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फादर्स डे स्पेशल : दूसरे की खेत में काम कर पिता ने बेटी को बनाया राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी, आज रेलवे में कर रही नौकरी

Khuti : कहते है ना जीवन एक संघर्ष है. संघर्ष के बल पर इंसान कुछ भी पा सकता है. ऐसे ही खूंटी जिले के एक पिता की संघर्ष भरी कहानी है. जिसने सपना देखा की उसकी बेटी राष्ट्रीय स्तर पर खेले और इस सपने को पूरा करने के लिए जी जान लगा दी. पिता ने तब तक मेहनत की जब तक बेटी को राष्ट्रीय खिलाड़ी नहीं बना दिया. इसे भी पढ़ें -  केंद्र">https://lagatar.in/central-government-filed-an-affidavit-in-supreme-court-said-can-not-give-compensation-of-four-lakhs-on-death-due-to-corona/92258/">केंद्र

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आधा पेट खाना खा बेटी को बनाया राष्ट्रीय खिलाड़ी

ये पिता झारखंड के खूंटी जिले के मुरहू के हेसेल गांव में एक छोटे से मकान में रहे है. मकान छोटा होने के बावजूद पिता ने बेटी को लेकर बड़ा सपना देखा. और उस सपने को साकार करने के लिए खुद आधा पेट खाना खाया और दूसरों के खेत में मजदूरी की. लेकिन सपने के लिए समझौता नहीं किया. विमल मिंजूर की 3 बेटी और एक बेटा है. पिता का सपना था कि उसके घर के कोई भी सदस्य देश के लिए खेले और देश के साथ- साथ उसका भी नाम रौशन करें. पिता ने कड़ी मेहनत की और अपनी बड़ी बेटी को पढ़ाई के साथ- साथ खेल के सामान भी उपलब्ध कराये. पिता की मेहनत को देखते हुए बेटी ने भी कड़ी मेहनत का रास्ता अपनाया और पिता के सपने को पूरा किया. पिता की कड़ी मेहनत से आज बेटी नेशनल हॉकी खिलाड़ी बनी. और कई प्रतियोगिताओं में भाग लेकर जीत हासिल की. और देश के साथ- साथ पिता का सिर भी गर्व से ऊंचा कर दिया. पिता की कड़ी मेहनत का ही फल है कि आज खेल कोटे से बेटी को रेलवे में नौकरी मिल गयी है. और आज वो रेलवे में नौकरी कर रही. इसे भी पढ़ें - पाकुड़">https://lagatar.in/pakur-tribal-girl-gang-raped-in-hiranpur-one-accused-arrested/92245/">पाकुड़

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पिता ने जंगल से बांस व लकड़ी की हॉकी स्टिक बना कर बेटी को दिया

पिता ने बताया कि बेटी को हॉकी खिलाड़ी बनाने के लिए उन्हे अपने कई जरूरतों को छोड़ना पड़ा. क्यों कि उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. वो दूसरो के खेतों में मजदूरी जैसे तैसे घर का खर्च उठाया लेकिन बेटी द्वारा खेल के लिए मांगे सामानों के लिए कभी ना नहीं कहा. सपनों को पूरा करने के लिए आधा पेट खाया,अधबटाई में मिले धान को बेचकर बेटी की हर जरूरत की चीजें पूरा की. जिसमें उनकी पत्नी ने भी काफी सहयोग किया. पत्नी नामलेन होरो भी लिए मजदूरी की. बेटी जब भी हॉकी स्टिक की मांग की पिता ने जंगल से बांस व लकड़ी की हॉकी स्टिक बनाया और उसे अपनी बेटी को खेलने के लिए दिया. इसे भी पढ़ें - सुब्रमण्यम">https://lagatar.in/subramanian-swamy-tweeted-virat-bharat-is-going-to-emerge-soon-it-will-not-be-of-rasgullas/92247/">सुब्रमण्यम

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5 साल से रेलवे में कर रही नौकरी 

विमल मिंजूर ने बड़ी बेटी को पेलौल स्कूल में पढ़ायी करायी. और प्रैक्टिस भी करने के लिए प्रेरित करते रहे. धीरे- धीरे बेटी भी अच्छा खेलने लगी,तभी उस पर स्कूल के कोच व शिक्षक दशरथ महतो की नजर पड़ी. परिवार व कोच के सहयोग से शिलवंती राज्यस्तरीय हॉकी टीम पर अपनी जगह बना ली. बाद में उसने राष्ट्रीय स्तर के कई प्रतियोगिता में अपनी लोहा मनवाया. 2014 से 2016 तक राष्ट्रीयस्तर के कई प्रतियोगिता में खेलते रही. सरकार ने हॉकी में उनके योगदान को देखते हुए पांच साल पहले रेलवे ने उसे नौकरी दी. आज शिलवंती हाजीपुर रेलवे में कार्यारत है. उसके पिता विमल मिंजूर इस बात से खुश है कि उसकी संघर्ष जाया नही गया. वे अपनी बेटी की सफलता पर गर्व महसूस करते है. कहते है की बेटी हमेशा उन्हे मदद करती है. इसे भी पढ़ें - धनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-seepage-happening-in-ht-panel-house-of-filter-plant-there-may-be-a-big-accident/92219/">धनबाद

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