- साहब, मेरी बेटी को ढूंढ़ दीजिए...
- वर्षों बाद भी अनसुनी रह गई फरियाद
- कुछ के मिले शव व नरकंकाल
- कई का अब तक नहीं मिला सुराग
- अदालत भी जता चुका है नाराजगी
Ranchi : "मेरी बेटी सुबह घर से निकली थी, अब तक वापस नहीं लौटी... साहब, उसे ढूंढ़ दीजिए"... झारखंड के कई जिलों में कई ऐसे माता-पिता हैं, जो आज भी अपनी बेटी की राह देख रहे हैं, जो वर्षों बीत जाने के बाद भी घर नहीं लौटी हैं.
राज्य में नाबालिग बच्चियों की गुमशुदगी के बढ़ते मामलों ने पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. परिजनों का आरोप है कि कई मामलों में बच्ची के लापता होने के तुरंत बाद थाने पहुंचने पर शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया.
थाना प्रभारी अक्सर यह कहकर मामले को टाल देते हैं कि लड़की अपने आशिक के साथ चली गई होगी. जल्द लौट आएगी. शुरुआती स्तर पर बरती गई यही लापरवाही बाद में बड़ी चुनौती बन गई. थाना प्रभारियों की लापरवाही की वजह से डीजीपी से लेकर एसपी तक को झारखंड हाईकोर्ट फटकार लगा चुका है.

अदालत भी जता चुका है नाराजगी
नाबालिगों की गुमशुदगी से जुड़े कई मामलों में झारखंड हाईकोर्ट भी पुलिस की कार्यशैली पर नाराजगी जता चुका है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि नाबालिग के लापता होने का मामला बेहद संवेदनशील होता है और इसमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक है. इसके बावजूद कई मामलों में जांच की रफ्तार और शुरुआती कार्रवाई पर सवाल उठे हैं.

पुलिस रिकॉर्ड में अब भी कई बच्चियां हैं लापता
पुलिस आंकड़ों के अनुसार, गुमला की प्रेम फूल कुमारी और जानकी कुमारी, गढ़वा की रुचि कुमारी, पलामू की कविता मेहता, सिमडेगा की गीता कुमारी और अनुजा मिंज, लोहरदगा की जयमंत्री कुमारी, रांची की सोरी कुमारी और फूल कुमारी, कोडरमा की निशा कुमारी और रामगढ़ की खुशी कुमारी समेत कई नाबालिग बच्चियां अब भी लापता हैं.

मनातू से लेकर गुमला तक कई परिवार अब भी इंतजार में
पलामू के मनातू थाना क्षेत्र में वर्षों से कई बच्चियों के लापता होने के मामले सामने आए हैं. परिजनों का आरोप है कि समय बीतता गया, लेकिन पुलिस उनकी बच्ची को नहीं खोज पाई. कई मामलों को स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी उठाया. फिर भी कई परिवार आज भी अपनी बेटी की राह देख रहे हैं. हालांकि इनमें से कई बच्ची कई साल बाद खुद ही घर लौट आईं.
वहीं गुमला की संजीता कुमारी का मामला भी लंबे समय तक चर्चा में रहा. वर्ष 2018 में लापता हुई इस बच्ची का आज तक पता नहीं चल पाया है. मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा, इनाम की घोषणा भी हुई, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी.

शुरुआती 72 घंटे होते हैं सबसे महत्वपूर्ण
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नाबालिग के गुम होने के बाद शुरुआती 24 से 72 घंटे सबसे अहम होते हैं. इसी दौरान तकनीकी जांच, सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल और संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी से कई मामलों का खुलासा किया जा सकता है. लेकिन यदि शुरुआती समय में गंभीरता नहीं दिखाई जाए तो मामला वर्षों तक लंबित रह सकता है.

कहीं मिला शव, कहीं नरकंकाल, कई का अब तक नहीं मिला सुराग
झारखंड में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां गुमशुदा बच्चियों का बाद में शव या नरकंकाल बरामद हुआ. वहीं कई बच्चियां आज भी लापता हैं. इन घटनाओं ने मानव तस्करी, बाल अपराध और पुलिस की शुरुआती कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

थानेदार की चूक, जवाब बड़े अधिकारियों को
कई मामलों में स्थानीय स्तर पर शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेने का आरोप लगा. बाद में जब मामला अदालत या सरकार के संज्ञान में पहुंचा तो डीजीपी, एसपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को जवाब देना पड़ा. यही कारण है कि गुमशुदगी के मामलों में थाना स्तर की कार्यशैली लगातार सवालों के घेरे में रही है.
आज भी झारखंड के कई घरों में बेटियों की तस्वीरें दीवारों पर टंगी हैं और माता-पिता उनकी वापसी की उम्मीद लगाए बैठे हैं. ये सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि उन परिवारों का दर्द हैं, जो वर्षों से अपनी बेटियों की तलाश और न्याय की उम्मीद में भटक रहे हैं.
इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि गुमशुदगी के मामलों में शुरुआती लापरवाही के लिए जवाबदेही आखिर कब तय होगी?



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