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Exclusive Interview : प्रोन्नति नियमावली के विरोध में सचिवालय सेवा संघ का कार्य बहिष्कार की तैयारी: रितेश कुमार

Ranchi: झारखंड कैबिनेट से प्रोन्नति नियमावली में संशोधन को स्वीकृति के बाद सचिवालय कर्मियों का आक्रोश चरम पर है. शुक्रवार को प्रोजेक्ट भवन में भारी हंगामे और मुख्य सचिव से मुलाकात न होने के बाद अब सचिवालय सेवा संघ ने संपूर्ण कार्य बहिष्कार का अल्टीमेटम दे दिया है. संघ का आरोप है कि यह फैसला बिना किसी समीक्षा के जल्दबाजी में लिया गया है, जिससे अधिकारियों के करियर को बड़ा नुकसान होगा. इस पूरे विवाद और संघ की अगली रणनीति को लेकर प्रस्तुत है सचिवालय सेवा संघ के अध्यक्ष रितेश कुमार से हुई विशेष बातचीत के मुख्य अंश

 

प्रश्न 1:  झारखंड सरकार ने सचिवालय कर्मियों के प्रमोशन (प्रोन्नति) के नियमों में ऐसा क्या बदलाव किया है, जिससे सभी अधिकारी इतने आक्रोशित हैं?

उत्तर:  सरकार ने प्रोन्नति नियमावली में ऐसे संशोधन किए हैं, जिससे सचिवालय सेवा के अधिकारियों की प्रोन्नति की अवधि काफी बढ़ जाएगी. पहले संकल्प संख्या-3286 (दिनांक 04.04.2014) के माध्यम से राज्य के सभी सेवा संवर्गों के लिए वेतनमान आधारित एक समान प्रोन्नति व्यवस्था लागू थी. इस नए संशोधन के बाद सचिवालय सेवा को इस व्यवस्था के लाभ से व्यवहारिक रूप से अलग कर दिया गया है. हमारा आक्रोश इसी असमानता और भेदभाव के विरुद्ध है.

 

प्रश्न 2: इस नए नियम के आने से पहले सचिवालय के अधिकारियों के प्रमोशन की क्या व्यवस्था थी?

उत्तर: पहले सचिवालय सेवा के अधिकारियों को भी अन्य सेवाओं की तरह साल 2014 के संकल्प का पूरा लाभ मिल रहा था. सहायक प्रशाखा पदाधिकारी से प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर प्रमोशन की अवधि को लेकर पूर्व में विवाद भी हुआ था, जिसमें माननीय उच्च न्यायालय ने सचिवालय सेवा के पक्ष में निर्णय दिया था. इसके बाद दायर अवमानना वाद में भी माननीय न्यायालय ने कार्मिक सचिव को आदेश के अनुरूप प्रोन्नति देने का निर्देश दिया था. इसके बावजूद अब फिर से नियमों में ऐसा संशोधन कर दिया गया जिससे हमारी प्रोन्नति अनावश्यक रूप से विलंबित होगी. इसका सीधा असर अधिकारियों के पूरे सेवा काल और भविष्य के प्रमोशन पर पड़ेगा.

 

प्रश्न 3: इस बदलाव के बाद एक आम सचिवालय कर्मी को लेवल-7 से लेवल-8 के पद पर जाने के लिए कितने वर्षों का इंतजार करना पड़ेगा, और इससे उनके करियर ग्राफ पर क्या असर होगा?

उत्तर: संशोधित व्यवस्था के अनुसार, अब एक सचिवालय अधिकारी को लेवल-7 से लेवल-8 के पद पर जाने के लिए लगभग 8 वर्ष की लंबी प्रतीक्षा करनी होगी. इसका असर सिर्फ इसी पद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके बाद सेवा की सभी प्रोन्नतियों के लिए तय समय सीमा भी बढ़ जाएगी. इसके परिणामस्वरूप उप सचिव, संयुक्त सचिव सहित उच्च पदों पर प्रमोशन की पूरी श्रृंखला प्रभावित होगी. इससे बड़ी संख्या में उच्च पद लंबे समय तक खाली रहेंगे और कई अधिकारी समय पर मिलने वाले प्रमोशन से वंचित रह जाएंगे.

 

प्रश्न 4: आरोप है कि सरकार ने सचिवालय सेवा के साथ भेदभाव किया है और दूसरे विभागों को फायदा पहुंचाया है? यह पूरा गणित क्या है?

उत्तर: हमारा मानना है कि समान परिस्थिति में सभी सेवा संवर्गों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए. यदि अन्य सेवा संवर्गों के अधिकारी उतने ही समय में लेवल-6 से सीधे लेवल-9 तक पहुंच सकते हैं और सचिवालय सेवा के अधिकारियों को लेवल-7 से लेवल-8 तक पहुंचने के लिए भी करीब 8 साल इंतजार करना पड़े, तो यह स्पष्ट रूप से असमानता है. हमारा विरोध किसी अन्य सेवा संवर्ग से नहीं है, बल्कि सचिवालय सेवा के साथ किए जा रहे इस सौतेले व्यवहार के खिलाफ है.

 

प्रश्न 5: सचिवालय में इस समय कितने पद रिक्त हैं?

उत्तर: वर्तमान में सचिवालय सेवा में अवर सचिव के 225 से अधिक पद रिक्त हैं, जिनमें सबसे चिंताजनक बात यह है कि अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के सभी 85 पद खाली पड़े हैं. इसके अलावा उप सचिव एवं संयुक्त सचिव के भी बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं. सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसी स्थिति होने पर प्रोन्नति प्रक्रिया को सरल और तेज किया जाता, जिसका प्रावधान पुरानी व्यवस्था में भी है. लेकिन इस संशोधन से प्रोन्नति और लटकेगी तथा रिक्तियां और ज्यादा बढ़ेंगी.

 

प्रश्न 6: सरकार ने ये फैसला क्यों लिया? इसके पीछे क्या मंशा दिखती है?

उत्तर: सामान्य प्रशासनिक सिद्धांत यही है कि जहां उच्च पदों पर अधिक रिक्तियां हों, वहां प्रोन्नति प्रक्रिया को सरल एवं त्वरित बनाया जाए. इसके विपरीत यह संशोधन प्रोन्नति को और अधिक विलंबित करेगा. हमारे मत में यह प्रशासनिक जड़ता का सीधा उदाहरण है. जब किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक समीक्षा, प्रभाव विश्लेषण (इम्पैक्ट एनालिसिस) और संस्थागत विचार-विमर्श के बिना जल्दबाजी में निर्णय लिए जाते हैं, तो ऐसे ही गलत परिणाम सामने आते हैं.

 

प्रश्न 7: क्या इस नए नियम को कैबिनेट से पास कराने से पहले कार्मिक विभाग या सरकार ने सचिवालय सेवा संघ के साथ कोई चर्चा की थी या कोई सुझाव मांगा था?

उत्तर: हमारी जानकारी के अनुसार, इस विषय पर सचिवालय सेवा संघ से कोई भी औपचारिक या अनौपचारिक परामर्श नहीं किया गया. स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन (हितधारकों से चर्चा) किसी भी नीतिगत निर्णय को अधिक प्रभावी बनाता है. हमें अनौपचारिक रूप से यह भी जानकारी मिली है कि इस फैसले से पड़ने वाले संभावित प्रभावों की समुचित समीक्षा कार्मिक विभाग के साथ-साथ वित्त, विधि तथा मंत्रिमंडल विभाग द्वारा भी नहीं की गई थी और इस प्रस्ताव को बेहद जल्दबाजी में कैबिनेट के समक्ष रख दिया गया.

 

प्रश्न 8: क्या सचिवालय के भीतर अलग-अलग सेवा संवर्गों के बीच कोई आपसी खींचतान या वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, जिसका नतीजा यह फैसला है?

उत्तर: मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि हमारा संघर्ष किसी अन्य सेवा संवर्ग के विरुद्ध नहीं है. हमारी लड़ाई सिर्फ समान अवसर, निष्पक्ष प्रोन्नति नीति और सचिवालय सेवा के वैध अधिकारों की रक्षा के लिए है.

 

प्रश्न 9: क्या सरकार से बातचीत के सारे विकल्प बंद हो चुके हैं?

उत्तर: हमारा पहला विकल्प हमेशा से संवाद और बातचीत ही है. हमने मुख्यमंत्री से भी मिलने का प्रयास किया, किंतु व्यस्तता के कारण उनसे मुलाकात नहीं हो सकी. यदि सरकार बातचीत के लिए आगे आती है तो हम चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार हैं. हालांकि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हम लोकतांत्रिक आंदोलन से भी पीछे हटने वाले नहीं हैं. आवश्यकता पड़ने पर चरणबद्ध तरीके से बड़ा आंदोलन किया जाएगा.

 

प्रश्न 10: इस पूरे मामले को लेकर मुख्यमंत्री का क्या रुख है? यदि सरकार अपने फैसले पर अड़ी रहती है, तो आगे की रणनीति क्या होगी?

उत्तर: अभी तक हमें मुख्यमंत्री के समक्ष सीधे अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिल पाया है. हमें पूरा विश्वास है कि जब उन्हें वास्तविक तथ्यों से अवगत कराया जाएगा, तो उनकी तरफ से सकारात्मक पहल होगी. हमें लगता है कि मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के अन्य मंत्रियों के समक्ष विभाग के पदाधिकारियों द्वारा सही तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है. हम प्रयास करेंगे कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों तक सही तथ्य पहुंचाए जाएं. इसके बावजूद यदि सरकार इस पर पुनर्विचार नहीं करती है, तो संघ लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक दायरे में रहकर उग्र आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा.

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