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धनबाद : रावण जैसे दुर्जन को सज्जन हनुमान की बढ़ती पूंछ कैसे सहन होती : साध्वी

  Putki : पुटकी (Putki)  पुटकी साउथ बलिहारी में हरि कथा के दूसरे दिन आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री अमृता भारती ने कहा कि  भारत भूमि का अनुपम सौभाग्य रहा है कि यहां अनंत काल से ऋषि, मुनि, संत और भक्त ज्ञान और भक्ति की गंगा बहाते आ रहे हैं. ऐसी ही महान विभूतियों में नाम आता है हनुमंत जी का. हनुमान जी के प्रेम और सेवा का वर्णन स्वयं प्रभु राम ने बार-बार अपने मुखारविंद से किया. साध्वी ने कहा कि हनुमंत जी प्रभु राम के अमोघ वाण थे. एक ऐसा वाण, जिसे प्रभु ने जिस लक्ष्य का भेदन करने भेजा वह उसे भेद कर ही वापस आया. मार्ग में अनेक बाधाएं आई. लेकिन वह हनुमंत जी के मार्ग को रोक नहीं सकी, क्योंकि बाधाएं कब बांध सकी है, आगे बढ़ने वालों को. राम काज किए बिना वह रुके नहीं, जिस प्रकार वायु, रक्त हमेशा चलायमान रहता है, ठीक इसी तरह हनुमान जी का जीवन चरित हमें हर परिस्थिति में चलते रहने की,आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. हनुमंत जी जब प्रभु कार्य को सिद्ध करने लंका गए तो रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवाई.  इसके पीछे भी कारण था. पूंछ का अर्थ प्रतिष्ठा भी होता है और पूंछ अंग विशेष को भी कहा जाता है. हनुमान जी सज्जन थे और रावण दुर्जन. कभी भी किसी दुर्जन को सज्जन की बढ़ती पूंछ सहन नहीं होती.  रावण को भी नहीं हुई. यही कथा का रहस्य है. [wpse_comments_template]

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