एसी की हवा में सो गए नियम, 42 डिग्री में झुलस रहे मरीज
Dhanbad : धनबाद में इन दिनों तापमान 42 डिग्री के पार है. इस भीषण गर्मी में यदि कोई आग से जल जाए, तो उसके जख्मों का सही अंदाजा तो सिर्फ मरीज ही महसूस कर सकता है, या फिर उसकी चीखें आपको तकलीफ का अंदाजा दिला सकती हैं. गोड्डा की दो बच्चियां खेलने के क्रम में जल गई थीं. बेहतर इलाज के लिए उन्हें धनबाद लाया गया है. उनका इलाज एसएनएमएमसीएच में चल रहा है. लेकिन जिस वार्ड में उन्हें रखा गया है, वहां सिर्फ एक पंखे का सहारा है. इस भीषण गर्मी में जख्मों की जलन और फिर पंखे की गर्म हवा, तीनों के मिलने से जो चीखें उठ रहीं हैं, वो सुनकर पूरा अस्पताल तकलीफ में डूब जा रहा है. हैरान करनेवाली बात ये है कि इस बर्न वार्ड में एसी तक नहीं है. हां... यहां तो साहबों के बंद पड़े चैंबर एसीयुक्त जरूर हैं और डॉक्टर साहब भी एसी में मजे में हैं. गोड्डा डीसी ने बेहतर इलाज के लिए खुद किया था फोन
ये मामला गोड्डा जिले के सोनागुजरी की दो बच्चियों से जुड़ा है, जो खेलने के दौरान आग की चपेट में आ गई थीं. उनकी गंभीर हालत को देखते हुए बेहतर इलाज के लिए धनबाद के शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल रेफर किया गया है. गोड्डा के उपायुक्त जीशान कमर ने एसएनएमएमसीएच के प्राचार्य ज्योति रंजन को फोन के माध्यम से बेहतर चिकित्सा मुहैया कराने की बात कही थी. लेकिन यहां बच्चियों के इलाज में उचित व्यवस्था की कमी दिख रही है. हादसे का शिकार हुई बच्चियों को बेहतर इलाज के नाम पर एक कमरे में रखा गया है. यहां इन बर्न मरीजों को सिर्फ दीवार पर टंगे एक पंखे का सहारा है. इस भीषण गर्मी में बढ़ते तापमान की वजह से इन बच्चियों की चीख दिन भर वार्ड में गूंजती रहती है. बर्न केस के मरीज 40 डिग्री से अधिक तापमान में तड़प रहे हैं. परिजनों का कहना है कि यदि बच्चियों को एसी वाले वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाए ,तो शायद उनकी जलन में कुछ कमी आ सकेगी, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है. बर्न मरीजों के लिए ये हैं नियम
बर्न के मरीजों के लिए सबसे जरूरी है कि उन्हें किसी हालत में इन्फेक्शन न हो. जिस मरीज को इन्फेक्शन हो गया, उसके जिंदा बचने की उम्मीद कम हो जाती है. इन्फेक्शन से बचाव के लिए अलग से बर्न वार्ड होना चाहिए. इसके लिए अलग से डॉक्टर और स्टाफ की ड्यूटी होनी चाहिए. ताकि मरीज की लगातार निगरानी हो सके. न सिर्फ मरीज, बल्कि स्टाफ के लिए भी ड्रेसिंग की अलग व्यवस्था होनी चाहिए. जले हुए मरीजों के लिए स्पेशल मच्छरदानी की व्यवस्था होनी चाहिए. इस व्यवस्था में 60 प्रतिशत तक जले हुए मरीजों का इलाज कर उनकी जान बचाई जा सकती है. तापमान को नियंत्रित करने के लिए एसीयुक्त वार्ड आवश्यक है. लेकिन एसएनएमएमसीएच में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. यहां नियम डॉक्टरों के चैंबर की ठंडी हवाकर पाकर सो जाते हैं. [wpse_comments_template]
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