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धनबाद: बेलगड़िया में 24 साल से चल रहा है बसने-बसाने का अभियान

पुनर्वासित लोगों को झरिया से उजड़ने का दर्द, रोजी व रोजगार का भी संकट

Mithilesh Kumar Dhanbad: झरिया जैसे समृद्ध शहर में बसे लोगों को पहले तो उजड़ना मंजूर नहीं. उजड़ भी जाएं तो निर्जन स्थान पर बसना तो कतई स्वीकार नहीं. इसीलिए तो भूधंसान, सुलगती आग के बीच बसे लोगों का पुनर्वास सरकार व बीसीसीएल के लिए टेढ़ी कीर साबित हो रहा है. शहर से 10 किलोमीटर दूर बेलगड़िया में बसने से लोगों का लगातार इनकार एक अच्छी खासी योजना को बेकार बना रहा है. लोगों का कहना है कि शहर से दूर निर्जन स्थल, न रोजी-रोटी का साधन और न सुरक्षा का इंतजाम, कैसे बसें सरकार. मन मार कर 3 हजार लोग वहां रह रहे हैं,  मगर उनकी आत्मा आज भी झरिया में बसी हुई है.

   6 करोड़ की योजना अब हो गई 32 हजार करोड़ की

पीढ़ी दर पीढ़ी झरिया की कोयला खदानों के इर्द-गिर्द रहने वाले हजारों मजदूर जैसे-तैसे वहां गुजर-बसर कर रहे थे, चाहे उन्हें कोयले का अवैध उत्खनन ही क्यों न करना पड़े, रोजगार तो था. मगर बेलगड़िया में वह भी नसीब नहीं. इधर बीसीसीएल को धरती के नीचे से कोयला निकालने की पड़ी है. पता नहीं कब अंदर दहकती आग कोयले के रूप में दबे हीरे को निगल जाए. खान सुरक्षा महानिदेशालय की रिपोर्ट पर लोगों को हटा दिया गया, कुछ लोगों को हटने के लिए कहा जा रहा है.

 नीचे दबा पड़ा है 60 हजार करोड़ रुपये का कोयला

रिपोर्ट के अनुसार झरिया में धरती के नीचे लगभग 60 हजार करोड रुपये मूल्य का कोयला दबा पड़ा है. डेढ़ दशक पूर्व लोगों को वहां से हटा कर नया झरिया बसाने के लिए 7 हजार करोड रुपये की योजना बनी. प्रथम चरण का काम अगस्त 2021 में पूरा हुआ. 6000 आवास भी बने. इन आवासों में लोगों को शिफ्ट किया गया. लेकिन 3 हजार आवास आज भी खाली पड़े हैं. अब तक उन आवासों के दरवाजे चौखट भी गायब हो गए हैं. इधर पुनर्वास की 6 करोड़ की योजना अब लगभग 32 हजार करोड की हो चुकी है, जिसे केंद्र सरकार की मंजूरी मिली नहीं है. योजना के तहत लगभग 15 हजार आवास बनाए जानेवाले हैं. हालांकि जरेडा, बीसीसीएल व जिला प्रशासन संयुक्त रूप से निर्माण की दिशा में अग्रसर है.

    संयुक्त बिहार के समय से चल रही है पुनर्वास योजना

झरिया पुनर्वास योजना संयुक्त बिहार में ही बनी थी. योजना को मूर्त रूप देने के लिए झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकार का गठन हुआ. वर्ष 1999 में पहला मास्टर प्लान बना. परंतु केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी नहीं मिली. इसके बाद 2004 व 2006 में संशोधित मास्टर प्लान बना. परंतु कैबिनेट ने इसे यह कहते हुए नकार दिया कि इसमें सिर्फ कब्जाधारियों को बसाने की योजना है. 2008 में फिर से रिवाइजड मास्टर प्लान बना, जिसमें रैयत, बीसीसीएल इंप्लाई तथा कब्जाधारियों को बसाने की योजना थी. इसे पूरा होने में 12 साल से अधिक का वक्त लग गया. फेज वन पूरा हो चुका है, लेकिन अग्नि प्रभावित क्षेत्र से लोगों को सुरक्षित स्थान पर बसाने का काम पूरा नहीं हुआ है. अब फेज टू की प्रक्रिया चल रही है.

  एक साल पूर्व ढांचागत विकास की बनी थी योजना

पिछले साल कोयला मंत्रालय के सचिव अमृत लाल मीणा के दौरे के बाद टाउनशिप में लोगों को सुविधाएं मुहैया करने के लिए जिला प्रशासन ने बुनियादी सुविधाओं व ढांचागत विकास पर 74 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई थी, जिसमें  5.72 करोड़ रुपये से 50 बेड का अस्पताल, 1. 34 करोड़ रुपये की लागत से 60 मार्केट कांप्लैक्स,  2.91 करोड़ रुपये से स्कूल का निर्माण, 14 करोड़ रुपये खर्च कर ड्रिंकिंग वाटर प्रोजेक्ट का निर्माण शामिल था. अब तक एक भी प्रोजेक्ट पर काम शुरू नहीं हो सका है. सिर्फ कार्यों की समीक्षा ही चल रही है.

 लघु उद्योग को बढ़ावा देने की भी हुई थी घोषणा

जिला प्रशासन की ओर से पिछले साल रूबन मिशन के तहत टाउनशिप में निर्मित सामुदायिक केंद्रों में बांस का सामान, मिट्टी की मूर्तियां, जलकुंभियों से मैट बनाने, चमड़े के उत्पाद, सिलाई कढ़ाई आदि का प्रशिक्षण देने की घोषणा की गई थी. तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त स्थानीय लोगों को खुद का लघु उद्योग स्थापित करने के लिए प्रत्साहन व सरकार की गाइड लाइन के अनुसार रोजगार शुरू करने में भी मदद करने की बात कही गई थी. एक साल बीत गए, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. टाउनशिप के लोग सबसे ज्यादा बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे है. जिले के अधिकारी भी अब इस बात से भी मुकरने लगे है कि पिछले साल ऐसी कोई योजना बनी थी.

 बेलगड़िया के लिए अलग से कोई स्कीम नहीं: डीडीसी

धनबाद के उप विकास आयुक्त शशि प्रकाश सिंह कहते हैं कि बेलगड़गिया टाउनशिप के लिए अलग से स्किल का कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा है. अभी जेएसएलपीएस के माध्यम से प्लानी क्लस्टर में महिलाओं को स्किल की ट्रेनिंग दी जा रही है. इसमें बेलगड़गिया की महिलाएं भी प्रशिक्षण ले सकती हैं. कई महिलाएं प्रशिक्षण का लाभ लेकर आत्म निर्भर बन रही हैं. लघु उद्योग या अन्य रोजगार को लेकर अभी कोई स्कीम नहीं चल रही है. [wpse_comments_template]

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