
बैजनाथ मिश्र
देश की राजनीति में अचानक युवाओं को रिझाने-लुभाने की होड़ सी मच गयी है. हालांकि सरकारों की तकदीर पहले भी युवा ही तय करते रहे हैं, लेकिन तिलचट्टा पार्टी की सक्रियता के बाद माहौल में नयी गर्मी तारी हो गयी है. तिलचट्टा आंदोलन के बाद जेन जी नामक नया शब्द प्रचलन में आ गया है. खबर है कि यह गिरोह पांच सितंबर को कुछ नयी हरकत करने वाला है. इस बाबत दिल्ली पुलिस ने एडवाइजरी जारी कर कहा है कि ये छात्र और युवा कम, रीलबाज ज्यादा हैं. ये गुस्सा दिलायेंगे और कंटेंट बनायेंगे. ये चाहेंगे कि पुलिसकर्मी लड़कियों महिलाओं से उलझें और फंस जायें. इसलिए इन्हें सख्ती से डील जरूर करें, परंतु हंसते हुए, मुस्कराते हुए. एडवाइजरी में रीलबाजों के लिए गालीबाज शब्द का उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन इशारा उस तरफ जरुर किया गया है.
दूसरा खेमा राहुल गांधी का है. वह रंग-बिरंगी टी शर्ट में युवा पोज देते हुए प्रयागराज और पुणे में युवाओं की भीड़ से संवाद कर चुके हैं. उधर भाजपा नयी पीढ़ी को समझने और समझाने के लिए अपने अनुभवी नेताओं के साथ योजनाबद्ध कार्यक्रम पर मंथन कर रही है. संक्षेप में कहें तो कांग्रेस जहां कॉलर ढ़ीला कर रही है, वहीं भाजपा संगठन का नट-बोल्ट टाइट कर रही है.
भाजपा चुनौती देने वालों पर लेबल चिपकाने और बहस की दिशा बदलने में माहिर है. भाजपा की सफलता का एक बड़ा कारण यही है. लेकिन कांग्रेस खासतौर से राहुल गांधी जानबूझकर उसे मौका दे देते हैं. पुणे में उनका कार्यक्रम जितना उम्दा हुआ, उससे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि राहुल ने सनातन धर्म को मंच से गाली दी. उन्होंने मनुस्मृति के खात्मे पर जोर दिया ताकि नारी स्वातंत्रता या सशक्तीकरण की बाधाएं दूर की जा सके. भाजपा इसे ले उड़ी है.
पहली बात तो यह है कि राहुल गांधी को भारतीय दर्शन, सनातन और भारतीय मनीषा के बारे में कुछ मालूम ही नहीं है. यदि उन्हें इन सबके बारे में थोड़ा-बहुत भी ज्ञात होता तो वह नारी स्वाभिमान और मर्यादा को लेकर उस मनुस्मृति की आलोचना कदापि नहीं करते जिसमें कहा गया है कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता". यानी जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं. फिर जिस धर्म में शक्ति, विद्या और एश्वर्य की प्रदाता तीन देवियां दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी ही हैं, उस धर्म की आलोचना इस आधार पर कैसे की जा सकती है कि वहां नारी उपेक्षित है.
जहां आराध्य देवों के नाम का प्रारंभ उनकी पत्नियों के नाम से शुरु होता है, वहां भी आलोचना की जगह तलाशना निहायत बेवकूफी है. इससे भी ज्यादा आपत्तिजनक यह रहा कि जिस मंच से राहुल गांधी सनातन को गरिया रहे थे, उस मंच पर उनके साथ लाबादा (हिजाब) लपेटे एक लड़की खड़ी थी. क्या राहुल गांधी यह कहने की हिमाकत कर सकते हैं कि शरिया का यह फरमान लड़कियों, महिलाओं पर थोपना नाजायज है? नहीं कह सकते.
जब उनके पिताजी ने शाहबानो मामले में मौलवियों के दबाव में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदल दिया था, तब राहुल गांधी की बिसात ही क्या है? जिस मजहब में महिलायें मस्जिद में प्रवेश नहीं कर सकतीं, उसके बारे में चुप्पी क्यों? इसका मतलब यह हुआ कि मनुस्मृति मुर्दाबाद और शरिया जिंदाबाद की फिरकापरस्त सियासत राहुल गांधी नहीं छोड़ेंगे.
भाजपा यही तो चाहती है और राहुल का यही रवैया सारे किये-कराये पर पानी फेर देता है. भाजपा ऐसी अनेक घटनाओं को उदाहरण के साथ पेश करते हुए कांग्रेस को सनातन विरोधी और मुस्लिम परस्त साबित करने में लग गयी है. राहुल चाहते तो बिना मनुस्मृति का नाम लिये भी नारी सशक्तीकरण की बात उठा सकते थे, लेकिन ऐसा लगता है कि जब तक वह सनातन को सौ दो सो ग्राम गाली नहीं देंगे तब तक उनका सेक्युलरिज्म गाढ़ा ही नहीं होता है. कांग्रेस जब तक सनातन विरोध की मानसिकता को तिलांजलि नहीं देगी, वह लाख जतन कर ले, केंद्र की सत्ता में नहीं आयेगी.
जिन युवाओं, युवतियों की चर्चा राहुल कर रहे हैं, वो कोई स्वतंत्र इकाई नहीं हैं. इन सबका परिवार है, परिवेश है, पृष्ठभूमि है, उनका अपना समाज है, जाति है, मजहब है, रूढ़ियां भी हैं, परंपराएं हैं, उनके अपने विचार हैं, अपेक्षाएं हैं. आप चाहें तो इसे पूरा पैकेज कह सकते हैं. लेकिन इनमें से कोई एक कारक जब प्रबलता के साथ मन मिजाज मथने लगता है तब युवा शेष कारकों को स्वाहा करके आगे बढ़ जाता है.
भाजपा की खूबी यह है कि वह एक भारी-भरकम पैकेज लेकर मैदान में उतरती है. उसकी कोशिश होती है कि असमंजस में फंसा युवा मतदाता किसी न किसी मुद्दे पर उनके साथ खड़ा होने के लिए मजबूर हो जाये. पुणे में राहुल के कार्यक्रम के दूसरे दिन ही नागपुर में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस के नेतृत्व में 585 ध्वज वाहकों, 3500 ढ़ोल-ताशा वादकों के युवा मंथन कार्यक्रम के समापन में एशिया और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में प्रस्तुति दर्ज हो गयी है. इस कार्यक्रम का आकर्षण क्रिकेटर तिलक वर्मा थे. इसे जेन जी तक पहुंचने और जन संपर्क अभियान के रुप में देखा जा रहा है.
वैसे भी आरएसएस की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद देश का सबसे बड़ा छात्र संगठन है. विद्या भारती के स्कूलों की संख्या जोड़ दें तो कांग्रेस का पूरा संगठन इसमें समा जाएगा. हाल के वर्षों में भाजपा ने नेताओं की एक बड़ी कड़ी तैयार कर ली है. वे गांवों-कस्बों में बिना थके-हारे, ठुकराये जाने के बाद भी लगे रहते हैं. पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा (एनडीए) को युवाओं का करीब चालीस फीसदी वोट मिला था और कांग्रेस अपने गंठबंधन के साथ बीस फीसदी पर ही ठिठक गयी थी. इसी बीच सी वोटर का सर्वे भी आ गया है. जिसका मानना है कि अभी चुनाव हो जाय तो फिर एनडीए की ही सरकार बनेगी.
दरअसल, हमारा देश लफुझन्नों को पसंद नहीं करता है. यह एक सांस्कृतिक राष्ट्र है. यहां मर्यादाएं टूटती हैं तो विरोध की नयी कोंपलें स्वतः फूट पड़ती हैं. कांग्रेस और उसके नेता यह मानते ही नहीं हैं कि मंडल की राजनीति ने मंदिर की राजनीति के बाद अपनी त्वरा खो दी है. भाजपा मंडल और कमंडल का नया पैकेज लेकर मैदान में उतरी है जो राष्ट्रवाद की चाशनी में डूबा होता है. राहुल गांधी को जब भी मौका मिलता है पता नहीं क्यों राष्ट्रवाद पर ही नाखून गड़ा बैठते हैं. आज के युवा मोदी का मीम भी देखते है और राहुल का चुटकुला भी सुनते है. वे पोडकास्ट पर भी नजर डालते है, लेकिन वे क्षण भर से ज्यादा कहीं टिकटे नहीं है. वे करते अपने मन की है.
सही है कि महंगाई बढ़ रही है. सरकारी नौकरियां घट रही हैं. यह जानने के लिए इंस्टाग्राम पर जाने और नेताओं के वादे-बयानों के फैक्ट चेक के लिए मोबाइल देखने की भी जरूरत नहीं है. लेकिन सरकार पर हमला भी तो इन्हीं मुद्दों पर बोलना चाहिए. बेमतलब मनुस्मृति, सनातन वगैरह को छेड़ने से आम जरूरत के मुद्दे स्वाभाविक रुप से ओझल हो जायेंगे.
दूसरी बात यह है कि कांग्रेस अपने शासन वाले राज्यों में से किसी एक को भी मॉडल के रुप में पेश कर भाजपा को जवाबदेह बनाने की पहल क्यों नहीं कर रही है? जो जमीन कांग्रेस के लिए खुरदरी है, उस पर जाने से गुरेज करना ही फायदेमंद होगा. पता नहीं किस महानुभाव ने राहुल को यह सुझाव दे दिया कि लगे हाथ सनातन पर हमला बोल दीजिए? वैसे भी देश संविधान से चल रहा है. किसी धर्मग्रंथ के आधार पर कोई फैसला नहीं हो रहा है. इस मामले में किसी को छूट मिली भी है तो मुस्लिम समाज को. फिर कांग्रेस के नेता बार-बार आत्मघात करेंगे तो जहां हैं, वहां से आगे हरगिज नहीं बढ़ पायेंगे, क्योंकि चुनाव के दौरान जितने बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण होता है और होगा भी, उसमें कांग्रेस को अपने लिए रास्ता बनाना कठिन हो जाएगा.