अंततः नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में किसी मंत्री का पहला इस्तीफा हो गया. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना ही पड़ा. अहंकार को झूकना पड़ा. सरकार को हार माननी पड़ी. इसके साथ ही बीजेपी का डीएनए भी अब बदल गया, जिसके बारे में कहा जाता था कि इस्तीफे नहीं होते. वैसे धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा बहुत देर बाद हुआ. तब जबकि मोदी सरकार की मिट्टी पलीत हो गई. सड़क से लेकर घरों के कमरों तक में और 20-22 दिनों तक चुप रहने के बाद मोदी का इंस्टाग्राम अवतार भी आलोचनाओं का शिकार बन गया.
देखा जाये तो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उसी दिन ले लिया जाना चाहिए था, जिस दिन कॉकरोच जनता पार्टी ने इसकी मांग करते हुए एक ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान चलाया था, जिस पर कुछ ही घंटों में ढ़ाई करोड़ से अधिक युवाओं ने ऑनलाइन समर्थन दे दी. मतलब करोड़ों युवा धर्मेंद्र प्रधान को पेपर लीक का जिम्मेदार मान रहे थे. लेकिन सरकार और मेन स्ट्रीम मीडिया इस गफलत में थी कि आज का युवा मोबाइल पर तो है, वह सड़क पर नहीं उतर सकता. युवा ना सिर्फ सड़क पर उतरा, बल्कि सरकार और उन टीवी चैनलों को भी बता दिया कि वो देश का विश्वास खो चुके हैं.
धर्मेंद्र प्रधान के लिए इस्तीफे का दूसरा मौका तब था, जब देशभर में उनके खिलाफ प्रदर्शन होने लगे थे. कॉकरोच जनता पार्टी ने जंतर-मंतर पर धरना शुरु कर दिया था. सोनम वांगचुग ने अनशन शुरु कर दिया था. लेकिन सरकार ने किया उल्टा. धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों को दहशतगर्द कहा. निशिकांत दुबे समेत कई सांसदों ने छात्रों का कैरियर बर्बाद करने की धमकी दी. टीवी एंकरों व सोशल मीडिया के संघी इंफ्लुएंशरों के बदौलत यह रायता फैलाने की कोशिश की गई कि यह सब देश को अस्थिर करने के लिए विदेशी ताकतों के इशारे पर किया जा रहा है.
इस्तीफे का तीसरा मौका तब था जब छात्रों ने संसद मार्च किया. उससे पहले धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दे देते तो छात्रों पर लाठी चार्ज नहीं होता. बच्चियों को साथ हुई अमानवीय मारपीट के वीडियो देश भर में नहीं फैलते. लाठी चार्ज में सिविल ड्रेस के गुंडों के वीडियो ने तो उन लोगों को भी इस आंदोलन से जोड़ दिया, जो छात्र या बेरोजगार नहीं हैं.
केंद्र की सरकार और धर्मेंद्र प्रधान के पास इस्तीफे के कई मौके थे. लेकिन सरकार इस गफलत में रही कि दूसरे आंदोलनों की तरह इस आंदोलन को भी डिसक्रेडिट कर दिया जायेगा. पाकिस्तान, चीन, जॉर्ज सोरोस से फंडेड और देशद्रोहियों का जमावड़ा साबित कर दिया जायेगा. लेकिन छात्रों ने सरकार की चूलें हिला दी. सरकारी अफवाहों की धज्जियां उड़ा दी. सरकार यह भूल गई कि ये नेता नहीं युवा हैं. नेता नहीं हैं जो ईडी, सीबीआई से डरा देंगे. युवा हैं, बैंड बजा देंगे.
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा छात्रों की बड़ी जीत है. लेकिन यह याद रखना होगा कि यह जीत तभी मिली है जब छात्रों ने गलत रास्ता नहीं अपनाया. हिंसा का सहारा नहीं लिया. लाठी खायी, लेकिन वार नहीं किया. जिन्होंने लाठियों से पीटा, उन्हें ही दूसरे दिन खाना खिलाया. अंकल बोलकर संबोधित किया. अहिंसा की राह पर चले. अगर आंदोलन हिंसक हो गई होती, तो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कभी नहीं होता और भाजपा का डीएनए भी नहीं बदलता.
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