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धनबाद: दलित-पीड़ित व शोषितों की लड़ाई के अग्रणी योद्धा थे ए के राय

Dhanbad : धनबाद (Dhanbad) मासस के संस्थापक एके राय का स्मृति दिवस गुरुवार 21 जुलाई को निरसा विधानसभा क्षेत्र में विभिन्न जगहों पर मनाया गया. मासस के निरसा कार्यालय, मुगमा व मैथन, केलियासोल में आयोजित कार्यक्रम में पूर्व विधायक अरुप चटर्जी समेत भारी संख्या में कार्यकर्ताओं ने उनकी तस्वीर पर माल्यापर्ण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी. साथ ही उनकी जीविनी पर प्रकाश डाला गया. मौके पर पूर्व विधायक अरूप चटर्जी, आगम राम, बादल बाउरी, लालू ओझा, कमल मुखर्जी, टुटुन मुखर्जी, मुमताज अंसारी, दीपक सिंह, व्यंजन गोराई, ओपन गोराई, दिनेश सिंह, भक्ति मोदी, पापन चटर्जी, जयदेव पात्र, अमित मुखर्जी समेत भारी संख्या में कार्यकर्ता मौजूद थे.

  इंजीनियर की नौकरी छोड़ लड़ी मजदूरों की लड़ाई

पूर्व विधायक अरुप चटर्जी ने कहा कि ए के राय प्रखर वामपंथी विचारक, दलित-पीड़ित शोषितों के अधिकार के प्रति समर्पित,  शोषण, जुल्म और दमन के खिलाफ लड़ाई के अगुआ तथा मार्क्‍सवाद को आचार एवं व्यवहार के जरिये स्थापित करने वाले एक अप्रतिम योद्धा थे.  उनका सपना था कि झारखंड सहित पूरे देश में उत्पादक वर्ग का राज कायम हो. एम टेक (गोल्ड मेडलिस्ट) करने के बाद सिंदरी खाद कारखाने में अभियंता के पद पर कार्यरत थे. वहां प्रबंधन ने मजदूरों को अधिकार मांगने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए आरोप पत्र तमा दिया. राय साहब ने मजदूरों की ओर से उस आरोप पत्र का जवाब तैयार कर दिया. कारखाना प्रबंधन उनसे क्षमा मांगने के लिए कहा. उन्होंने कहा कि आप मेरी व्यक्तिगत आजादी नहीं छीन सकते हैं और अपना इस्तीफा कारखाना के प्रबंधन को सौंप दिया. नौकरी छोड़ने के बाद मजदूरों की लड़ाई लड़ने लगे तथा गांव में किसानों को उनके अधिकार के प्रति गोलबंद और सचेत करने लगे. उन्होंने कहा कि आपातकाल में जब जनतांत्रिक अधिकारों पर हमला हुआ, तो उन्होंने जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर सबसे पहले विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया.

जेल में रहते हुए सांसद बने

देश में  आपातकाल के दौरान व गिरफ्तार कर लिये गए. जेल में रहते हुए उन्होंने अपनी पार्टी एमसीसी से सांसद का चुनाव लडा और भारी बहुमत से जीते. तीन बार वह संसद के सदस्य रहे. तीन बार विधायक और तीन बार सांसद रहते हुए भी अति साधारण मजदूर की तरह खपरैल के घर में रहते थे, जहां बिजली भी नहीं थी. वह संसद की कार्यवाही में जाने के लिए साधारण बोगी में आम आदमियों की तरह यात्रा करते थे. अपना कपड़ा स्वयं धोते थे.

 शिबू सोरेन के साथ मिलकर किया झामुमो का गठन

उन्होंने अ शोषण मुक्त झारखंड की कल्पना की थी. इसी क्रम में 1973 में स्वर्गीय बिनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की. वह कहते थे कि हमारा दृष्टिकोण यदि माक्सर्वादी नहीं रहा तो झारखंड मिलने के बाद भी यह झगड़ाखंड बन जाएगा.

  वैचारिक मतभेद के कारण शिबू सोरेन से हुए अलग

कालांतर में शिबू सोरेन से उनका वैचारिक मतभेद हुआ और वह उनसे अलग हो गये.  कामरेड ए के राय विचार, व्यवहार एवं व्यक्तिगत आचरण से विशुद्ध रूप से मार्क्‍सवादी थे. उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया, जिसकी मिसाल देखने को नहीं मिलती है. उन्होंने जीवन पर्यंत विधायक या सांसद की कभी पेंशन नहीं ली. वह सरकारी अधिकारियों को भेजने वाले पत्र अपने हाथ से लिखते थे. समाचार पत्रों में छपनेवाले निबंध भी वह खुद लिखते थे.

  साइकिल से करते थे गांव का दौरा

संसद सदस्य या विधायक रहते हुए गांव का दौरा साइकिल या किसी व्यक्ति के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ करते थे. रात्रि में गांव के गरीब व्यक्ति के यहां खाना खाकर विश्राम करते थे. जीवन के अंतिम दिनों में लकवाग्रस्त होने के कारण वह लाचार हो गए थे. लेकिन उनके व्यक्तित्व से शोषण और दमन से मुक्ति का मार्ग झलकता था. यह भी पढ़ें: धनबाद:">https://lagatar.in/dhanbad-havan-performed-for-the-victory-of-presidential-candidate-draupadi-murmu/">धनबाद:

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