क्या आपको पता है, क्यों मनाते हैं होली, जानें इसके पीछे की प्रचलित पौराणिक कथाएं Lagatar Desk : होली रंगों का त्योहार है, जो भाईचारे, आपसी प्रेम और सद्भावना का प्रतीक है. इस दिन लोग एक-दूसरे को रंगों में रंगकर खुशियां मनाते हैं. घरों में तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान और मिठाइयां बनती हैं. वहीं होली की शाम को, लोग एक-दूसरे के घर जाकर गुलाल लगाते हैं और होली की शुभकामनाएं देते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बुराई पर अच्छाई की जीत को याद कर होलिका दहन किया जाता है. वहीं इसके अगले दिन होली मनायी जाती है. इस साल पूर्णिमा तिथि 13 मार्च को सुबह 10:35 मिनट से लेकर 14 मार्च को दोपहर 11:11 मिनट तक रहेगी. इसलिए इस बार होली 14 मार्च को नहीं, बल्कि 15 मार्च को मनाई जायेगी. हालांकि, कुछ लोग 14 मार्च को भी होली का पर्व मनायेंगे. श्रीकृष्ण ने सबसे पहले राधा के साथ खेला था रंग
ब्रज की होली पूरे देश में प्रसिद्ध है. नंद की नगरी में इसे बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस पर्व की शुरुआत श्रीकृष्ण और राधा रानी की अठखेलियों से हुई, जो एक पौराणिक कथा के अनुसार वर्णित है. कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण का रंग सांवला था, जबकि राधा रानी गोरी थीं. श्रीकृष्ण इस बात को लेकर अक्सर मां यशोदा से शिकायत किया करते थे कि वे सांवले क्यों हैं. इस पर यशोदा मैया ने उन्हें सुझाव दिया कि वह अपने जैसा रंग राधा के चेहरे पर लगा दें, ताकि दोनों एक जैसे दिखें. खुश होकर श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ राधा को रंग लगाने के लिए निकल पड़े. माना जाता है कि श्रीकृष्ण और उनके मित्रों ने राधा और गोपियों के साथ जमकर रंग खेला. इस आनंदमय क्षण के बाद से होली मनाने का चलन शुरू हुआ और हर साल इस त्यौहार को उत्साह और प्रेम के साथ मनाया जाने लगा. इस प्रकार, श्रीकृष्ण और राधा की होली ने रंगों के इस पर्व को एक विशेष पहचान दी.
प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट हो गयी थी होलिका
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श्रीकृष्ण ने सबसे पहले राधा के साथ खेला था रंग
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ब्रज की होली पूरे देश में प्रसिद्ध है. नंद की नगरी में इसे बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस पर्व की शुरुआत श्रीकृष्ण और राधा रानी की अठखेलियों से हुई, जो एक पौराणिक कथा के अनुसार वर्णित है. कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण का रंग सांवला था, जबकि राधा रानी गोरी थीं. श्रीकृष्ण इस बात को लेकर अक्सर मां यशोदा से शिकायत किया करते थे कि वे सांवले क्यों हैं. इस पर यशोदा मैया ने उन्हें सुझाव दिया कि वह अपने जैसा रंग राधा के चेहरे पर लगा दें, ताकि दोनों एक जैसे दिखें. खुश होकर श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ राधा को रंग लगाने के लिए निकल पड़े. माना जाता है कि श्रीकृष्ण और उनके मित्रों ने राधा और गोपियों के साथ जमकर रंग खेला. इस आनंदमय क्षण के बाद से होली मनाने का चलन शुरू हुआ और हर साल इस त्यौहार को उत्साह और प्रेम के साथ मनाया जाने लगा. इस प्रकार, श्रीकृष्ण और राधा की होली ने रंगों के इस पर्व को एक विशेष पहचान दी. इसी दिन गांव वालों ने असुर स्त्री से पाया था छुटकारा
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पार्वती के लिए कामदेव ने महादेव पर चलाया था पुष्प बाण
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