Dhanbad : धनबाद (Dhanbad) दीपावली को दीपों का त्योहार भले ही कहा जाता हो, मगर आधुनिकता की चकाचौंध में दीये की लौ धीमी पड़ गई. बदलते समय के साथ लोगों का मिजाज भी बदला और मिट्टी के बने दीये की जगह अब सतरंगी चाइनीज झालरों ने ले ली. लोग अब दीये जलाने की बजाय बिजली के रंगीन झालरों से घरों को सजाना ज्यादा पसंद करने लगे हैं. लोगों की इस रुचि का असर मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों पर पड़ा. हालत यह है कि माटी से जुड़े इन कारीगरों के मुहल्लों में दीपावली के अवसर पर कुछ साल पहले जैसा उल्लास हुआ करता था, वह अब कहीं नजर नहीं आता. दीये की मांग घटने से कुम्हारों के पुश्तैनी धंधे पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. नयी पीढ़ी भी अपने पुश्तैनी काम से दूरी बना रही है. कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी के दीये की मांग 70 फीसदी तक घट गयी है. शहर ही नहीं, ग्रामीण इलाकों में भी लोग अब दिवाली में बिजली के झालरों से घरों को सजा रहे हैं. हालत यह है कि दीये बनाने के लिए खरीदी गई मिट्टी के दाम भी बड़ी मुश्किल से निकल रहे हैं.
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alt="" width="191" height="300" /> लालो प्रजापति[/caption] पिछले 60 वर्षों से दहुआ टांड़ में मिट्टी के दीये बना कर गुजर-बसर कर रहे लालो प्रजापति का कहना है कि समय बदल गया है. दिवाली में मिट्टी के दीये की मांग कम हो गयी है. दूर दराज से मिट्टी खरीद कर लाना पड़ता है. इसके अलावा कोयला, लकड़ी खरीदकर दीये पकाने का खर्च बढ़ गया है, जबकि दीये की बिक्री से आमदनी उतनी नहीं होती. मेहनत के अनुरूप उचित मूल्य नहीं मिलता है.
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alt="" width="182" height="300" /> मिट्टी के बने छोटे,-बड़े दीपक[/caption] इसी पेशे से जुड़े नरेश पंडित ने कहा कि बाजार में बिजली के रंग बिरंगे झालरों की बाढ़ आई हुई है. उसकी चमक दमक के कारण मिट्टी के दीये की पूछ कम हो गई. लोग सिर्फ पूजा-पाठ की रस्म निभाने के लिए दीयों का उपयोग कर रहे हैं. बदलते समय और मिट्टी के सामान की बिक्री कम होते देख अगली पीढ़ी भी अब पुश्तैनी धंधे को अपनाने में नाक-भौं सिकोड़ रही है. यह भी पढ़ें: धनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-ranchi-ara-express-train-now-3-days-a-week-residents-of-koyalanchal-will-have-convenience/">धनबाद
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नहीं मिलता वाजिब दाम, मेहनत का भी मूल्य नहीं
[caption id="attachment_443797" align="aligncenter" width="191"]alt="" width="191" height="300" /> लालो प्रजापति[/caption] पिछले 60 वर्षों से दहुआ टांड़ में मिट्टी के दीये बना कर गुजर-बसर कर रहे लालो प्रजापति का कहना है कि समय बदल गया है. दिवाली में मिट्टी के दीये की मांग कम हो गयी है. दूर दराज से मिट्टी खरीद कर लाना पड़ता है. इसके अलावा कोयला, लकड़ी खरीदकर दीये पकाने का खर्च बढ़ गया है, जबकि दीये की बिक्री से आमदनी उतनी नहीं होती. मेहनत के अनुरूप उचित मूल्य नहीं मिलता है.
बिजली के बल्व व लड़ियों के कारण घटी दीये की पूछ
[caption id="attachment_443802" align="aligncenter" width="182"]alt="" width="182" height="300" /> मिट्टी के बने छोटे,-बड़े दीपक[/caption] इसी पेशे से जुड़े नरेश पंडित ने कहा कि बाजार में बिजली के रंग बिरंगे झालरों की बाढ़ आई हुई है. उसकी चमक दमक के कारण मिट्टी के दीये की पूछ कम हो गई. लोग सिर्फ पूजा-पाठ की रस्म निभाने के लिए दीयों का उपयोग कर रहे हैं. बदलते समय और मिट्टी के सामान की बिक्री कम होते देख अगली पीढ़ी भी अब पुश्तैनी धंधे को अपनाने में नाक-भौं सिकोड़ रही है. यह भी पढ़ें: धनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-ranchi-ara-express-train-now-3-days-a-week-residents-of-koyalanchal-will-have-convenience/">धनबाद
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