न वामपंथी पचा पा रहे और न ही भगवाधारी
लोकसभा चुनाव में मजदूर संगठनों की भूमिका अहम
Rizwan Shams Dhanbad : धनबाद लोकसभा सीट पर वैसे तो भाजपा कई दशक से हावी है, लेकिन इस बार भाजपा प्रत्याशी के लिए चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है. धनबाद में पूर्व में करीब सात बार जीतने वाले सांसदों में पीएन सिंह और प्रो. रीता वर्मा का नाम आता है. इन दोनों नेताओं का अपना कोई मजदूर संगठन नहीं है. यानि कोल राजधानी में कोलियरी व आउटसोर्सिंग के मामलों में इन सांसदों का कोई विशेष लेना-देना नहीं था. लेकिन अब भाजपा प्रत्याशी के तौर पर ढुल्लू महतो मैदान में हैं और उनके पास एक मजदूर संगठन है यूनाइटेड कोल वर्कर्स यूनियन. वे खुद एटक के केंद्रीय सचिव भी हैं. ऐसे में कोल राजधानी की कोलियरी व आउटसोर्सिंग में किसी दूसरे यूनियन के नेता के बढ़ते रूतबा को अन्य मजदूर संगठन चलानेवाले कैसे बर्दाश्त करेंगे. यही सवाल कोलियरी व आउटसोर्सिंग क्षेत्र में तेजी से तैर रहा है. अपनी-अपनी बिसात बचाए रखना भी चुनौती
धनबाद में कई मजदूर संगठन हैं, जो इलाकावार सक्रिय हैं. इनमें प्रमुख रूप से मासस, सीटू, जनता मजदूर संघ, जनता श्रमिक संघ, इंटक, एटक, भामसं आदि मुख्य रूप से सक्रिय हैं. इन लोगों ने दशकों से कोयलांचल की मजदूर राजनीति में अपना दबदबा बना रखा है.अपनी पहचान व दबदबा बनाये रखने के लिए इन संगठनों को चलाने वाले नेताओं ने कई दशक तक मेहनत की है. यहां तक कि विधानसभा चुनावों में ये मजदूर संगठन काफी हद तक अपनी भूमिका निभाते रहे हैं. असल में इन क्षेत्रों में मजदूरों के बीच पकड़ रखने वाले नेताओं को एकमुश्त वोट इन संगठनों के माध्यम से मिल जाते हैं. चूंकि प्रखंड स्तरीय चुनाव होने के कारण विधानसभा में नेताओं को बहुत जयादा दिक्कतों का सामना नहीं करता पड़ता है, लेकिन यह बात लोकसभा चुनाव में बहुत मायने रखती है. क्योंकि अब बात लगभग दो जिलों में मजदूरों के बीच अपना वर्चस्व कायम रखने की है. ऐसे में अन्य मजदूर संगठनों के सामने मजदूरों के बीच अपनी पहचान बचाये रखने की भी चुनौती होगी. क्या वामपंथी देंगे ढुल्लू का साथ ?
वामपंथी दलों व वाम विचारधारा रखने वाले लोग ढुल्लू महतो को पचा पाएंगे या नहीं, ये तो समस्या है ही, लेकिन असल टकराव की बात जनता मजदूर संघ, जनता श्रमिक संघ को लेकर है. झरिया, केंदुआ, भौंरा इलाके में इनकी मजबूत पकड़ है. एक तरफ रागिनी सिंह और दूसरी तरफ पूर्णिमा सिंह इन संगठनों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुईं हैं. इनके अलावा राष्ट्रीय जनता कामगार संघ के बैनर तले रामधीर सिंह का परिवार भी अब मजदूर राजनीति में कूद पड़ा है. इनको साधना ढुल्लू महतो के लिए मुश्किल बात है. भले ही रागिनी सिंह भाजपा की सिपाही हैं, लेकिन मजदूर राजनीति में ढुल्लू महतो के साथ नहीं खड़ी हो सकतीं. यही बात मासस समेत अन्य संगठनों के साथ भी है. ढुल्लू भले ही यहां कामरेड होने का झंडा ढो रहे हैं, लेकिन वामपंथी इनके दूसरे हाथ में भगवा लहराता देख रहे हैं. ऐसे में लोकसभा चुनाव न सिर्फ रोमांचक होगा, बल्कि मजदूर राजनीति की दिशा मोड़नेवाला भी शामिल हो सकता है. [wpse_comments_template]
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