
बैजनाथ मिश्र
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया है. यह उन्होंने अनजाने या भूलवश नहीं किया है. उन्होंने ऐसा इरादतन और किंचित शरारतन किया है. शरारतन इसलिए कि उन्होंने एक ऐसी सत्ता को चुनौती है जो अंग्रेजों के मानस पुत्रों की है. उस सत्ता के मेंबरान की रगों में लाल नहीं, नीला खून दौड़ता है. ये वे लोग हैं जो सिस्टम के अंग हैं या रहे हैं. सरकार किसी की भी हो, फैसले उनके इशारों या मर्जी के हिसाब से होते हैं. ये सब रसूखदार हैं, ओहदेदार हैं, अमीरजादे और रईसजादे हैं. इनके बाप-दादे-परदादे अंग्रेजों के हुक्म बजाया करते थे और उनकी शान में राग दरबारी गाया करते थे. उनकी अय्याशियों का इंतजाम करते थे. हिंदुस्तानियों को उनकी फौज में भर्ती कराते थे.
ये वे लोग हैं जो आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवा देते हैं. नीतियां सरकारें भले ही बनायें, उन्हें लागू करने या अटकाने-भटकाने-लटकाने का काम यही करते है. ये देश की भीतरी और बाहरी सुरक्षा के भी रखवाले हैं या रहे हैं. विदेशी मामलों और दूसरे देशों से रिश्तों की दशा-दिशा भी यही लोग तय करते हैं. बात कयामत की हो या देश की हिफाजत या अमानत की, इनके ही जलवों की बात है. इनकी महफिलें जहां सजती हैं, वहां भारतीय और कुत्तों का प्रवेश वर्जित था. अब वह बोर्ड तो नहीं लगता है, लेकिन परिपाटी वही है.
लार्ड मैकाले को ऐसे हिन्दुस्तानियों की जरूरत थी जो दिल-दिमाग से अंग्रेज हों. यह जमात वही है. ये माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम भी हैं. इनकी ऐशगाहें तो देश भर में हैं, लेकिन उनमें से सबसे खास है दिल्ली का जिमखाना क्लब. यह सत्ताईस एकड़ में फैला है. जिमखाना का मतलब कसरत करने की जगह. यहां कसरत कम, शराब-कवाब और शवाब की मस्ती में फितरत ज्यादा होती है. इसे अंग्रेजों ने बनाया था अपने लिए. इसमें पैसा लगा था अंग्रेजों के चमचे रजवाड़ों का. खून-पसीना लगा था हिंदुस्तानी मजदूरों और कारीगरों का. अंग्रेजों के जाने के बाद यह हमारे देसी अंग्रेजों के हाथों में हैं. 1928 से बाकायदा शुरु हुआ यह जिमखाना आज भी बेकायदा ही सही लेकिन चालू है.
इसकी मेंबरी स्टेटस सिम्बल है. यह दिल्ली के दिल यानी लुटियन जोन में स्थित है. इसकी अभिज्यात्यता और कुरीतियों के खिलाफ आवाजें तो गाहे-बगाहे उठती रही हैं. लेकिन अब केंद्र सरकार ने इसे खाली कराने का नोटिस थमा दिया है. नोटिस में बताया गया है कि सुरक्षा और सैन्य अधिष्ठानों की स्थापना के लिए इस जगह की जरूरत आन पड़ी है. वैसे भी यह जगह प्रधानमंत्री आवास से सटी हुई है. इतना बड़ा फैसला प्रधानमंत्री की इजाजत या मर्जी के बगैर हो ही नहीं सकता. इसीलिए कहा जा रहा है कि सरकार ने देश की सबसे मजबूत लॉबी के खिलाफ एक तरह से एलान-ए-जंग कर दिया है. तो इस जंग से होनेवाले नफा-नुकसान का भी अनुमान लगाया ही गया होगा.
अब तक इस सरकार ने अंग्रेजों की कई निशानियां मिटा दी है, लेकिन यह निशानी न सिर्फ बिल्डिंग है, बल्कि सत्ता की नस-नस से वाकिफ लोगों की हैसियत भी है. इसलिए सरकार का नोटिस मिलते ही सामूहिक भनभनाहट शुरु हो गयी है और मामला हाई कोर्ट पहुंच गया. कोर्ट ने कोई स्टे ऑर्डर तो नहीं दिया, लेकिन सरकार को आठ हफ्ते में जवाब दाखिल करने का नोटिस दे दिया. सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि लाठी के बूते यह जगह खाली कराने की कोई मंशा नहीं है. हालांकि सरकार चाहे तो इस जगह पर बलपूर्वक कब्जा कर सकती है, क्योंकि इसका मालिकाना हक उसके पास है. वह जब चाहे जिमखाना की लीज खत्म कर सकती है. यह तो लीज एग्रीमेंट में ही लिखा है.
यह क्लब रेंट भी देता है सिर्फ एक हजार रुपया महीना जबकि मेंबरशिप फी लाखों में है. जहां तक जगह खाली करने के लिए सुरक्षा कारणों को स्पष्ट करने की बात है, सरकार कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है, ना ही कोर्ट इसके लिए बाध्य कर सकता है. खबर यह भी है कि क्लब पर सरकार का अभी 50 करोड़ बकाया है. इस क्लब की मेंबरी के लिए प्रतीक्षा सूची लंबी है. इसमें पच्चीस-तीस साल तक लग जाते हैं. अलबत्ता पहले से मेंबर बने लोग अपने बेटे-पोते को आनन-फानन मेंबरी दिला देते हैं. इसके सदस्यों में चालीस फीसदी सेना, चालीस फीसदी आइएएस, आईपीएस, आईएफएस आदि और बीस फीसदी अन्य व कुछ नेता शामिल हैं.
बहरहाल सरकार के नोटिस के बाद क्लब समर्थकों का तर्क अजीबोगरीब है. कोई कह रहा है कि यह एक हेरिटेज है जिसका संरक्षण जरूरी है. लेकिन ऐसे लोग यह नहीं बता पा रहे हैं कि यह हेरिटेज है कैसे? सस्ती शराब और सस्ता खाना हेरिटेज कैसे है? यह तो "माल महाराज का मिर्जा खेलें होरी" जैसा है. कुछ खीझ में कह रहे हैं कि अगर सरकार को गरीबों की चिंता है तो यहां गरीब आवास बना दे, गोशाला बनवा दे या फिर आवारा कुत्तों के लिए आश्रय स्थल. आश्चर्य यह है कि शोषितों, वंचितों के लिए हमेशा मुखर रहने वाले बुद्धिजीवी नपुंसक चुप्पी ओढ़े हुए हैं. इसका कारण शायद यह है कि इस क्लब के मेंबर भी तो उसी इकोसिस्टम का हिस्सा हैं जो सरकार से खार खाये हुए हैं.
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने ताव में कह दिया कि चूंकि राहुल गांधी इसके मेंबर हैं, इसलिए नरेंद्र मोदी इसे खाली कराना चाहते हैं. लेकिन यह बताना पता नहीं क्यों भूल गये कि ज्योतिरादित्य सिंधिया, हरदीप पुरी (दोनो मंत्री) भी इसके मेंबर हैं. खैर, इस क्लब को खाली कराने से सबसे अधिक परेशानी यहां के कर्मचारियों को होगी जिनकी संख्या करीब छह सौ है. सरकार का सुझाव है कि क्लब कहीं दूसरी जगह स्थापित कर लीजिए और इन्हें नौकरी पर रख लीजिए. लेकिन इस क्लब को तो खाली करना ही होगा.
आजादी के बाद शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी संगठित गिरोह का दंभ तोड़ने के लिए सरकार ने पहल कर दी है. अब लड़ाई यहां तक पहुंच गयी है कि सांसदों, मंत्रियों को मिले आलीशान बंगलों और सुविधाओं पर सवाल उठाये जा रहे हैं. लेकिन ऐसे तर्कबाजों को कौन समझाये कि ये मंत्री, सांसद हर पांच साल में जनता के दरवाजे पर माथा टेकते हैं. ये अफसरान तो जनता से रिश्ते रखना भी अपनी तौहीन समझते हैं. जनता अपने नुमाइंदों को बदलती रहती है, लेकिन अफसर एक बार इम्तिहान पास कर कुर्सी पर बैठ गये तो तंत्र को अपनी जागीर और प्रजा को अपना नौकर मान लेते हैं. यह एक लंबी बहस का मुद्दा है. लेकिन कम से कम साहेब लोग जब कठदलील देते हैं तो कोफ्त होना लाजिमी है.
फिलहाल देखना यह है कि इसमें अदालती प्रक्रिया कितना लंबा खिंचती है और सरकार अड़ती है या पीछे हटती है, क्योंकि जज साहिबान भी तो इस क्लब के मेंबर हैं. लेकिन तथ्य यह है कि जमीन सरकार की है. उसका मालिकाना हक है. वह इसका इस्तेमाल अपने हिसाब से कर सकती है तो वह अपनी जमीन खाली क्यों नहीं करा सकती है? एक बात और वह यह कि दिल्ली जिमखाना हेरिटेज नहीं कुछ लोगों का अनधिकार प्रिविलेज है. अगर सरकार वहां कोई सुरक्षा अधिष्ठान स्थापित करना चाहती है तो उसे कौन रोक सकता है? कभी-कभी ऊंट को भी पहाड़ के नीचे आना पड़ता है और तब उसे अपनी ऊंचाई का भान होता है.
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