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नियामक संस्थानों की साख पर बट्टा

Arun Rai सुचेता दलाल ने अकेले, दो दशक पहले, हर्षद मेहता के अभूतपूर्व बैंक फ्राड का पर्दाफाश किया था. तत्कालीन वित्त मंत्री चिदम्बरम ने इस्तीफा दिया था और हर्षद मेहता को जेल हुई थी. उन्हीं सुचेता दलाल और प्रणंजय गुहा ने, हिंडनबर्ग से दो तीन साल पहले ही अडानी की कंपनियों की वित्तीय अनियमताओं पर अलग-अलग रिपोर्टें छापी थीं. गुहा और उनकी पत्रिका पर सौ करोड़ का केस ठोक दिया गया. वे जेल भेजे गये. पत्रिका ने उनसे नाता तोड़ लिया. एंडरसन ने भी, जिसने हिंडरबर्ग रिपोर्ट लिखी है, गुहा के रिसर्च का हवाला दिया है. लेकिन मामला अब इन रिपोर्टों से आगे बढ़कर भारत की संसद में पहुंच गया है. सिर्फ अडानी ही नहीं, भारत की वित्तीय संस्थाएं, रेगुलेटर्स सभी फ्राड के संदेह के दायरे में आ गये हैं. मेरे मित्र राजेश कुमार सिंह ने आईआईटी बीएचयू से बीटेक और दिल्ली आईआईटी से एमटेक किया, फिर यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया चले गये. वहां अर्थशास्त्र में पीएचडी की. आजकल आयोवा में प्रोफेसर हैं और भारतीय रिजर्व बैंक के आमंत्रित कंसल्टेंट भी. कल उन्होंने बताया कि आज भारत में वित्तीय रेगुलेटर्स की जो छीछालेदर हो रही है, उससे दुखी हैं. कभी इनकी क्षमता के मुरीद विदेशी बैंकर भी हुआ करते थे. 2015 में स्विट्जरलैंड के बेसल शहर में अंतरराष्ट्रीय रिजर्व बैंकों की सालाना मीटिंग के दौरान अमेरिकी वित्त सचिव ने अपने अफसरों को सलाह दी थी कि वे भारतीय रेगुलेटर्स के मॉडल से सीखें. एकाएक वे सभी, अब एकदम से अक्षम हो गये हैं? या फिर उन्हें राजनैतिक वातावरण ने इस हालात में पहुंचा दिया है. विश्व के सभी रिजर्व बैंक या समकक्ष संस्थाओं के गवर्नर, जाने माने और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री होते हैं. भारत में भी रहे हैं. मगर आज, कभी इतिहास के विद्यार्थी, एक आईएएस अधिकारी इस पद पर आसीन हैं. कम से कम तीन डिपुटी गवर्नर और पांच अति वरिष्ठ अफसरों ने रिजर्व बैंक से इस्तीफा दे दिया था. संदेश हर स्तर तक तुरत पहुंच जाते हैं. आस्ट्रेलिया में कोयला खनन का कॉन्ट्रैक्ट लेने के समय प्रधान मंत्री अडानी के साथ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चीफ अरुंधति भट्टाचार्य को अपने साथ ले गये थे. आस्ट्रेलिया में अडानी का सामूहिक विरोध हो रहा था, अब भी हो रहा है. आंतरिक खबरों के अनुसार स्टेट बैंक की एक्सपर्ट कमेटी ने अडानी समूह को आठ हजार करोड़ का कर्ज देने के फैसले पर मैडम भट्टाचार्य को पुनर्विचार करने को कहा था. अडानी को कर्ज मिला. एनटीपीसी ने अडानी से आस्ट्रेलियाई कोयले को खरीदने के लिए, भारतीय कोयले से ढाई गुणा अधिक दाम पर आर्डर दे दिया. 82 वर्षीय मार्क फोबियस फ्रैक टेम्पलटन म्युचुअल फंड के पूर्व चीफ थे. एमआईटी अमेरिका में प्रोफेसर दामोदरन वैल्यूएशन पढ़ाते हैं. इन दोनों से अमेरिकन मुद्रा कोष के शीर्ष अधिकारी इस पर सलाह लेते हैं कि अंतरराष्ट्रीय शेयरों और अन्य संस्थानों का सही वैल्यूएशन क्या हो. इन दोनों ने स्वतंत्र आकलनों में अडानी एंटरप्राइजेस के शेयरों की सही कीमत 972 और 985 रुपये बताई थी. किसके दबाव में, स्टेट बैंक, दूसरे बैंकों, और जीवन बीमा निगम ने कीमत से तीन से चार गुणा ज्यादा कीमत पर अदानी के शेयर खरीदे और कर्ज दिया? फिर, अडानी ने इन्हीं बढी हुई कीमतों पर अपने शेयरों को गिरवी रखके विदेशी बैंकों से कर्ज लिया. अब उनमें से दो वित्तीय संस्थाओं ने अडानी के शेयरों को शून्य मूल्य का घोषित कर दिया है. भारतीय सेना के लिये संवेदनशील रक्षा उपकरणों को बनाने का समझौता जब इजराइल के साथ हुआ तो ठेका अडानी की कंपनियों को दिया गया है. राफेल में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. अडानी की कंपनी को सुरक्षा उपकरणों को बनाने का कितना अनुभव है, उससे ज्यादा अहम सवाल यह है कि जिस कंपनी को देश की सुरक्षा-संबंधित उपकरणों को बनाने का, देश के संवेदनशील बंदरगाहों का, रेल का, हवाई अड्डों के संचालन का जिम्मा है, उसी के परिवार द्वारा उसी की कंपनी में विदेशों से संदिग्ध या जलसाज संस्थाओं द्वारा पैसा लगाने के आरोप की जांच देश हित में होनी चाहिए या नहीं? कल प्रधान मंत्री से ये मांग की गई. यह भी मांग की गई वे आधिकारिक रूप से जवाब दें कि इन हवाला बेनामी या सिर्फ नाम की, कंपनियों की क्या जांच हो रही है? अडानी ने हफ्ते पहले अपने जिस एफपीओ में लगा पैसा लोगों को वापस कर दिया था, उसमें अंतिम तारीख से एक दिन पहले तक 5% से भी कम निवेश हुआ था. यह एफपीओ अंतिम दिन अचानक पूरा सब्सक्राइब हो गया. मालूम पड़ा कि अचानक से पैसा अरब और मॉरिशस के इन्वेस्टर्स से भी आया था. उनमें हाल में ही अपनी कंपनी खोली है और उनके कुल इन्वेस्टमेंट का 91 से 98 प्रतिशत पैसा अडानी के इस एक एफपीओ में लगा है. प्रधान मंत्री से एक और सीधा सवाल पूछा गया है. उनके साथ अडानी विदेश यात्राओं मे कितनी बार गये हैं? कितनी बार अडानी जी ने प्रधान मंत्री की यात्रा के ठीक पहले या ठीक बाद उन देशों की यात्राएं की हैं, जहां से उनकी कंपनी को उन देशों के ठीके मिले हैं? इन ठीकों की कुल कीमत क्या है? इन सवालों से भारतीय वित्तीय संस्थाओं की विश्वसनीयता और देश की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गये हैं. सवाल राजनीतिक लाभ हानि का नहीं रहा, सवाल देश की अस्मिता का हो गया है. सरकार को, संसद को और उसके माध्यम से देश की जनता को बताना ही होगा. देश के दो आधार स्तंभों पर भरोसे की बात है. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.  [wpse_comments_template]

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