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encounter, यह fast food justice है, food poisoning का खतरा हमेशा रहता है

मानसिक रुप से विक्षिप्त भरत तिवारी और मुठभेड़ में मार गिराने वाली पुलिस.
  • शिक्षा मंत्री का बयान सड़ी हुई व्यवस्था की स्वीकारोक्ति है.

Gyanendra Awasthi

 

जब राज्य खुद जल्लाद बन जाए.

 

भरत भूषण तिवारी अब नहीं रहे. 

 

उनके Facebook profile पर scroll करने पर पता चला कि वे योगी आदित्यनाथ की encounter policy के समर्थक थे.

 

आज उन्हीं की नीति ने उन्हें निगल लिया.

 

यह विडंबना नहीं है. यह चेतावनी है.

 

हाफ encounter, फुल मौत.

 

बिहार में पिछले दो महीनों में 13 encounters हुए. चार में मौत. बाकी में पैर में गोली- जिसे अब "हाफ encounter" कहते हैं.

 

भरत तिवारी के मामले में पुलिस ने पैर में गोली मारी. लग गई पेट में. हाफ, फुल बन गया.

 

वायरल video में वे पिस्तौल फेंकते नजर आ रहे थे.

 

फिर भी गोली चली.

 

बिहार के शिक्षा मंत्री ने कहा- बच्चे का encounter नहीं होना चाहिए था, बहुत जरूरी था तो हाफ करते. यानी हाफ encounter तो स्वीकार्य है. सिर्फ पूरी मौत पर आपत्ति है.

 

यह बयान किसी मंत्री का नहीं- एक सड़ी हुई व्यवस्था की स्वीकारोक्ति है.

 

कानून नहीं, इशारा चलता है.

 

IPS अधिकारी अभयानंद, जिन्होंने नीतीश के पहले कार्यकाल में कानूनी तरीकों से बिहार में अपराध नियंत्रण किया, उनसे जब पूछा गया तो उन्होंने कहा- "अगर सरकार encounter की वकालत करती है तो विधानसभा में कानून पारित करे. ये नहीं कि पुलिस के मत्थे सब मढ़ दें. जो encounter पसंद आए वह ठीक, जो न आए उसमें पुलिस पर गाज गिरे."

 

लेकिन नए CM सम्राट चौधरी ने विधानसभा में कानून नहीं बनाया.

 

बस इशारा किया. पुलिस समझ गई.

 

यही सबसे खतरनाक शासन-पद्धति है, जहां हत्या का आदेश लिखित नहीं होता, सिर्फ implied होता है.

 

Bulldozer और encounter. एक ही सोच के दो हथियार.

 

Encounter में राज्य न्यायाधीश बनता है.

 

Bulldozer में राज्य जल्लाद और executor एक साथ.

 

दोनों में अदालत अनुपस्थित है.

 

दोनों में आरोप सिद्ध होने से पहले सज़ा दी जाती है.

 

दोनों में भीड़ तालियां बजाती है.

 

यही वह क्षण है जब लोकतंत्र और तालिबान के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है.

 

तालिबान भी "त्वरित न्याय" देता है.

 

तालिबान भी कहता है कि अदालतें सुस्त हैं.

 

तालिबान भी जनता की भावनाओं का हवाला देता है.

 

फर्क सिर्फ पोशाक का है. वहां दाढ़ी और AK-47, यहां खाकी और Bulldozer.

 

असली बीमारी- न्याय व्यवस्था का पतन.

 

लोग encounter को "त्वरित न्याय" इसलिए मानने लगे हैं क्योंकि अदालतों में न्याय मिलने में दशकों लग जाते हैं. पैसे वाले बच निकलते हैं. गरीब सड़ते रहते हैं.

 

इस दर्द को समझा जा सकता है.

 

लेकिन इस दर्द का इलाज encounter नहीं है.

 

यह fast food justice है, जिसमें food poisoning का खतरा हमेशा रहता है.

 

आज भरत तिवारी मरे.

 

कल कोई निर्दोष मरेगा.

 

परसों पुलिस वाला किसी पुरानी दुश्मनी का हिसाब चुकाएगा.

 

और सरकार कहेगी- "हमें पता नहीं था."

 

संविधान खामोश नहीं है- हम खामोश हैं.

 

संविधान कहता है- कोई भी व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक अदालत उसे दोषी न ठहराए.

 

Encounter इस बुनियाद को नष्ट करता है.

 

Bulldozer इस बुनियाद को रौंदता है.

 

और हम- जो encounter का समर्थन तब तक करते हैं जब तक वह हमारे "दुश्मन" पर चलता है. हम इस बुनियाद की एक-एक ईंट खुद उखाड़ रहे हैं.

 

भरत भूषण तिवारी ने भी यही किया था.

 

जो व्यवस्था आज दूसरों को निगल रही है, वह कल आपको भी नहीं पहचानेगी.

 

एनकाउंटर किसी का भी हो, गलत है. बुलडोजर किसी का भी घर तोड़े, असंवैधानिक है. और जो सरकार कानून की जगह इशारों से चलती है- वह लोकतंत्र नहीं, किसी और चीज का नाम है.

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