Search

क्या ईवीएम 'खेला' संकट अब भी मौजूद?

Nishikant Thakur भाजपा कर्नाटक विधानसभा चुनाव हार गई और बहुमत के आधार पर कांग्रेस वहां सरकार बनाने जा रही है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री होंगे तथा डीके शिवकुमार उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. अब यह बात धीरे-धीरे आमलोगों की समझ में आने लगी है कि झूठ के पांव नहीं होते और एक-न-एक दिन सच सामने आ ही जाता है. कर्नाटक में भी यही हुआ. पिछली सरकार तो भाजपा की ही थी. इस बात का भी लाभ कांग्रेस को मिला और उसके द्वारा यह बार-बार पूछा जाता रहा कि आप मतदाताओं से किस आधार पर फिर से अपनी पार्टी को वोट देने की अपील कर रहे हैं? यह तो भला हो प्रधानमंत्री का, जिन्होंने अंत में भाजपा की स्थिति को संभाल लिया, अन्यथा क्या हाल पार्टी का होने वाला था, यह सब जानते हैं. भाजपा के लिए ऐसा लगता है कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद प्रधानमंत्री के अतिरिक्त कोई दूसरा नेता नहीं है, जो जनता को अपनी ओर खींच सके. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, जो अपने राज्य हिमाचल प्रदेश में भी पार्टी की सरकार नहीं बचा सके, कर्नाटक में अपने भाषण से पूरे देश की जनता का अपमान किया. उन्होंने कहा, `नौ साल पहले कैसा भारत था? भ्रष्टाचार के नाम से जाना जाने वाला भारत था. कैसा भारत था, घुटने टेककर चलने वाला भारत था और आज जब मोदीजी को प्रधानमंत्री बनाया तो दुनिया में सिक्का जमाने वाला भारत बन गया.` उनके इस वक्तव्य की खूब आलोचना हुई. यहां तक कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक ने इसे भारतीयों के लिए अपमान बताया और कहा कि भारत पहले भी महान था और अब भी महान है. साथ ही कई प्रतिक्रियाओं में यह बात भी आई थी कि जो व्यक्ति अपने गृह प्रदेश में भी अपनी पार्टी की सरकार नहीं बचा पाया, उसकी कोई हैसियत नहीं है कि वह किसी और राज्य में अपनी सरकार बना सके. चुनाव नतीजे आने के बाद भी भाजपा के नेतागण अपनी गाल बजाने से परहेज नहीं कर रहे हैं. अपनी और अपने दल की कमियां दूर करने के स्थान पर अब भी कांग्रेस की कमियों को अनर्गल प्रलाप करके वह यह साबित करना चाहते हैं कि कांग्रेस की कर्नाटक में जीत और भाजपा की हार इनकी आगामी योजना का एक छोटा भाग हो. कर्नाटक चुनाव में ध्रुवीकरण का मुद्दा खूब उठा था. भाजपा से लेकर कांग्रेस और जेडीएस तक ने खूब ध्रुवीकरण की कोशिश की. चुनाव से पहले कर्नाटक में हिजाब, हलाल और फिर मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा चर्चा में रहा. चुनाव आते ही कांग्रेस ने बजरंग दल पर बैन का वादा करके नए सिरे से ध्रुवीकरण करने की कोशिश की. भाजपा ने इसे बजरंग बली से जोड़ा, लेकिन यह दांव काम नहीं आया. बाद में फिल्म `द केरल स्टोरी` भी चुनावी मुद्दा बनी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में हार के बाद ट्वीट करके कांग्रेस को 135 सीटें जीतने पर बधाई दी है. भाजपा 66 पर सिमट गई, जबकि जेडीएस को 19 सीट मिली है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने पार्टी के लिए जमकर प्रचार किया था. उन्होंने कांग्रेस की धार को कुंद करने का पूरा प्रयास किया था. वहीं, कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा को घेरा था. कांग्रेस की बड़ी जीत पर पार्टी नेता राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में गरीबों के साथ थी. कर्नाटक ने बताया कि मोहब्बत इस देश को अच्छी लगती है. वहां नफरत की बाजार बंद हुई है, मोहब्बत की दुकानें खुली हैं. पांच वादों को पहले दिन पहले कैबिनेट में पूरा करेंगे. राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि गरीबों की शक्ति ने भाजपा के पूंजीपति मित्रों की ताकत को हराया है. कहा जाता है कि कर्नाटक दक्षिण का टोल गेट है और इसलिए यदि वहां से आप सफलतापूर्वक आगे बढ़ जाते हैं, तो यह मान लिया जाता है कि आगे आपका रास्ता आसान हो जाएगा. फिलहाल अभी कुछ इस तरह की बात करना तो बेमानी है, लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि इस वर्ष जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, सब में कांग्रेस प्रचंड बहुमत से जीतकर सरकार बनाएगी, लेकिन ईवीएम का खेला तो 2024 के लोकसभा चुनाव में होगा. जनता में कोई गलत संदेश न जाने पाए, इसलिए विधानसभा के चुनावों में जनता की इच्छानुसार कांग्रेस की प्रचंड जीत होगी. ऐसा इसलिए, क्योंकि भाजपा को लोकसभा चुनाव जीतना है. इसमें पूरी ताकत और साम-दाम- दण्ड-भेद के जरिये केंद्र की सत्ता पर काबिज होना है. राज्य की सरकारें तो बनती-बिगड़ती, गिरती-उठती रहेंगी, लेकिन केंद्र में सरकार बनाकर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को स्थापित करना भाजपा का एकमात्र उद्देश्य है. कर्नाटक के बाद अब 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, वे छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम और राजस्थान हैं. अब कांग्रेस को इन राज्यों के साथ—साथ लोकसभा चुनाव के लिए सतर्क रहना होगा. आज युवा पढ़—लिखकर बेरोजगार घूम रहे है. उनके लिए रोजगार की कोई योजना सरकार के पास है नहीं, ऊपर से महंगाई की मार. फिर सरकार से कोई आश्वासन नहीं कि उन्हें भविष्य में क्या करना है. जो रोजगार के साधन थे, उसके बारे में अब देश का लगभग प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि पिछले कुछ वर्षों से देश के महत्वपूर्ण विभागों को निजी संस्थाओं के हाथ में सौंपा जा रहा है, जिन सरकारी विभागों को बनाने में पिछली सरकारों ने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया, उसे देखते—ही—देखते निजी हाथों में सौंपकर अपनी पीठ थपथपाई जा रही है. आज जो स्थिति बन गई है, उसमें तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल की बात सत्य होती प्रतीक होती दिख रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतवर्ष यदि अयोग्य राजनीतिज्ञों के हाथों में चला गया तो , वह खंड—खंड में विभाजित हो जाएगा, लेकिन ऐसा 70 वर्षों में तो नहीं हुआ, लेकिन आज समाज को जिस तरह से बांट दिया है, उससे यही लगता है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो वह दिन दूर नहीं, जब चर्चिल की बात सत्य हो जाए. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp