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धनबाद:  सवा लाख गंवा कर भी नहीं टूटा झमाडा आश्रितों का हौसला, आंदोलन पर डटे रहने का किया एलान

Dhanbad: धनबाद (Dhanbad)  झमाडा के 35 आश्रितों 139 दिनों में एक लाख पच्चीस हजार रुपये गला डाले, हालांकि उनका हौसला बरकरार है. 139 दिनों से टेंट का किराया, 30 से 35 लोगों के लिए प्रतिदिन का भोजन, खाना बनाने के लिए गैस सिलेंडर, सोने के लिए बिस्तर, चौकी, आंदोलन के लिए होर्डिंग, बैनर, तथा विभागीय कागजात समेत कई अन्य खर्च ने उनकी कमर तोड़ दी है. अब तक झमाडा प्रबंधन ने कोई सकारात्मक पहल भी नहीं की है. धरना पर बैठे 35 आश्रितों को अब खाने के लाले पड़ रहे हैं. बावजूद वे आंदोलन समाप्त करने के लिए राजी नहीं हैं. उनका कहना है कि आंदोलन के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा है.

 पिछले एक दशक से चली आ रही है लड़ाई

पिछले एक दशक से झमाडा आश्रित नियुक्ति की मांग को लेकर प्रदर्शन करते आ रहे हैं. परंतु प्रबंधन उदासीन बना बैठा है. प्रबंधन के रवैये से खिन्न आश्रितों ने विगत 22 फरवरी से अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया है. उनका कहना है कि लड़ाई 10 वर्ष से चली आ रही है. लेकिन प्रबंधन सकारात्मक पहल नहीं कर रहा है. इससे पहले भी आश्रितों ने भूख हड़ताल कर विरोध जताया था. तब प्रबंधन ने वार्ता कर 1 महीने का आश्वासन दिया था. लेकिन सालों बाद भी प्रबंधन की ओर से कोई पहल नहीं की गई.

  139 दिनों में इतने हुए खर्च

धरना पर बैठे आश्रितों ने अब तक कुल एक लाख पच्चीस हजार का खर्च आंका है. उन्होंने बताया कि पिछले 139 दिनों से टेंट वाले को ₹22000 का भुगतान किया गया है. राशन और गैस सिलेंडर पर ₹97000 खर्च हो चुके हैं तथा धरना के लिए छपवाए गए बैनर, पोस्टर और जरूरी कागजात को मिलाकर ₹4000 खर्च हुआ है. धरना स्थल पर हवन और पाठ में ₹2000 का खर्च आया है.

  प्रबंधन से पांच बार की वार्ता भी विफल

आश्रितों की अध्यक्षता कर रहे मेहराबुल अंसारी के अनुसार अब तक प्रबंधन के साथ पांच बार वार्ता हो चुकी है, जो विफल रही है. उन्होंने बताया कि चार बार झमाडा एसडीओ पंकज झा के साथ वार्ता हुई. इसके अलावा धनबाद विधायक राज सिन्हा की मौजूदगी में झमाडा एमडी इंद्रेश शुक्ला के साथ भी वार्ता हुई. मगर कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला.

 मांगों की गुहार लगाते त्याग चुके हैं पर्व- त्योहार

पिछले 4 महीनों से कई बड़े पर्व-त्योहार गुजर चुके. बावजूद आंदोलन पर तनिक भी असर नहीं पड़ा. आश्रितों में कई समुदाय के लोग शामिल हैं. बावजूद उनके आंदोलन ने मिसाल कायम की है. विगत चार महीनों में हिंदुओ के लिए रामनवमी, होली, रथयात्रा के अलावा के छोटे मोटे पर्व तथा मुस्लिमों के शबे बरात, ईद के बाद अब बकरीद भी गुजरने वाली है. इन पर्व-त्योहारों को दरकिनार कर आश्रित धरना स्थल पर डटे हुए हैं.

  कई पार्टियों का समर्थन भी काम न आया

आश्रितों को  कई राजनीतिक दलों का समर्थन भी मिला है, लेकिन प्रबंधन या सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा. झरिया की कांग्रेस विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह ने झारखंड विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया. भाजपा विधायक राज सिन्हा का भी पूर्ण समर्थन मिला. उन्होंने एमडी सतेंद्र कुमार से बातचीत कर उनकी मांगें मान लेने को कहा. परंतु सारे प्रयास अब तक विफल रहे हैं.

 आखिरी दम तक लड़ेंगे लड़ाई : झमाडा अधिकारी चुप

धरना पर बैठे अरविंद हाड़ी का कहना है कि जायज मांगों को लेकर अंतिम सांस तक लड़ेंगे. चाहे हमें बर्बाद ही क्यों ना होना पड़े. परंतु इस मुद्दे पर झमाडा का कोई अधिकारी कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है. एसडीओ पंकज झा ने कहा है कि विगत 18 अप्रैल को नगर विकास विभाग को पत्र लिखकर आदेश मांगा गया था. बदले में नगर विकास विभाग ने झमाडा का विगत 4 वर्षों का आय- व्यय का ब्योरा मांग लिया. यह भी पढ़ें: धनबाद:">https://lagatar.in/dhanbad-coal-laden-bikes-are-carried-by-boat-across-the-damodar-river-to-bengall/">धनबाद:

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