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धनबाद: महारास का अर्थ है आत्मा व परमात्मा का मिलन: आचार्य ब्रजेश जी

Topchachi : भागवत सेवा समिति साहोबहियार की ओर से आयोजित श्रीमद् भागवत कथा सह लक्ष्मी नारायण यज्ञ के छठे दिन वृंदावन से पधारे आचार्य ब्रजेश जी महराज ने महारास, रुक्मिणी विवाह आदि का मधुर वर्णन किया. उन्होंने कहा कि भगवान की महारास लीला इतनी दिव्य है कि स्वयं भोलेनाथ उनके बाल रूप के दर्शन के लिए गोकुल पहुंच गए. महारास में जो रस था, वह सामान्य नहीं था. उसे प्राप्त करने के लिए गोपियों को सर्वस्व त्यागना पड़ा था. कृष्ण-गोपियों की महारास लीला को जो श्रद्धा के साथ सुनता है, उसे भगवान के चरणों में पराभक्ति की प्राप्ति होती है और वह बहुत शीघ्र ही हृदय रोग-काम-विकार से छुटकारा पा जाता है. महारास के पश्चात् कंस का वध कर भगवान कृष्ण ने अपने माता-पिता व राजा अग्रसेन एवं उनके साथियों को कारावास से मुक्त कराया. आचार्य ब्रजेश जी महराज ने रुक्मिणी विवाह और उद्धव चरित्र का सुंदर शब्दों में वर्णन करते हुए कहा कि भगवान की अलौकिक लीलाओं को जब रुक्मिणी ने सुना, तब प्रभु श्री कृष्ण को ही पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा रखी व मन के भाव को गुरु के जरिये श्रीकृष्ण तक पहुंचाया. कहा कि मेरे भ्राता रुकमी के दबाव में पिता मेरा विवाह शिशुपाल के संग कर रहे हैं. किंतु मैंने मन ही मन आपको ही पति रूप में स्वीकार कर लिया है. उन्होंने कहा कि धर्म-कर्म के अनुसार कन्या जीवन में एक बार ही विवाह करती है. इस जन्म में आपको पति रूप में मान लिया, चूंकि आप तो जगत पति हो व मैं साधारण मनुष्य, किंतु भक्तों को स्वीकार करना आपका भी कर्तव्य है. रुक्मिणी ने कहा हे प्रभु आप मुझे स्वीकार करें, अन्यथा मैं किसी और की नहीं हो सकती. प्रभु ने समस्त राजाओं को परास्त कर रुक्मिणी का हरण किया व द्वारिका में जाकर सुंदर विवाह रचाया. भगवान ने शिक्षा दी कि जो स्वयं को पूर्ण रूप से मेरे प्रति समर्पित कर दे, मैं उसके लिए युद्ध कर भी उसे स्वीकार कर लेता हूं. भक्तों ने भी झांकियों एवं कथा के माध्यम से विवाह संपन्न कराया. श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया. [wpse_comments_template]

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