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धनबाद : गौ सेवा से जीवन में सौभाग्य और सुख आता है-कृष्णप्रियाजी

Dhanbad : शक्ति मंदिर प्रांगण में आयोजित भागवत कथा के पांचवें दिन 7 अगस्त को कृष्णप्रियाजी ने कहा कि जहां पर भागवत कथा होती है, वहां पर उस समय सारे तीर्थ, सारी नदियां, सारे देवता विचरण करते हैं. भागवत कथा में जो व्यक्ति जिस मंशा के साथ बैठता है, उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. लेकिन, व्यक्ति की भावना पवित्र हो और संसार के मंगल की कामना उसके मन में हो. ऐसे व्यक्ति की मनोकामना भागवत कथा से पूर्ण होती है. नटखट बाल स्वरूप की लीलाओं का बहुत ही सुंदर दर्शन कराते हुए उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण साक्षात परमब्रह्म हैं. वे अजन्मे हैं.  ईश्वर केवल भक्तों के लिए ही धरती पर अवतरित होकर अनेक लीलाएं करते हैं. नारायण को एकादशी का व्रत अत्यंत प्रिय है और सभी व्रत किसी न किसी कामनावश किए जाते हैं. ईश्वर की भक्ति द्वारा देह को आसानी से मथुरा बनाया जा सकता है. जब मन भगवान के चिंतन में पूर्णतया लगता है, तब वह गोकुल बन जाता है और कृष्ण की ह्रदय में उत्पत्ति होती है. इसलिए प्रतिदिन प्रातः काल सबसे पहले ईश्वर का स्मरण करना चाहिए. कृष्णप्रियाजी ने कहा कि गौ  प्रेम के कारण ही हमारे देश में गोकुल, गोवर्धन और गोपाल जैसे नाम प्रचलित हैं. गौ की रक्षा के लिए स्वयं परमात्मा इस धरती पर आते हैं, लेकिन उनकी संतान इस सेवा से आज वंचित हैं . भारत की संपन्नता गाय के साथ ही जुड़ी हुई है. बड़े दुख की बात है कि देश में पूजा योग्य गाय की हालात दयनीय हो गई है. गौमाता में 33 कोटि देवताओं का वास है. इनकी सेवा से जीवन में सौभाग्य और सुख आता है. पंचगव्य का सेवन करके असाध्य रोगों से भी छुटकारा पाया जा सकता है. इसलिए हमें गौ सेवा अवश्य करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि भागवत कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है. कलयुग में मानस पुण्य तो सिद्ध होते हैं, परंतु मानस पाप नहीं होते. कलयुग में हरी नाम से ही जीव का कल्याण हो जाता है. कलयुग में ईश्वर का नाम ही काफी है. सच्चे हृदय से हरि नाम के सुमिरन मात्र से कल्याण संभव है. इसके लिए कठिन तपस्या और यज्ञ आदि करने की आवश्यकता नहीं है. जबकि सतयुग, द्वापर और त्रेता युग में ऐसा नहीं था. यह भी पढ़ें : आज़ादी">https://lagatar.in/dhanbad-artists-selected-for-azadi-ka-amrit-mahotsav-on-august-8/">आज़ादी

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