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दुमका: बड़ी कठिन है डगर पनघट की, दूषित पानी पीने को मजबूर आदिम जनजाति

Pravin Kumar Dumka: बरसात का मौसम हो लेकिन पेयजल के लिए तरसना पड़े तो इससे बड़ी समस्या क्या हो सकती है. यह हकीकत है दुमका जिला के गोपीकांदर प्रखंड स्थित टांयजोड़ पंचायत के दुवरिया गांव का. गांव में 110 आदिम जनजाति परिवार रहते हैं. यह प्रखंड मुख्यालय से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर है. फिर भी इन्हें पीने के साफ पानी के लिए कठोर मेहनत करनी पड़ती है. इतना ही नहीं जान जोखिम में डालकर ग्रामीण पहाड़ी रास्ते से पानी लाते हैं.

चापाकल खराब, ग्रामीण परेशान

दुवरिया गांव मे तीन टोले हैं. समे गाडा टोला में 46 परिवार, ताला टोला में 40 जबकि प्रधान टोला 24 परिवार रहते हैं. जीवन की मूलभूत आवश्यताओं में से एक पानी के लिए इन्हें तरसना पड़ता है. गांव में पानी की घोर समस्या है. ग्रामीणों की माने तो सभी चापाकल वर्षो से बेकार पड़े हुए हैं. गांव में 20-25 साल पहले चापाकल लगाया गया था, लेकिन विभागीय लापरवाही की वजह से कभी मरम्मत नहीं हुआ. ग्रामीण अबतक अपने पैसों से ही चापाकल को ठीक कराते आये हैं. लेकिन अब कोई चापाकल काम नहीं करता, क्योंकि चापाकल का पाइप ही सड़ चुका है. इसे भी पढ़ें-PMLA">https://lagatar.in/scs-decision-on-pmla-did-not-go-down-well-with-the-opposition-17-parties-said-hands-of-the-government-engaged-in-politics-of-vendetta-will-be-stronger/">PMLA

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पानी टंकी भी शोभा की वस्तु

गाडा टोला स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में बिजली चालित टंकी भी लगा हुआ है लेकिन वह भी करीब एक वर्ष से ख़राब है. ग्रामीणों ने पानी की समस्या को लेकर वार्ड और मुखिया से कई बार गुहार लगा चुके हैं, लेकिन वही ठाक के तीन पात. किसी ने इसकी सुधि नहीं ली. अब जीने के लिए ग्रामीण डडी, डोभा, सिंचाई कुआं और नदी के दूषित पानी पर निर्भर हैं.

दूषित पानी से सेहत पर असर

ग्रामीणों का कहना है कि इन सभी स्रोतों का पानी पीने लायक नहीं है. लेकिन वो मजबूर हैं. दूषित पानी पीने और दैनिक दिनचर्या में इसके उपयोग से आदिम जनजाति के लोगों की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ता है. लोगों बीमारियों के मकड़जाल में उलझ कर रह जाते हैं. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/aaaa-4.jpg"

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जान जोखिम में डालकर लाते हैं पानी

दूषित पानी के लिए भी आदिम जनजाति के लोगों को घनघोर परिश्रम करना पड़ता है. डडी, डोभा और नदी के पानी को लाने के लिए एक किलोमीटर उबर-खाबर पथरीला रास्ता तय करना पड़ता है. ये रास्ता घनघोर जंगल से होकर गुजरता है. ये जोखिम भरा भी होता है. जरा सी असावधानी से जान जोखिम में पड़ जाता है. इसे भी पढ़ें-कर्नाटक">https://lagatar.in/brainstorming-to-return-in-karnataka-rahul-gandhi-said-work-together-against-bjps-misrule-stay-united/">कर्नाटक

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“कृपया लगा दें चापाकाल”

ऐसा नहीं है कि गांववाले प्रशासन, पंचायत और जनप्रतिनिधियों से गुहार नहीं लगाते. गुहार लगाते-लगाते ये लोग थक चुके हैं. ग्रामीण कहते हैं कि प्रशासन साफ पानी के लिए चापाकल लगा दे. नया पाइप डालकर पुराने की मरम्मति करवा दे. सभी टोले में सोलर से संचालित पानी टंकी दिया जाय. लेकिन कुंभकर्णी नींद में पड़े बाबू उनकी बातें सुने तब तो. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/aaa-2-1.jpg"

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टोलावार चापाकलों की वर्तमान में स्थिति

-गाडा टोला में कुल पांच चापाकल और एक बिजली चलित मोटर है. सभी ख़राब है -खडू सोरेन के घर के सामने का चापाकल करीब एक वर्ष से ख़राब है. -होपना हेम्ब्रोम के घर के सामने का चापाकल करीब एक वर्ष से ख़राब है. -सपल हांसदा के घर के सामने का चापाकल करीब तीन वर्ष से ख़राब है. -विलसन बास्की के घर के सामने का चापाकल करीब दो वर्ष से ख़राब है. -प्राथमिक विद्यालय, दुवरिया का चापाकल करीब एक वर्ष से ख़राब है. -आंगनबाड़ी में लगा बिजली चलित मोटर करीब एक वर्ष से ख़राब है. -ताला टोला में कुल तीन चापाकल हैं. एक ख़राब है और अन्य 2 की स्थिति ठीक नहीं है. -फूलचंद मड़ैया के घर के सामने का चापाकल ठीक से पानी नहीं दे रहा है. -बदरू हेम्ब्रोम के घर के सामने का चापाकल करीब दो वर्ष से ख़राब है. -बजल टुडू के घर के सामने का चापाकल मात्र पांच-छ: बाल्टी पानी देता है, उसके बाद बंद हो जाता है. उसके बाद फिर एक घंटा के बाद पांच-छह बाल्टी पानी देता है. इतना ही नहीं चापाकल का पानी बाल्टी में कुछ देर रखने पर लाल हो जाता है. https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/aaa-6.jpg"

alt="" width="600" height="350" /> -प्रधान टोला में कुल दो चापाकल हैं. दोनों ही ख़राब हैं. -संग्राम हेम्ब्रोम के घर के सामने का चापाकल करीब तीन वर्ष से ख़राब है. -धानेश्वर मरांडी के घर के सामने का चापाकल करीब चार वर्ष से ख़राब है. [wpse_comments_template]

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