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ED की जांच में बोकारो की 103 एकड़ वन भूमि हड़पने को रची गयी साजिश का हुआ पर्दाफाश

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Ranchi: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में बोकारो की 103 एकड़ वन भूमि हड़पने के लिए रची गयी साजिश का पर्दाफाश हुआ है. साथ ही इस वनभूमि की बिक्री से 500 करोड़ रुपये की अवैध कमाई की जानकारी मिली. जांच के दौरान इस वन भूमि के सरेंडर होने से पहले ही नीलामी में खरीदे जाने और म्यूटेशन के लिए अंचल अधिकारी को पैसा देने की पुष्टि हुई.


फर्जी दस्तावेज के सहारे बोकारो जिला के तेतुलिया मौजा की जमीन बिक्री से संबंधित मामलों की जांच में पाया गया है कि इजहार हुसैन ने वर्ष 2008 से ही इसकी बिक्री शुरू कर दी थी. जबकि म्यूटेशन चार साल बाद हुआ. सिर्फ इतना ही नहीं इस जमीन के मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद ही जमीन की खरीद बिक्री होती और अधिकारियों की मिलीभगत से म्यूटेशन भी होता रहा.


 प्राथमिकी दर्ज होने के बाद बेबी देवी ने पांच डिसमिल जमीन खरीदी. दस्तावेज में जमीन की कीमत 2.50 लाख रुपये दिखाया गया है. हालांकि ईडी द्वारा की गयी पूछताछ के दौरान बेबी देवी ने 22.50 लाख रुपये देने की बात स्वीकार की. इजहार हुसैन ने भी ईडी द्वारा की गयी पूछताछ के दौरान वर्ष 2008 से जमीन बेचने की बात स्वीकार की. 


ईडी ने खरीद बिक्री से संबंधित जांच में पाया कि फर्जी दस्तावेज के सहारे जमीन पर कब्जा जमाने के बाद सर्किल रेट से करीब 11 गुना अधिक दाम पर इसकी बिक्री की गयी. प्राथमिकी दर्ज होने के बाद 20 लोगों को जमीन बेची गयी. जमीन खरीदने वालों में सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं. खरीद बिक्री के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद ईडी ने जमीन की इस हेराफेरी में 500 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई का अनुमान किया है.


ईडी ने जांच में पाया कि इज़हार हुसैन व अन्य इस वनभूमि पर दावा करने के लिए पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला के रजिस्ट्री कार्यालय से वर्ष 1933 में नीलामी में खरीदने से संबंधित दस्तावेज़ को आधार बनाया गया. इज़हार हुसैन व अन्य की ओर से इसके लिए नीलामी पत्र संख्या 191/1933 को आधार बनाया गया. इस पर नीलामी की तिथि 20-10-1933 दिखायी गयी. साथ ही इसे पुरुलिया के जिला कलेक्टर द्वारा 23-10-1933 को समीर महतो उर्फ समरुद्दीन अंसारी के पक्ष में जारी दिखाया गया. 


ईडी ने पुरुलिया स्थित रजिस्ट्री कार्यालय में इस दस्तावेज और जमीन से संबंधित ब्योरे की जांच की. इसमें यह पाया गया कि संबंधित जमीन 25-11-1933 को सरेंडर किया गया था. यानी जमीन की नीलामी उसे सरेंडर करने से पहले कर दी गयी. यह कानूनी रूप से गलत है. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि नीलामी से संबंधित फर्जी दस्तावेज सुनियोजित साजिश के तहत तैयार किया गया था.

 

म्यूटेशन से संबंधित मामले की जांच में पाया गया कि इजहार हुसैन व अन्य के नाम पर जिस म्यूटेशन केस के सहारे नामांतरण किया गया था उसे इजहार हुसैन ने दायर ही नहीं किया गया था. जांच के दौरान इस बात की पुष्टि हुई कि म्यूटेशन केस नंबर 1317(VII)/2012-13  डिमपल देवी नामक महिला ने अपनी जमीन के मामले में दायर किया था. बाद ने इसे मिटाकर हुसैन ब्रदर्स का नाम लिखा गया.


फॉरेंसिक जांच में इस जालसाजी की भी पुष्टि हुई है. जमीन के म्यूटेशन के आरोप में सरकार द्वारा तत्कालीन अंचल अधिकारी निर्मल टोप्पो को बर्खास्त किया जा चुका है. इस मामले में संबंधित पक्षों के बैंक खातों की जांच के दौरान म्यूटेशन की अवधि में अंचल अधिकारी के खाते में ज़मीन से संबंधित लोगों द्वारा पैसा ट्रांसफ़र करने के सबूत मिले हैं.


ईडी ने जमीन के वनभूमि होने या नहीं होने के बिंदु पर भी जांच की. इसमे या पाया गया कि इजहार हुसैन द्वारा जालसाजी कर हड़पी गयी  103 एकड़ जमीन पहले प्राइवेट फॉरेस्ट थी. बिहार सरकार ने 28-4-1947 को जारी अधिसूचना संख्या 4466-VIF-29/47-R जारी कर इसे प्राइवेट फॉरेस्ट घोषित था.  


इसके बाद सरकार ने 24-5-1958 को अधिसूचना संख्या CF-17014/58/1429-R जारी कर इसे प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट घोषित किया. जमीन से संबंधित दस्तावेज की जांच में पाया गया कि वर्ष 1947 में जमीन के मालिकों के रूप में  शालू महतो, साहेब राम, कांदू सिंह, भिखारी सिंह, दुखी सिंह, छोटू सिंह, राम सिंह का नाम दर्ज है. इसमें समीर महतो का नाम नहीं है.

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