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गांव छोड़ब ना ही…नारा फिर गूंजा! जमीन विवाद से झारखंड में नक्सलवाद की आहट?

Ranchi :  “गांव छोड़ब ना ही, जंगल छोड़ब ना ही… माई माटी छोड़ब ना ही, लड़ाई छोड़ब ना ही…”. झारखंड में कभी यह नारा उभरे नक्सल आंदोलन की पहचान हुआ करता था. आज, जब राज्य में नक्सलवाद कमजोर पड़ता दिख रहा है, एक नया सवाल उठ रहा है. क्या इतिहास या वही परिस्थिति फिर से जन्म लेने वाली है, जिनसे नक्सलवाद की शुरुआत हुई थी?

 

झारखंड के कई जिलों से जमीन कब्जा, फर्जी दस्तावेज और आदिवासी भूमि की अवैध खरीद-फरोख्त की शिकायतें तेजी से सामने आ रही हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, रांची, धनबाद, जमशेदपुर, पलामू और लातेहार जैसे इलाकों में प्रभावशाली लोगों और अधिकारियों की मिलीभगत से गरीबों और आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही है. 

 

ग्रामीणों का कहना है कि जिन इलाकों में पहले नक्सल प्रभाव था, वहां जमीन पर कब्जा करना आसान नहीं था. उस समय जमींदारी खत्म करने और गरीबों को जमीन दिलाने की बात होती थी. लेकिन अब जैसे-जैसे नक्सली कमजोर हुए हैं, जमीन माफिया सक्रिय हो गए हैं. कई गांवों में लोग खुलकर कहने लगे हैं कि “नक्सली नहीं रहे, तो जमीन लूट शुरू हो गई”.

 

राजधानी रांची के कांके और मोरहाबादी जैसे इलाकों से आदिवासी जमीन के फर्जी कागजात बनाकर खरीद-फरोख्त के मामले सामने आ रहे हैं. स्थानीय लोगों का दावा है कि बिचौलियों के जरिए रजिस्ट्री कराकर बाद में असली मालिकों को बेदखल करने की कोशिश की जा रही है.

 

खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक, यही हालात छोटे उग्रवादी समूहों के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि कुछ क्षेत्रों में पुराने नक्सली समर्थक या नए समूह ग्रामीणों को जंगल-जमीन बचाने के नाम पर फिर से संगठित करने की कोशिश कर रहे हैं. इसको लेकर छोटे स्तर पर बैठकें हो रही हैं और लोगों को जोड़ने का प्रयास जारी है. 

 

माफियाओं पर कार्रवाई नहीं हुई, तो बढ़ सकता है खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि जमीन विवादों का त्वरित समाधान, भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, पारदर्शी जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई बेहद जरूरी है. साथ ही आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनों का कड़ाई से पालन करना होगा. अगर समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो बढ़ता असंतोष भविष्य में गंभीर चुनौती बन सकता है.

 

जमीन का सवाल अभी भी जिंदा है

झारखंड में नक्सलवाद भले ही कमजोर पड़ा हो, लेकिन “जमीन, जंगल और पहचान” का मुद्दा आज भी जिंदा है. यही वजह है कि पुराना नारा समय-समय पर फिर गूंजने लगता है. 

 

सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट, लेकिन चुनौती बरकरार

पुलिस मुख्यालय और सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं. अधिकारियों का कहना है कि नक्सलवाद पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा चुका है. लेकिन जमीन विवाद और अवैध कब्जे जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. अगर इसे समय रहते नहीं नियंत्रित नहीं किया गया, तो छोटे-छोटे समूह फिर से सक्रिय हो सकते हैं.

 

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि नक्सलवाद सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असंतोष से जन्म लेता है. अगर जमीन, विस्थापन और आजीविका के मुद्दों का समाधान नहीं हुआ, तो उग्रवादी संगठन इसका फायदा उठा सकते हैं.

 

फिलहाल पुलिस प्रशासन जमीन से जुड़े विवादों की निगरानी बढ़ाने और संवेदनशील इलाकों में खुफिया नेटवर्क मजबूत करने में जुटा है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है, अगर जंगल और जमीन का मुद्दा फिर से उभरा, तो क्या झारखंड नक्सलवाद के नए दौर की आहट सुन रहा है?

 

इन इलाकों में नक्सलियों के पक्ष में सुनाई दे रहे स्वर

- रांची के कांके इलाके में आदिवासी जमीन की खरीद-फरोख्त को लेकर विवाद के दौरान ग्रामीणों ने खुलकर नाराजगी जताई. लोगों का कहना था कि पहले बाहरी लोग जमीन नहीं ले पाते थे, लेकिन अब खुलेआम प्लॉटिंग हो रही है. कुछ बैठकों में ग्रामीणों ने कहा कि पहले नक्सलियों का डर था, इसलिए जमीन बची हुई थी.

 

- रांची के ही नगड़ी क्षेत्र में जमीन अधिग्रहण और कब्जे के विरोध में ग्रामीणों ने कहा कि अब जमीन बचाने वाला कोई नहीं रहा, पहले नक्सली विरोध करते थे. आंदोलन के दौरान यह भावना कई बार सामने आई.

 

- पलामू के पांकी इलाके में गैरमजरूआ और रैयती जमीन विवाद के बीच ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि दबंग लोग जमीन ले रहे हैं. यहां कुछ लोगों ने कहा कि नक्सल प्रभाव के समय कोई जमीन नहीं छीनता था.

 

- गुमला के बसिया क्षेत्र में CNT जमीन हस्तांतरण विवाद के दौरान ग्रामीणों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पहले बाहरी लोगों को जमीन लेने से रोका जाता था, लेकिन अब सब कुछ खुला है.

 

- लातेहार के चंदवा में जमीन दलाली और वनभूमि विवाद को लेकर स्थानीय बैठकों में ग्रामीणों ने कहा कि नक्सल खत्म होने के बाद जमीन माफिया सक्रिय हो गए हैं.

 

- पश्चिम सिंहभूम के गोइलकेरा क्षेत्र में खनन और जमीन विवाद के दौरान भी कुछ ग्रामीणों ने कहा कि पहले नक्सली जमीन बचाने की बात करते थे, अब कब्जे बढ़ रहे हैं. हालांकि इन बयानों को पुलिस प्रशासन आधिकारिक समर्थन नहीं मानता, लेकिन यह संकेत जरूर माना जा रहा है कि जमीन विवादों ने ग्रामीण इलाकों में असंतोष बढ़ गया है.

 

राज्य में जमीन विवादों की बढ़ती घटनाएं

- रांची के हेहल इलाके में आदिवासी जमीन को लेकर बड़ा विवाद सामने आया. प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठे और मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया. अदालत ने भी पूछा कि कब्जा दिलाने के बजाय तोड़फोड़ क्यों की गई। यह विवाद लंबे समय से जमीन अधिकार को लेकर संघर्ष का केंद्र बना हुआ है.

 

- कांके प्रखंड में आदिवासी और गैरमजरूआ जमीन के रिकॉर्ड में हेराफेरी कर अवैध लेन-देन का मामला सामने आया. शिकायत के बाद जांच सीआईडी को सौंपी गई. ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि फर्जी रिकॉर्ड के जरिए जमीन कब्जा की जा रही थी और शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही थी.

 

- रांची में फर्जी वंशावली तैयार कर आदिवासी जमीन ट्रांसफर करने की शिकायत पर प्रशासन ने जांच के आदेश दिए. जनप्रतिनिधियों की शिकायत के बाद अधिकारियों को रिपोर्ट देने को कहा गया.

 

- गिरिडीह के बेंगाबाद में करीब 64 एकड़ जमीन पर फर्जी दस्तावेज बनाकर कब्जा करने का आरोप लगा. पीड़ितों ने अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप लगाया और मामला अदालत तक पहुंच गया.

 

- रांची में मीडिया से बातचीत क्रम में आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया कि उनकी जमीन पर बाहरी लोग कब्जा कर रहे हैं. CNT जमीन के अवैध हस्तांतरण को लेकर आंदोलन की चेतावनी दी गई.

 

- लातेहार जिले के कई गांवों में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि वनभूमि और आदिवासी जमीन पर बाहरी लोगों द्वारा कब्जा किया जा रहा है. स्थानीय संगठनों का कहना है कि जमीन दलाल गरीबों से कम कीमत पर जमीन लेकर आगे ऊंचे दाम पर बेच रहे हैं.

 

- पलामू के पांकी, लेस्लीगंज ,सदर और चैनपुर इलाके में भी गैरमजरूआ और आदिवासी जमीन की खरीद-फरोख्त को लेकर विवाद बढ़े हैं.ग्रामीणों का आरोप है कि रजिस्ट्रेशन में गड़बड़ी कर जमीन ट्रांसफर की जा रही है.

 

- खूंटी जिले में भी जमीन खरीद-फरोख्त को लेकर कई बार आंदोलन हुए. स्थानीय लोगों ने फर्जी कागजात के जरिए जमीन ट्रांसफर होने का आरोप लगाया.

 

- बोकारो के चास और आसपास इलाके में सरकारी और गैरमजरूआ जमीन पर कब्जे की शिकायतें सामने आईं। ग्रामीणों का कहना है कि माफिया प्लॉटिंग कर जमीन बेच रहे हैं.

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