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हल्के में न लें भाजपा-आजसू को

Shyam Kishore Choubey अपने गठन के 23 साल पूरे करने की ओर कदम बढ़ा रहे झारखंड में भले ही स्थायी सरकारों का दौर प्रारंभ हो चुका है, लेकिन राजनीतिक गठजोड़ से इसे निजात नहीं मिल पाई है. आज की तारीख में महाबली समझी जा रही भाजपा हो कि खुद को झारखंड की पहचान कहनेवाला झामुमो, दोनों ही गठजोड़ की राजनीति की वजह से राज करते दिखे. 2014 की मोदी लहर हो कि 2019 का उससे भी प्रचंड तूफान, दोनों ही मौकों पर इस पठारी राज्य की राजनीति गठजोड़ की बदौलत सत्ता की सीढ़ि़यां चढ़़ सकी. 2014 में भाजपा नेतृत्ववाले एनडीए के राज्य में बहुमत के साथ गद्दीनशीन होने पर ऐसा प्रतीत हुआ कि यह मोदी लहर का कमाल है. 2019 में जब संसदीय चुनाव में मोदी का तूफान झारखंड सहित पूरे देश में अपना करिश्मा दिखा चुका था, तब राज्य पर राज करने की लड़ाई में भाजपा इतनी पस्त दिखी, जितना कभी न दिखी थी. इसके ठीक उलट झामुमो, कांग्रेस, राजद गठजोड़ करिश्माई तरीके से उभर कर सामने आया. पहली नजर में किसी को भरोसा ही न हुआ कि 5-6 महीने पहले जो भाजपा संसदीय चुनाव में राज्य की 14 सीटों में से गठजोड़ कर 11+1 पर काबिज हो गई, वह विधानसभा चुनाव में 81 में से 25 सीटों पर ही क्यों सिमट गई . विधानसभा चुनाव पूर्व की सियासी हलचल और उसके बाद की ‘हायतौबा’ में जितनी भी बातें उभरीं, उनका एक प्रमुख फलीतार्थ सामने आया, ऐन चुनाव के वक्त भाजपा-आजसू गठजोड़ का टूटना. बेशक, आजसू एक निहायत क्षेत्रीय पार्टी है, जिसका पूरे राज्य में प्रभाव नहीं है. इसके बावजूद 14-15 सीटों पर इसकी पहचान तो है ही. अबतक के चुनावी इतिहास में वह अधिकतम छह सीटें ही निकाल सकी है, लेकिन अन्य 8-9 सीटों पर वह खेल बिगाड़ने की कूवत भी रखती है. इस बात को ‘महाबली’से बेहतर कौन जानता होगा? इस गठजोड़ के जलवे का ताजातरीन उदाहरण रामगढ़ सीट पर इसी महीने आया चुनाव परिणाम है. रामगढ़ विधानसभा सीट पर ग्रामीण और शहरी दोनों तरह के वोटर भागीदारी निभाते हैं. इसके शहरी वोटरों में बड़ी संख्या उद्योग, व्यापार और नौकरी करनेवालों की है, जो 1932 के खतियानी नहीं हैं. झारखंड के स्थापना काल ई. सन् 2000 तक यह सीट उलट-पुलट होती रही. झारखंड गठन के ऐन पहले इस सीट से जीते सीपीआई विधायक शब्बीर अहमद कुरैशी का इंतकाल हो गया था. राज्य अस्तित्व में आया तो भाजपा सांसद और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बनाये गये. उनके समक्ष विधानसभा की सदस्यता हासिल करने की बाध्यता थी. 2001 में रामगढ़ सीट पर हुए उपचुनाव में उन्होंने जीत हासिल की. उसके बाद के चुनावों में भाजपा के साथ गठजोड़ में यह सीट आजसू जीतती रही. 2019 के विधानसभा चुनाव में यूपीए लहर पर सवार होकर यहां से कांग्रेस की ममता देवी विधायक चुन ली गईं. हाल ही एक मामले में अदालत ने उनको पांच साल की कैद सुना दी तो 27 फरवरी को हुए उपचुनाव में कांग्रेस हवा हो गई. उपचुनाव में 21-22 हजार वोटों से हारना हवा होने के बराबर ही है. यह तब हुआ, जब यूपीए राज्य में 1932 का खतियानी विधेयक लहरा रहा था और खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खतियानी जोहार यात्रा का दम दिखा रहे थे. यह नहीं भूलना चाहिए कि राज्य में 2019 के अंतिम दिनों में 47 सीटें जीतकर झामुमो नेतृत्ववाले यूपीए ने बड़े स्थिर भाव से सत्ता की बागडोर संभाली, तो उसके स्थायित्व में कोई संशय नहीं था. फिलहाल सवा साल से हेमंत ‘ईडी-उडी’ पर भारी नजर आ रहे हैं. आगे क्या होगा, कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. इस घनचक्कर से बचे रहने पर भी डेढ़ साल बाद विधानसभा चुनाव दरवाजे पर आ खड़ा होगा. रामगढ़ के पहले हेमंत शासन में ही विधानसभा के चार उपचुनाव हो चुके थे. एक तो खुद हेमंत द्वारा छोड़ी गई सीट दुमका, दूसरे कांग्रेस के राजेंद्र प्रसाद सिंह और झामुमो विधायक हाजी हुसैन अंसारी के आकस्मिक निधन के कारण रिक्त हुई बेरमो और मधुपुर सीटें और चौथी सीट थी मांडर, जिसके जेवीएम पलट कांग्रेस विधायक बंधु तिर्की को अदालत से सजा मिलने के कारण उपचुनाव की नौबत आई. इन चारों पर दलगत तरीके से यथास्थिति कायम रही. दुमका से हेमंत के भाई बसंत जीत गए, जबकि बेरमो और मधुपुर के दिवंगत विधायकों के पुत्र विजयी रहे. मांडर सीट बंधु की पुत्री निकाल ले गई. ये सीटें आजसू के प्रभाव क्षेत्र की नहीं रही हैं. रामगढ़ उसकी परंपरागत सीट है, जिसे परंपरागत मित्र भाजपा से फूट के कारण 2019 में कांग्रेस ने छीन ली थी. तीन साल बाद फिर भाजपा से दोस्ती के कारण आजसू ने उसे रिगेन कर लिया. ऐसी स्थिति में सबकुछ ठीक-ठाक रहने पर भी 2024 का विधानसभा चुनाव झामुमो और कांग्रेस के लिए गंभीर चुनौती होगा. यूपीए का मौजूदा ट्रंप कार्ड ‘32 का खतियानी निर्णय किस मुकाम तक जाएगा, अभी क्या, कभी भी कुछ भी नहीं कहा जा सकता. रामगढ़ को नजीर मानें तो सत्ताधारियों को कुछ और सूरतें गढ़ने की जरूरत है. झारखंड के चुनाव में ‘एक अकेला दल’ कतई भारी नहीं पड़नेवाला. कुछ और काल तक गठजोड़ की राजनीति ही कारगर रहेगी, लेकिन कौन सा गठजोड़ राज करेगा, यह तजुर्बे की बात है. विधानसभा चुनाव के लिहाज से एनडीए को यूपीए हल्के में न ले, बशर्ते स्वयं भाजपा के गुट-गिरोह ज्यादा न मचलें. यूं झामुमो हो कि कांग्रेस, ये दोनों भी इसी बीमारी से बहुत हद तक लस्त-पस्त हैं. सभी दल अपना-अपना चेहरा आईने के सामने रखें तो अगले का भेंगापन उनको सुकून देनेवाला नहीं लगेगा. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.

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