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धनबादः मोहली समाज की महिलाओं ने हुनर से बदली अपनी तकदीर

सूप-दउरा से बंबू क्राफ्ट तक का सफर


Dhanbad : कभी सूप, दउरा व हाथ पंखा बनाकर किसी तरह परिवार चलाने वाली धनबाद के मोहली समाज की महिलाओं ने हुनर से अपनी तकदीर बदल ली. आज वे बांस से आकर्षक लैंप, गिफ्ट आइटम, डेकोरेटिव पीस व आधुनिक होम डेकोर उत्पाद तैयार कर रही हैं. बंबू क्राफ्टिंग की ट्रेनिंग ने न सिर्फ इनके हुनर को नई पहचान दी है, बल्कि आत्मनिर्भरता व सम्मानजनक आमदनी का रास्ता भी खोल दिया है.


यह बदलाव कड़ी मेहनत, सीखने की ललक व सही मार्गदर्शन का नतीजा है. इन महिलाओं ने परंपरागत कारीगरी को आधुनिक बाजार से जोड़कर एक नई मिसाल कायम की है.

पहले पेट भरना भी था मुश्किल

मोहली समाज पीढ़ियों से बांस से बने घरेलू उत्पाद तैयार करता आ रहा है. सूप, दउरा व हाथ पंखा जैसे सामान गांव-देहात में खूब इस्तेमाल होते थे और यही उनकी आजीविका का मुख्य जरिया था. लेकिन समय के साथ प्लास्टिक व मशीन निर्मित वस्तुओं ने बाजार पर कब्जा जमा लिया. मांग घटती गई और आमदनी कम होती चली गई. हालत यह हो गई कि महीने भर की मेहनत के बाद भी परिवार का गुजारा मुश्किल हो जाता था. नई पीढ़ी इस पारंपरिक काम को छोड़ने का मन बनाने लगी थी, क्योंकि मेहनत ज्यादा और कमाई बेहद कम थी.

बंबू क्राफ्ट की ट्रेनिंग से बदली सोच

इसी बीच टिंकर हट फाउंडेशन ने मोहली समाज के कारीगरों का सर्वे कर उन्हें आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप प्रशिक्षण देने की पहल की. वर्ष 2022-23 के दौरान मिनिस्ट्री ऑफ टेक्सटाइल के सहयोग से सामर्थ्य योजना के तहत बंबू क्राफ्ट की विशेष ट्रेनिंग दी गई. महिलाओं को बांस से लैंप, फ्लावर वास, गिफ्ट बॉक्स, डेकोरेटिव आइटम, होम डेकोर और अन्य आकर्षक उत्पाद बनाना सिखाया गया. साथ ही आर्टिजन कार्ड भी बनवाया गया, जिससे उन्हें एक पेशेवर कारीगर की पहचान मिली.

400 महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भर

धनबाद जिले के बलियापुर प्रखंड के बरमुड़ी, घोघाबाद, बेलगड़िया, मोहली टोला व सिरसा कुंडी में रहने वाली करीब 400 महिलाएं इस काम से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं. सोनिया मोहली, मेनका देवी, बालिका देवी व रचना कुमारी ने बताया कि पहले उनका काम सिर्फ त्योहारों तक सीमित रहता था. बाकी समय बेरोजगारी रहती थीं. अब पूरे साल काम मिलता है और नियमित आमदनी हो रही है. यही नहीं, पहले जहां महीने में महज 1500 से 2000 रुपये ही कमा पाती थीं, अब उनकी आमदनी बढ़कर 8 से 10 हजार रुपये या उससे अधिक हो गई है. डिजाइन डेवलपमेंट वर्कशॉप के बाद आय में और इजाफा हुआ है.

राष्ट्रीय मंच पर दिख रहा हुनर

बूबू क्राफ्टिंग ने इन कारीगरों को गांव से बाहर राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया है. अब ये दिल्ली, मुंबई व ओडिशा समेत कई बड़े शहरों में लगने वाले गांधी शिल्प मेला व राष्ट्रीय शिल्प मेलों में हिस्सा ले रही हैं. जहां यात्रा भत्ता भी मिलता है और वे सीधे ग्राहकों को अपना सामान बेचती हैं. इनमें से कई महिलाएं अब मास्टर क्राफ्ट पर्सन व ट्रेनर बन चुकी हैं, जो अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ रही हैं.

हुनर से बदली जिंदगी

कारीगर युवतियों का कहना है कि पहले वे इस काम को मजबूरी समझती थीं, लेकिन अब यही उनका गर्व बन गया है. बांस से बने आकर्षक उत्पादों को देखकर लोग तारीफ करते हैं, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है. आज मोहली समाज की महिलाएं सिर्फ परंपरा को जिंदा नहीं रख रहीं, बल्कि उसे आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप ढालकर नई पहचान दे रही हैं. कड़ी मेहनत और सीखने की चाह ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही दिशा और अवसर मिले तो परंपरागत हुनर भी सफलता की नई कहानी लिख सकता है. 

 


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