आजादी के बाद भी गरीब और शोषितों की आवाज बने
स्वतंत्रता सेनानी के द्वितीय पुत्र प्रेम कुमार शर्मा ने बताया कि देश की आजादी के बाद पिताजी को टाटा कोलियरी में एक बड़े पदाधिकारी की जिम्मेवारी मिली. वहां उनसे मजदूरों का शोषण देखा नहीं गया. नौकरी छोड़ दी और कांग्रेस मजदूर संगठन बनाया. मजदूरों की लड़ाई लड़ी. बाद में सूर्यदेव सिंह के जनता मजदूर संघ में शामिल हो गए. ज्वाइंट जेनरल सेक्रेटरी के रूप में काम किया. इसके बाद कोयला-इस्पात मजदूर पंचायत से भी जुड़कर मजदूरों और शोषितों की लड़ाई लड़ी. 1974 के जेपी आंदोलन में भी शामिल रहे थे. पूरी जिंदगी उन्होंने दूसरों के लिये कुछ करने-धरने में बिता दी. अपने लिये जोड़ापोखर के छोटे से भूखंड पर सिर्फ एक घर बनाया था.बिहार के नालंदा से आये थे धनबाद
स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र ने बताया कि पिताजी नालंदा जिले के दबोल गांव के रहने वाले थे. लेकिन 10 साल की उम्र में ही गांव से धनबाद आ गए थे. पूरा जीवन यहीं बिताया और वर्ष 2005 में अंतिम सांस भी ली. 70 के दशक में उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सम्मानित किया था. ट्रेन में फर्स्ट ऐसी का पास और पेंशन की सुविधा मिली. उनके निधन के बाद यह सुविधा मां को मिली. अब मां भी इस दुनिया में नहीं है. स्थानीय प्रशासन भी अलग अलग आयोजनों में उन्हें बुलाता था और सम्मानित भी करता था.स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को कोई पूछने वाला नहीं
स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र ने बताया कि माता-पिता के जाने के बाद अब हमें देखने वाला कोई नहीं है. तीन भाई और दो बहन आज मुफलिसी में जीवन गुजार रहे हैं. दोनों बहनों की आज तक शादी नहीं हुई है. मदद के लिये केंद्र से राज्य सरकार तक गुहार लगा चुके हैं. काफी पैसे भी खर्च कर दिए. परंतु किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली. आज पूरे देश में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. लेकिन मेरी नजर में यह विष महोत्सव है, जिसमें स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार को कोई देखने वाला नहीं है. यह भी पढ़ें: धनबाद:">https://lagatar.in/dhanbad-people-of-jharia-are-fighting-for-freedom-from-pollution-on-the-elixir-of-freedom/">धनबाद:आजादी के अमृत महोत्सव पर झरिया के लोग लड़ रहे प्रदूषण से आजादी की लड़ाई [wpse_comments_template]

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