार्यकाल में ट्रिब्यूनल ने 58 से अधिक मामलों का निपटारा किया और जिलाधिकारियों तथा स्कूल प्राचार्यों की समितियां गठित कर शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित की. इससे झारखंड की शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ी और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को राहत मिली.

विरासत और स्मृति
जस्टिस लाल पिंगला नाथ शाहदेव का जीवन न्याय, संघर्ष और जनसेवा की जीवंत मिसाल है. उन्होंने अपने पद और प्रतिष्ठा का उपयोग समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए किया. राजधानी रांची में एक प्रमुख चौक का नामकरण उनके सम्मान में किया गया है, जो उनकी स्मृतियों को जीवंत बनाए रखता है.
उनकी पुण्यतिथि पर राज्य उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करता है और उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लेता है. जस्टिस एलपीएन शाहदेव की विरासत झारखंड के विकास, न्याय और सामाजिक चेतना में सदैव जीवित रहेगी.
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