इंजीनियरिंग फेल, एजेंसी पास
Amit Singh Ranchi : झारखंड के पथ निर्माण विभाग, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग और जल संसाधन विभाग में नई परिपाटी शुरू हुई है. पहले चहेतों का एनकेन प्रकारेन करोड़ों का काम आवंटित किया जाता है. इसके बाद जब काम समय पर पूरा नहीं होता है, घटिया निर्माण की वजह से निर्माण क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में काम करनेवाली एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती. दिखावे के लिए कागजी खानापूर्ति की जाती है. जांच के लिए कमेटी बनती है. दोषी ठहराए जाने से पहले ही काम करने वाली एजेंसी से विभाग में शपथ पत्र (एफिडेविट) ले लिया जाता है. उस शपथ पत्र के आधार पर घटिया निर्माण कर सरकारी कोष को करोड़ों का नुकसान पहुंचाने वाली एजेंसी को माफी मिल जाती है. एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई ठंढे बस्ते में चली जाती है. ऐसे में जिम्मेवार अफसर भी बच जाते हैं.करोड़ों की अनियमिता पर पर्दा डालने का खेल
प्रदेश में शपथ पत्र लेकर एजेंसियों को क्षतिग्रस्त काम को फिर से बनाने का आदेश जारी किया जा रहा है. इससे योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को छिपाया जा रहा है.करोड़ों की अनियमितता पर पर्दा डालने का खेल चल रहा है. आए दिन करोड़ों रुपये की लागत से बने पुल-पुलिया ढह जाते हैं, नहरें टूट जाती है, नदी में पेयजल का निर्माणाधीन संप बह जाता है, समय से पहले सड़कें खराब हो जाती है, तो इसके लिए इंजीनियरिंग विंग की खामियों को ढूंढने और दोषियों को चिह्नित करने की जगह व्यक्तिगत खर्च पर योजना का पुनर्निर्माण एजेंसी से करवाया जा रहा है. दोषी इंजीनियर और एजेंसी (ठेकेदार) खुद को बचाने के लिए क्षतिग्रस्त योजना का पुनर्निर्माण करा रहे हैं.इंजीनियरिंग विंग की कमजोरी आ रही है सामने
सरकार की किसी भी योजना को धरातल पर उतारने से पहले इंजीनियरिंग विंग बड़े पैमाने पर एक्सरसाइज करती है. योजना में उपयोग होने वाले मैटेरियल, स्थान और उससे जनता को होने वाले फायदे का आकलन किया जाता है. निर्माण से संबंधित योजनाओं में सॉइल (मिट्टी) टेस्ट से लेकर निर्माण तक की मॉनिटरिंग इंजीनियर खुद करते हैं. इतना सब कुछ होने के बाद भी करोड़ों रुपये से बनाए गए पुल ढह जाते हैं. भवन गिर जाता है. इसका एकमात्र कारण है घटिया इंजीनियरिंग.करोड़ों का नुकसान क्यों उठा रही हैं एजेंसियां
ज्यादा कमीशन के लालच में इंजीनियर क्वालिटी पर ध्यान नहीं देते हैं. जब योजना धराशायी हो जाती है, तो अपनी घटिया इंजीनियरिंग छिपाने के लिए पुनर्निर्माण कराकर पर्दा डाल देते हैं. कई उदाहरण भी मिले, जिनमें एजेंसी द्वारा पुनर्निर्माण पर करोड़ों रुपये व्यक्तिगत तौर पर खर्च किए जा रहे हैं. जिससे एजेंसी को लाभ होने की बजाए करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है. यह सारी कवायद ठेकेदार को कार्रवाई से बचाने के लिए की जा रही है. केस स्टडी-1 चक्रधरपुर के हिजिया गांव में नल जल योजना के तहत करोड़ों का काम चल रहा है. मासूस इंटरप्राइजेज नामक कंपनी काम कर रही है. योजना के तहत शौचालय की टंकी के ढक्कन को स्टैंड पोस्त का प्लेटफार्म बना दिया गया. अफसरों ने जांच में पाया कि एजेंसी द्वारा घटिया काम किया जा रहा है. पेयजल के जिम्मेवारों ने किए गये कार्यों के प्रति असंतोष जताते हुए एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की. जांच भी हुई. मगर अचानक कार्रवाई बंद हो गई. क्योंकि काम करने वाली एजेंसी ने घटिया निर्माण को अपने खर्च पर फिर से बनाने का प्रस्ताव दे दिया. इसके बाद एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया बंद हो गई. वहीं एजेंसी को घटिया निर्माण छुपाने का अवसर भी मिल गया. केस स्टडी-2 दुमका स्थित मसानजोर डैम के मुख्य नहर मयूराक्षी नहर के एमएलबीसी के 62 चैन बंदकरेंडा गांव के पास क्षतिग्रस्त हो गया. नहर में लगाए गए स्लैब में दरार आ गई. दरार में मिट्टी घुसने से स्लैब टूट गई. सिंचाई विभाग ने नहर में पानी छोड़ना बंद कर दिया. सिंचाई विभाग के एसडीओ और जेई ने नहर में आये दरार का निरीक्षण किया. घटिया निर्माण को लेकर काम करने वाली एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की. मगर कार्रवाई से पहले से काम करने वाली एजेंसी ने नहर में आये दरार को अपने खर्च पर बनवाने का शपथ पत्र दे दिया. इसके बाद एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई बंद हो गई. जिन इंजीनियरों की देखरेख में घटिया निर्माण हुआ था, वैसे दोषी इंजीनियर भी कार्रवाई से बच गए. केस स्टडी-3 गत वर्ष अगस्त माह में बहुप्रतीक्षित गवाई बराज परियोजना का ट्रायल चल रहा था. 131 करोड़ की लागत से तैयार परियोजना का तकरीबन दो मीटर नहर का हिस्सा टूट कर बह गया. कई जगह दरारें भी आ गई. जबकि पूरी तरह नहर में पानी भी नहीं छोड़ा गया था. नहर टूटने की घटना चास प्रखंड के सिलफोर व डाबरबहाल गांव के बीच सियालगड़ा में हुई थी. काम करने वाली एजेंसी ने अपने खर्च पर क्षतिग्रस्त नहर को बनवाने का प्रस्ताव दिया. तो जल संसाधन विभाग के तेनुघाट बांध प्रमंडल के अफसरों ने नहर क्षतिग्रस्त के लिए ग्रामीणों को दोषी बता दिया. अफसरों ने रिपोर्ट में बताया है कि ग्रामीणों ने सिंचाई के उद्देश्य से नहर के किनारे ह्यूम पाइप लगा दिया था. तेज बारिश होने की वजह से वह भर गया. ग्रामीण पाइप का मुंह नहीं खेल सके. इस कारण नहर क्षतिग्रस्त हुई है. केस स्टडी-4 पेयजल एवं स्वच्छता विभाग द्वारा तेनुघाट प्रमंडल के तहत चतरोचट्टी में 18 करोड़ रुपये की लागत से ग्रामीण जलापूर्ति योजना का काम चल रहा है. इस योजना से 3000 घरों को वाटर कनेक्शन मिलना है. योजना के तहत नदी में 4 करोड़ रुपये की लागत से इंटकवेल बनना है. इंटकवेल बन भी गया था, मगर बारिश में बह गया. जांच हुई, मगर किसी को दोषी नहीं ठहराया गया. काम करने वाली एजेंसी से शपथ पत्र लेकर इंटेकवेल को फिर से बनाने का आदेश दे दिया गया. एजेंसी द्वारा पुनर्निर्माण पर 4 करोड़ों रुपये व्यक्तिगत तौर पर खर्च किए जा रहे हैं. जानकारी के अनुसार चतरोचट्टी जलापूर्ति योजना में पेयजल विभाग के सेवानिवृत्त एक बड़े अफसर की पत्नी पार्टनर है. पत्नी की एजेंसी से ही ड्राइंग डिजाइन पास हुआ है. काम में भी संवेदक के साथ अघोषित रूप से है. इसलिए संवेदक अपने खर्च पर नए स्थान पर करोड़ों का इंटकवेल तैयार करवा रहा है. केस स्टडी - 5 रांची के सोनाहातू में कांची नदी पर धंसे पुल को संवेदक ने अपने खर्च पर बनाने का शपथ पत्र पथ निर्माण विभाग को दिया है. पुल के निर्माण पर कुल 13 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. पुनर्निर्माण पर भी तकरीबन इतना ही खर्च आएगा. तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पुल धंसने को गंभीरता से लेते हुए जांच का आदेश दिया था. दोषी संवेदक और इंजीनियरों पर कार्रवाई का निर्देश दिया था. जांच चल रही है, लेकिन चिह्नित दोषियों पर कार्रवाई अब तक नहीं हुई. संवेदक ने शपथ पत्र देकर जांच को ही ठंडे बस्ते में डलवा दिया है. अपने साथ-साथ आरोपी इंजीनियरों को भी बचा लिया है. और पुल का निर्माण फिर से करने को लेकर कार्रवाई शुरू कर दी है. इसे भी पढ़ें : हजारीबाग">https://lagatar.in/hazaribagh-black-game-of-red-sand-ban-imposed-mafia-selling-at-five-times-higher-price/">हजारीबाग: लाल बालू का काला खेल : लगी है रोक, पांच गुनी अधिक कीमत पर बेच रहे माफिया [wpse_comments_template]
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