अब सवाल सीधे जेल मुख्यालय से है .
अगर जेलों में वसूली की शिकायतें हैं, VIP सुविधाओं की चर्चाएं हैं, मोबाइल बरामद हो रहे हैं, अपराधियों के नेटवर्क पर पुलिस अधिकारी चिंता जता चुके हैं, तो फिर जेल मुख्यालय आखिर कर क्या रहा है? हर बार निरीक्षण होता है, बैठक होती है, समीक्षा होती है, लेकिन नतीजा कहां है?
जनता यह जानना चाहती है कि जब शिकायतें वर्षों से आ रही हैं, तो अब तक कितने जेल अधिकारियों पर बड़ी कार्रवाई हुई? कितनों की जवाबदेही तय हुई? आखिर क्यों हर कुछ महीने बाद वही आरोप फिर सामने आ जाते हैं?
जेल आईजी सुदर्शन मंडल लगातार जेलों का दौरा करते हैं. जेल मुख्यालय के अधिकारी भी समय-समय पर निरीक्षण करते हैं. लेकिन अगर सब कुछ ठीक है तो फिर विवाद खत्म क्यों नहीं होते? अगर गड़बड़ी है तो कार्रवाई दिखती क्यों नहीं?
चर्चा और आरोपों का जवाब सिर्फ जांच बैठाकर नहीं दिया जा सकता. जवाब तब मिलेगा जब व्यवस्था में बदलाव दिखेगा. क्योंकि जेल सिर्फ दीवारों और तालो का नाम नहीं है, यह कानून के भरोसे का सवाल है .
और जब जनता यह पूछने लगे कि इतनी शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं? तो यह सवाल किसी एक जेल पर नहीं, सीधे जेल मुख्यालय पर खड़ा होता है .
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