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दुमका : नामचीन लेखकों व कवियों ने साहित्य प्रेमियों का दिल जीता

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Dumka : दुमका के राजकीय पुस्तकालय में आयोजित साहित्य महोत्सव के दूसरे दिन रविवार 17 अप्रैल को इसमें शिरकत करने आए नामचीन लेखकों व कवियों ने साहित्य प्रेमियों का दिल जीत लिया. महोत्सव में लेखकों के संस्मरण, यात्रा वृत्तांत और अन्य बातें सुनकर साहित्य प्रेमी उत्साहित नजर आए. दो दिवसीय महोत्सव की शुरूआत शनिवार 16 अप्रैल को हुई थी. रविवार 17 अप्रैल के इसका समापन संध्या काव्य पाठ के साथ होगी. महोत्सव में देश-विदेश के नामचीन लेखकों व कवियों ने भाग लिया. दूसरे दिन प्रथम सत्र में ‘पुस्तकों के इतिहास’ पर परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें प्रोफ़ेसर अच्युत चेतन और अभिजीत गुप्ता ने विचार व्यक्त किए. कहा कि पहले तांब और भोज पत्र पर पुस्तकें लिखी जाती थी. समय के साथ बदलाव आया और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल किताब तक बात आई. पुस्तकों का इतिहास हज़ारों साल का इतिहास रहा है. पुस्तकें ज्ञान बढ़ाती. डिजिटल दौर में पुरानी और दुर्लभ पुस्तकों को बचाना जरूर आसान हुआ है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक फॉर्मेट में चीज़ें समय-समय पर बदलती रहती है. इस वजह से पुस्तकों को लंबे समय तक बचाना कठिन होता है. ऐसे में प्रिंटेड पुस्तकों का स्थायी महत्व है. कहते हैं अक्षर का क्षय नहीं होता है. पुस्तकों के इतिहास को समझने के लिए समाज के इतिहास को समझना पड़ेगा. समाज का इतिहास जानने के लिए किताबों का इतिहास जानना महत्वपूर्ण है.

पुस्तकों के इतिहास को समझने के लिए समाज का इतिहास समझना जरूरी

दूसरे सत्र का विषय ‘हिंदी कविता का सौंदर्य आलोक’ था. इस सत्र में कवि विनय सौरभ एवं कथाकार रणेंद्र ने शिरकत की. सत्र का संचालन प्रोफ़ेसर यदुवंश प्रणय ने किया. रणेंद्र से यदुवंश ने पूछा कि आज की कविताओं के सामाजिक सरोकार और उसके सौंदर्य को लंबी कविताओं के परिपेक्ष्य में कैसे देखते हैं? उत्तर देते हुए रणेंद्र ने कहा कि परिवेश को समझना जरूरी है तभी शब्दों को समझा जा सकता है. भाषा की ताकत को महसूस करने पर कविता के सौंदर्य बोध को समझा जा सकता है. आजादी के बाद हिंदी कविताओं में सामाजिक सरोकार का दायरा बढ़ा है. मुक्तिबोध की कविता ‘अंधरे में’ तथा धूमिल की कविता ‘पटकथा’ को इस संदर्भ में देखा परखा जा सकता है. यह दोनों कविताएं उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उस वक़्त थी. इसी सत्र में सवाल का जवाब देते हुए विनय सौरभ ने कहा कि हिंदी कविता की नई पीढ़ी बहुत ही सशक्त और समृद्ध रही है. आज काफी कुछ लिखा जा रहा है, लेकिन पठनीयता का संकट इस दौर की महत्वपूर्ण समस्या है. सोशल मीडिया ने लेखकों को बड़ा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया है, लेकिन उसके खतरे भी हैं. खतरे इस वजह से वहां कोई संपादक नहीं होता. ऐसे में बेहतर विषय-वस्तु का चयन करना कठिन हो जाता है. तीसरा सत्र फ़ूड एंड लिटरेचर अर्थात् खानपान एवं साहित्य पर केंद्रित था. इस सत्र में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार पुष्पेश पंत ने दिल्ली से ऑनलाइन जुड़कर अपने विचार रखे. खानपान और साहित्य के संबंधों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय खानपान में विविधता और बहुलता है, लेकिन साहित्य में यह नहीं झलकता. कई महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं जिसमें व्यंजनों की सुगंध मौजूद है. पुस्तकों में खानपान का वर्णन है. पर्व त्योहार और उपवास के अवसर पर विभिन्न व्यंजनों के स्वाद की जो अनुभूतियां हैं उसे महसूस कराने का कार्य भी साहित्य ने किया है. लोक कथाओं और लोक गीतों में भी छप्पन भोग की बातें कही गई है. इस तरह हमलोग खानपान और साहित्य के संबंधों को समझ सकते हैं. आदिवासी साहित्यकार महेंद्र बेसरा ने कहा कि जिला प्रशासन की ओर से आयोजित यह कार्यक्रम संथालपरगना के लिए महत्वपूर्ण है. आगे भी आयोजन होते रहना चाहिए. मैंने बहुत सारे किताबें पढ़ी है. महोत्सव में शामिल होकर बहुत कुछ सीखने को मिला. बहुत सारी वैसी बातों की चर्चा हुई जो पुस्तकों में नहीं है. महोत्सव के सफल आयोजन पर डीसी रविशंकर शुक्ला ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्यकारों की टीम की वजह से आयोजन सफल रहा. अंग्रेजी के वरिष्ठ साहित्यकार चंद्रहास चौधरी पिछले कुछ समय से आयोजन को लेकर दुमका में डटे थे. आयोजन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह">https://lagatar.in/wp-admin/post.php?post=288174&action=edit">यह

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