लेजर बीम तकनीक मजबूत और किफायती
डॉ सिंह ने बताया कि लेजर बीम तकनीक के जरिये मजबूती से दो धातुओं को जोड़ा जा सकेगा. इसमें कम बिजली खर्च होगी और ऊर्जा भी कम पैदा होगी. यह पर्यावरण के लिए भी लाभदायक होगा. उन्होंने बताया कि इस तकनीक में लेजर रेडिएशन को नियंत्रण में रखा गया है.रिसर्च में आईआईटी खड़गपुर के एसआरएफ शामिल
तकनीक को विकसित करने में आईआईटी आइएसएम के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के सीनियर रिसर्च फेलो (एसआरएफ) गुलशाद नवाज अहमद और आईआईटी खड़गपुर के मोहम्मद शाहिद रजा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने बताया कि इस तकनीक के विकसित होने से धौंकनी, चिकित्सा उपकरण, दबाव सेंसर टरबाइन डिस्क और ब्लेड लेजर जैसी सामग्री बनाने में काफी मदद मिलेगी.चार साल लगे तकनीक विकसित करने में
नेतृत्व कर रहे डॉ सिंह ने बताया कि उनकी टीम ने यह प्रोजेक्ट वर्ष 2017 में लिया था. 4 वर्षों तक रिसर्च चला. वर्ष 2021 में उन्होंने इस तकनीक को विकसित करने में सफलता पाई. बताया कि इस तकनीक के विकसित होने से एयरोस्पेस, आटोमोटिव, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल, शिप बिल्डिंग, डिफेंस और पावर जेनरेशन इंडस्ट्रीज की कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा. यह भी पढ़ें: धनबाद:">https://lagatar.in/dhanbad-red-flag-not-radish-carrot-which-someone-can-uproot-and-throw-it-away-mass/">धनबाद:लाल झंडा मूली-गाजर नहीं, जिसे कोई उखाड़कर फेंक दे : मासस [wpse_comments_template]

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