हाथी के ट्रेडिशनल-वे हुए प्रभावित, मगर हाथी कोरिडॉर पर नहीं हुआ काम
Kaushal Anand Ranchi: हाल के वर्षों में हाथी का इंसानी आबादी पर हमला बढ़ा है, गांव तो गांव अब तो शहर में भी हाथी प्रवेश कर रहे हैं. भारी संख्या में जान-मान की क्षति पहुंचा रहे हैं. इससे हाथी जोन वाले क्षेत्रों में लोगों का रहना कठिन हो गया है. हाल में ही नगड़ी प्रखंड में हाथियों ने चार लोगों पर हमला किया, जिसमें तीन की मृत्यु हो गयी. एक रिम्स में इलाजरत है. हाथी इतने गुस्से में थे कि एक शव को अपने कब्जे में तीन दिन तक रखा. झारखंड में यह समस्या अब नासूर बन चुकी है. अगर अब इसको लेकर ठोस पहल नहीं हुई तो आने वाले दिनों में हाथी-मानव संघर्ष बढ़ेगा, जिसमें इंसानों को भारी नुकसान होने की आशंका है. हाथियों की हिंसा से अभी झारखंड में औसतन हर साल करीब 60 मौतें हो रही हैं. हाथियों के आवागमन के ट्रेडिशनल-वे तो विकास और मानव जाति के बढ़ते प्रभाव के कारण बंद हुए, प्रभावित हुए. हाथी कोरिडोर निर्माण को लेकर बहुत सारी घोषणाएं हुई, मगर धरातल पर इसे नहीं उतारा जा सका. जिसका खमियाजा हाथी एवं मानव दोनों उठा रहे हैं. बढ़ते खनन, हाईस्पीड सड़कें, सड़क कोरिडॉर और बढ़ती आबादी के कारण हाथियों का पूर्व से चिन्हित मार्ग पर अतिक्रमण हो चुका है. जो रास्ते हाथियों के हुआ करते थे, वहां अब सड़क बन गये, पुल-पुलिया बन गये या फिर इंसानी बस्तियां बस गईं . इसके कारण हाथी सीधे तौर पर अब अपने चिन्हित मार्ग न देख कर गांव-खेत, खलियान में घुस रहे हैं. फसलों को रौंद रहे हैं, लोगों को मार रहे हैं. यानि, उनके मार्ग में जो भी आ रहा है, हाथी उसे तहस-नहस कर रहे हैं. वाइल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के सर्वे के अनुसार झारखंड में हाथियों के मार्ग में आने वाले गांवों के ग्रामीणों द्वारा विरोध किए जाने के कारण वन विभाग हाथियों के लिए कोरिडॉर बनाने में विफल रहा. झारखंड फॉरेस्ट विभाग के अनुसार देश के 11 प्रतिशत हाथी मध्य पूर्वी भारतीय क्षेत्र के पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में है. हाथी के हमले के 50 प्रतिशत से अधिक इन्हीं क्षेत्रों में होते हैं. वन विभाग इसे रोकने के लिए अंतर्राज्यीय समन्वय स्थापित करते हुए योजना बना रहा है. हाथी कहां अधिक विचरण कर रहे हैं झारखंड में हाथी सबसे अधिक वर्तमान में टुंडी-जामताड़ा, धनबाद, दुमका, मसलिया एरिया, जमशेदपुर से पश्चिम बंगाल, हजारीबाग-चतरा, लोहरदगा-रांची में अधिक भ्रमण कर रहे हैं. इन रूटों में हाथी साल में कम से कम दो से तीन बार अवश्य विचरण करते हैं. ये पुराने मार्ग हुए प्रभावित वन विभाग सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अगर झारखंड और झारखंड के सीमा से जुड़े राज्यों की बात करें तो रांची में अनगड़ा, सोनाहातू, सिल्ली, पुरूलिया हाथी के पुराने निर्धारित मार्ग हुए विचरण करते थे, मगर अब इन क्षेत्रों में सड़क, पुल-पुलिया और मानव जाति के दखल के कारण मार्ग करीब-करीब बंद हो चुके हैं. यही हाल खूंटी-तोरपा भाया नगड़ी-लोहरदगा एरिया का भी है. हजारीबाग जंगलों के शहर रूप में जाना जाता था. मगर अब हजारीबाग का विस्तार सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक हो चुका है. इस कारण मार्ग प्रभावित हुए और हाथी अब हजारीबाग के शहर में प्रवेश कर रहे हैं. सरायकेला और चाईबासा के पुराने जंगल के रूट करीब-करीब अवरूध हो चुके हैं. यही हाल छत्तीसढ़ से सटे जिलों का है. फॉरेस्ट ऑफिसर नाम कोट नहीं करने की शर्त पर बताते हैं कि स्थिति काफी गंभीर हो चुकी है. अब समय आ गया कि हाथियों के लिए नये कोरिडॉर डेवलप हों. झारखंड में हाथियों की संख्या करीब 600 वन विभाग के अनुसार झारखंड में हाथियों की संख्या करीब 550 से 600 है. हाथी कभी हमलावर नहीं होते हैं. जानकारी के अनुसार हाथी कम से कम 50-60 की झूंड में विचरण करते हैं. वे अपने निर्धारित मार्ग पर ही चलना चाहते हैं. जब उनके मार्ग में अवरोध आता है तो वह भटकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं. लोग हाथियों को देखकर उनसे बचने के लिए उनपर हमला करते हैं. जिससे हाथी उत्तेजीत होकर लोगों पर हमला करते हैं. वन क्षेत्र बढ़े फिर भी भटक रहे हैं हाथी इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट सर्वे के अनुसार झारखंड में 2015 से 2021 के बीच वनक्षेत्र 23,478 वर्गकिलोमीटर से बढ़कर 23,716 वर्ग किलोमीटर तक हो गया है. इसके बावजूद इंसानों और जंगली जानवरों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं. इसका मुख्य कारण जंगली जानवरों के कॉरिडॉर्स पर अतिक्रमण, जंगली जानवरों के लिए घटता खाना और रहने की जगह, हाथियों का इंसानों से संघर्ष है. वर्ष 2009-2022 तक हाथियों से संघर्ष में हुई मौतें 2009-10 : 54 2010-11 : 69 2011-12 : 62 2012-13 : 60 2013-14 : 56 2014-15 : 53 2015-16 : 66 2016-17 : 59 2017-18 : 78 2018-19 : 71 2019-20 : 60 2021-22 : 60 क्या कहते हैं सेवानिवृत फॉरेस्ट अफसर फॉरेस्ट विभाग के रिटायर्ड पीसीएफएफ पीके श्रीवास्तव ने बताया कि ऐसा नहीं है कि झारखंड में वन भूमि में बहुत अधिक कमी आयी है. हाथियों के का शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रवेश का मुख्य कारण है उनके ट्रेडिशनल मार्ग को रोका जाना. जब हाथी अपना निर्धारित रूट नहीं पता है तो भटक जाता है. हाथियों के लिए वैकल्पिक कोरिडॉर योजना पर गंभीरता से काम करना होगा. [wpse_comments_template]

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