DR. Santosh Manav आज फिर चाल धंसा. दब गए कुछ लोग. दब गए कहना सही नहीं है. कहिए, जीते-जी दफन हो गए. इनकी मौत पर कोई आंसू नहीं बहाएगा. ऐसा नहीं है कि आंसू सूख गए. ऐसा भी नहीं कि रोना नहीं आया. आया था पर आंसू आंखों की कोर में दबा दिए गए. इनके लिए ही मुहावरा गढ़ा गया होगा-खून के आंसू पीना. नाए-नाए चिनहियो बाबू : कोयले की बंद खदानों से कुछ शव निकलेंगे, जो जिंदा गए थे, कोयला चुनने, वे शव बनकर बाहर आएंगे. जो आ गए उन्हें समझो खुशनसीब. इसलिए कि अनेक शव बनकर भी बाहर नहीं आएंगे- वे कोयले में दफन हो गए. न भी हुए होंगे, धुकधुकी होगी, तब भी माफिया के गुर्गे उन्हें निकालेंगे नहीं. और कोयला डाल ठीक से दफन कर देंगे. जो शव बनकर बाहर आएंगे, उन्हें कोई पहचानेगा नहीं. बीवी सुबक लेगी, अकेले में दहाड़ मार रोएगी. पर पुलिस से कहेगी- नाए जानिओ----- बेटी की आंखों से बहता नीर पेट तक आएगा-टप-टप-टप--- हिचकी भी फूटेगी. वह मुट्ठी भिंचेगी. फिर भी पुलिस से कहेगी -नाए-नाए चिनहियो बाबू----. मौत का शहर : कोयले के पहाड़ से निकले शवों को यहां कोई नहीं पहचानता. पहचान लें तो अवैध खनन का लेबल लगेगा. थाना और अदालत की दौड़ होगी. इसलिए वे लावारिस शव कहलाते हैं. वे लावारिस ही फूंक दिए जाते हैं. स्वजनों के सामने लावारिस ! परिजन शव ले भागे, तब भी चुपचाप, दर्द सीने में दबाए प्रिय को बेआवाज़ फूंक आते हैं. यह अजीब शहर है. यहां मौत है- मौत वाला शहर-सिटी ऑफ डेथ. यहां कोई किसी का दोस्त नहीं है. है तो रकीब यानी प्रतियोगी. कोयले की लूट में रकीब. यह धनबाद शहर है-मौत वाला शहर, मौत का शहर. यहां प्रेत बसते हैं : धनबाद-तीस लाख की आबादी का जिला. बीस लाख की आबादी का शहर. झारखंड के तीन प्रमुख शहरों में एक. दस ब्लॉक और 1209 गांवों का जिला. जितना काला कोयला, उतना ही काला दिल. सब नहीं अधिकतर. कब किस पर कौन कट्टा तान दे, कहना मुश्किल. कब AK-47 तड़तड़ाने लगे. कहना कठिन. यहां सब असुरक्षित हैं, सुरक्षित कोई नहीं. यह काले हीरे की नगरी है-हां, कोयला नगरी. यहां प्रेत बसते हैं. कोयला लूटने वाले प्रेत. कोयला हैवान है : कोयला इस जिले की अर्थव्यवस्था है. व्यवस्था है. रोटी है. बिछावन है. ईमानदारी है, बेईमानी है. जीवन है, मौत है. कोयला ईमान है. कोयला हैवान है, जो है बस कोयला ही कोयला है. सौ साल से कोयला कोड़ रहे हैं लोग और कोयला है कि खत्म ही नहीं होता. रोज धरती का सीना फाड़ कर 85 से 90 हजार टन कोयला निकाला जाता है. और इसका चौथाई कोयला चोरी-छिपे निकाल लिया जाता है. यहीं छिपी है, गुमनाम मौत की कहानियां. खेल समझिए- एक कोयला तो सरकारी कंपनियां या उनके द्वारा चयनित-नामित कंपनियां निकालती हैं. इसके साथ ही सभ्य भाषा में कहें तो कोयला व्यवसायी और असभ्य शब्दों में कहें तो माफिया, कोयला निकालते हैं. जिन खदानों को कोयला कंपनियां बंद कर देती हैं, उसी मौत के कुएं से कोयला माफिया मजदूरों से कोयला निकलवाते हैं. पंद्रह-बीस रुपए बोरी खरीद लेते हैं. फिर उन्हें एक जगह इकट्ठा कर जिले, बाहर या राज्य के बाहर जाली कागजात के सहारे बेच दिया जाता है. जहां हर क्षण मौत साथ चलती है : यह खेल सब को पता है. सरकारी कंपनी, खदानों की रक्षा करने वाली CISF, पुलिस, अधिकारी, नेता----. सब का हिस्सा बंधा है. सबके पास पहुंच जाती है राशि. खेल चलता रहा है, चल रहा है, चलता रहेगा. दिक्कत तब होती है, जब चाल धंसता है, मिट्टी धंसती है, मजदूर दफन होते हैं. एक-दो दिन की चिल्लपों के बाद फिर वही कहानी. एक माह भी ऐसा नहीं होता, जब चाल न धंसे, लोग न मरे. गुमनाम मौत. लावारिस मौत. और जिनके अपने दफन होते हैं, वे कहेंगे- क्या करें, मरना तो है ही. भूख से मरें या चाल धंसने से. मानो मौत ही जिंदगी है. यह कैसी जिंदगी है ? जहां हर क्षण मौत साथ चलती है ! मौत की खेती : बताते हैं कि रोज लगभग बीस हजार टन कोयला अवैध निकाला जाता है यानी माफिया निकलवाते हैं. मतलब रोज का लगभग दस करोड़ का कोयला. माह में तीन सौ करोड़. साल का चार हजार करोड़. माफियाओं का क्या है, चार हजार करोड़ पर कुछ सौ जिंदगियां कुर्बान ! मौत की खेती ! मौत पर रोटी ! धन पशु ! रंगबाज और रंगबाजी : मौत के इस शहर में मौत के और भी बहाने हैं. सरकारी और उनके द्वारा चयनित-नामित कंपनियों से रंगबाजी कहिए या सुरक्षा टैक्स. कोयला ढोने वाली कंपनियों से भी टैक्स. नहीं दोगे, तो काम बाधित. सबके अपने-अपने झंडे, डंडे और गुंडे. काले कपड़ों से लेकर सफेदपोश तक. यूपी, बंगाल, बिहार के गुंडों तक का दखल. टैक्स नहीं दोगे, तो जान जाएगी. हर साल अमूमन पचास हत्या. रंगबाज, रंगबाजी, रंगबाजों की. इसलिए यह है मौत का शहर. अब सफेदपोशों का अघोषित तौर पर इलाका बंट गया है. इसलिए हत्या कम है पर है. नए-नए रंगबाज. नया नाम है अमन सिंह, प्रिंस खान. पैसा कमाते हो, पैसा वाला हो, रंगबाजी टैक्स दो. धमकी की बात. हर सप्ताह ऐसी खबर. जानलेवा गंदगी और प्रदूषण. हवा में जहर. खतरनाक लेवल के पार. गंदगी से पटा शहर. शौक से बटोरो बीमारियां. सांस की बीमारियां, टीबी के मरीज. इसलिए है यह मौत का शहर. काला पत्थर : हर सप्ताह हत्या की खबर. जमीन की दलाली में. नमक की हलाली में. रंगबाजी की वसूली में. हर माह औसतन 8-9 मौत अलग से. रंगबाजों की दहशत, भाषा-बोली के नाम पर द्रोह. बाहरी -भीतरी की नफरत. गोफ का डर----- . गोफ जानते हैं ? गोफ यानी जमीन धंसने से बना गड्ढा. सैकड़ों साल से कोयला निकालने के कारण और बदले में उसकी भराई न होने या भराई में लूट के कारण जमीन खोखली हो गई, छलनी हो गई. कभी भी, कहीं भी जमीन धंस जाती है. लोग जीते-जी जमीन में समा जाते हैं. शव भी नहीं मिलता. घर, मकान-दुकान मंदिर- मस्जिद सब धरती के अंदर ! हर माह गोफ -- ओह ! धनबाद . यही वह शहर है, जहां सैकड़ों की जलसमाधि हो गई. किसी ने इस पर फिल्म बनाई-काला पत्थर. फिर क्यों न कहें मौत का शहर ? फहीम खान, शफी खान का वासेपुर, इसी शहर का एक हिस्सा. जिस पर अतिरंजित फिल्म बना दी-गैंग्स आफ वासेपुर. फिर है न यह मौत, नफरत का, दहशत का शहर? पर गुमान तो है : धनबाद गुमान करे तो किस पर? पंचेत, तोपचांची, निरसा डैम पर. बिरसा मुंडा पार्क या स्व. ए.के. राय की मौद्रिक ईमानदारी पर. कुछ भी हो, है तो यह मौत वाला शहर-सिटी ऑफ डेथ. कोई माने या न माने. { लेखक दैनिक भास्कर सहित अनेक अखबारों के संपादक रहे हैं. फिलहाल लगातार मीडिया से बतौर स्थानीय संपादक जुड़े हैं } [wpse_comments_template]
धनबाद-सिटी ऑफ डेथ
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