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12 करोड़ से नया भवन बनाने की मंजूरी के 18 साल बाद भी जर्जर JSMDC कार्यालय की 3 करोड़ से मरम्मत

Ranchi : झारखंड स्टेट मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (JSMDC) के मुख्यालय भवन की करीब 3 करोड़ रुपये की लागत से मरम्मत कराई जा रही है. लेकिन इस मरम्मत कार्य को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. एक ओर भवन को जर्जर बताया जा रहा है, वहीं, दूसरी ओर मरम्मत कार्य में मानक के अनुरूप निर्माण सामग्री का उपयोग नहीं किए जाने की चर्चा निगम से लेकर विभाग तक में है.
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  • 2006-07 में नए मुख्यालय को मिली थी स्वीकृति, अब जर्जर भवन पर खर्च हो रहे करोड़ों, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर भी सवाल

Ranchi : झारखंड स्टेट मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (JSMDC) के मुख्यालय भवन की करीब 3 करोड़ रुपये की लागत से मरम्मत कराई जा रही है. लेकिन इस मरम्मत कार्य को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. एक ओर भवन को जर्जर बताया जा रहा है, वहीं, दूसरी ओर मरम्मत कार्य में मानक के अनुरूप निर्माण सामग्री का उपयोग नहीं किए जाने की चर्चा निगम से लेकर विभाग तक में है. 

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस भवन की अब करोड़ों रुपये खर्च कर मरम्मत की जा रही है, उसके स्थान पर वर्ष 2006-07 में ही करीब 12 करोड़ रुपये की लागत से नया कार्यालय भवन बनाने की स्वीकृति निदेशक परिषद द्वारा दी जा चुकी थी. 18 साल बीत जाने के बाद भी निदेशक परिषद ने नये भवन के निर्माण नहीं होने के मामले पर कभी ध्यान नहीं दिया.

 

12 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली निगम के भवन को लेकर कई निर्माण कंपनियों ने अपना प्रेजेंटेशन भी निगम के समक्ष प्रस्तुत किया था. मिली जानकारी के अनुसार तत्कालीन विभागीय सचिव एवं निगम के एमडी अरुण कुमार सिंह के कार्यकाल में नए भवन निर्माण की योजना को आगे बढ़ाया गया था. निगम के मौजूदा कार्यालय परिसर के समीप एक एकड़ से अधिक खाली जमीन भी उपलब्ध है, जहां आधुनिक कार्यालय भवन का निर्माण प्रस्तावित था.

 

जानकारों का कहना है कि यदि उस समय नई इमारत का निर्माण कर दिया जाता, तो आज JSMDC को अत्याधुनिक कार्यालय परिसर मिल चुका होता और जर्जर भवन की बार-बार मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती.

 

वर्तमान में चल रहे मरम्मत कार्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. निर्माण में गुणवत्ता मानकों का पूरी तरह पालन नहीं किया जा रहा है और उपयोग की जा रही सामग्री निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है.

 

अब सवाल यह उठ रहा है कि जब लगभग दो दशक पहले नया भवन बनाने की मंजूरी मिल चुकी थी, तो वह परियोजना आखिर ठंडे बस्ते में क्यों चली गई? क्या उस समय की स्वीकृति को बिना किसी ठोस कारण के छोड़ दिया गया?

 

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