आंदोलन की अवधि में बेच दी घर की संपत्ति
[caption id="attachment_363919" align="aligncenter" width="277"]alt="" width="277" height="300" /> नसीम खान[/caption] नौकरी की उम्मीद में धरना पर बैठे नसीम खान की स्थिति काफी खराब हो चुकी है. वह प्राइवेट नौकरी को छोड़ कर धरना दे रहे हैं. घर का खर्च चलाने के लिए नसीम खान ने पत्नी का गहना बेच डाला. अब पैसा भी समाप्त हो चला है. वह इस बात से चिंतित हैं कि इतने बड़े आंदोलन के बावजूद अगर अनुकंपा पर नौकरी नहीं मिली तो कहीं के नहीं रह जाएंगे.
गाय बेच दी, अब आर पार की लड़ाई
[caption id="attachment_363920" align="aligncenter" width="295"]alt="" width="295" height="300" /> धीरेंद्र राम[/caption] एक अन्य धरनार्थी धीरेंद्र राम भी इस लड़ाई से पीछे हटने को तैयार नहीं. अपनी इस दृढ़ता का हर्जाना उन्हें घर की संपत्ति बेच कर चुकाना पड़ रहा है. पैसे की कमी को देखते हुए और घर का खर्च को चलाने के लिए अपनी गाय बेच डाली. वह कहते हैं कि लड़ाई काफी आगे पहुंच चुकी है. यहां से अब वापसनहीं लौट सकते. लड़ाई आर या पार की होगी.
बेच दिया दोपहिया वाहन
[caption id="attachment_363921" align="aligncenter" width="262"]alt="" width="262" height="300" /> दुलाला कोरंगा[/caption] दुलाल कोरंगा ने भी धरना पर बैठे बैठे दोपहिया वाहन बेच दिया. उन्होंने बताया कि उनके पूरे परिवार का गुजारा छोटा भाई बड़ी मुश्किल से कर पा रहा है. वह एक प्राइवेट टेलीकॉम कंपनी में कार्यरत है. कंपनी से ₹6000 रुपये वेतन देती है. छह हजार रुपये में परिवार के छह सदस्यों का गुजारा हो रहा है. उन्होंने बताया कि वह भी कंपनी में नौकरी कर रहे थे. मगर 5 महीना पहले ही छोड़कर धरना पर हैं. काम करने के लिए जिस दो पहिया वाहन का सहारा था, वह भी बेच चुके हैं.
साइकिल, घड़ी और टीवी का कर दिया सौदा
[caption id="attachment_363927" align="aligncenter" width="254"]alt="" width="254" height="300" /> उमाकांत मंडल[/caption] उमाकांत मंडल ने अपने साइकिल और घड़ी के साथ मनोरंजन का साधन टीवी भी बेच दिया. वह दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. जिस साइकिल से वह कई किलोमीटर चलकर दिहाड़ी मजदूरी करने जाते थे, अब वह नहीं रही. पत्नी भी आंदोलन में है तो टीवी का भी सौदा कर डाला. उनका कहना है कि जब हम ना रहेंगे तो घर में टीवी और साइकिल की क्या जरूरत है.
प्रबंधन की बेरुखी ले डूबी आश्रितों को
इस मुद्दे पर झमाडा का कोई अधिकारी जवाब देने को तैयार नहीं. विगत 5 महीनों में कई बार जनप्रतिनिधियों ने भी दबाव बनाया. बावजूद प्रबंधन पूरी तरह से मौन रहा. प्रबंधन मीडिया के भी सवालों का जवाब गोल मटोल तरीके से देता है. आशा की छोटी सी किरण तब दिखी, जब पिछले महीने नगर विकास विभाग द्वारा प्रबंधन से 4 वर्षों का आय-व्यय का ब्योरा मांगा. परंतु वह किरण भी लुप्त हो गई है. क्योंकि प्रबंधन उसका जवाब ही सरकार को नहीं भेजा है. जा सका है. इस मामले में पूछे जाने पर तकनीकी सदस्य इंद्रेश शुक्ला ने कहा कि रिपोर्ट तैयार हो गई है, एक-दो दिन में नगर विकास विभाग को भेज दी जाएगी. यह भी पढ़ें: धनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-manager-turned-from-khakpati-to-billionaire-due-to-black-earnings-of-coal/">धनबाद: कोयले की काली कमाई से खाकपति से अरबपति बना मैनेजर [wpse_comments_template]

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