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धुरंधर-2 Review : हौसला, ईंधन और बदला की खुमारी

Shivendra

 

बलिदान परमो धर्म:

धुरंधर का दूसरा भाग इसी मूल भाव को और गहराई से सामने लाता है. जसकीरत के अस्तित्व का बलिदान, हमजा अली मजारी के जज्बातों का संघर्ष और राष्ट्र प्रेम, कहानी इन तीनों के इर्द-गिर्द बुनी गई है. यह पार्ट अब तक देखी गई घटनाओं के पीछे और आगे की परतों को खोलता है. यदि पहला भाग बेंचमार्क सिनेमा था, तो दूसरा भाग भी उस स्तर को बनाए रखने में सफल दिखता है.

 

हालांकि, कहीं-कहीं ऐसा महसूस होता है जैसे फिल्म को और कसावट की जरूरत थी. मानो आठ घंटे की कहानी को समेट दिया गया हो और बेहतरीन गीत पहले ही भाग में खर्च हो गए हों. इसी कारण फिल्म थोड़ी लंबी लगती है. पहले भाग में गीत कहानी को आगे बढ़ाते थे, जबकि इस बार उनका प्रभाव सीमित है. फिर भी ‘हम प्यार करने वाले’ और ‘रासपुतिन’ जैसे गीत फिल्म के पुराने कलेवर को जीवित रखते हैं. महिलाओं का किरदार और स्क्रीन टाइम ना के बराबर है. अर्जुन और रणवीर के एक्शन सीक्वेंस कुछ जगह खिंचे हुए लगते हैं. मेजर इकबाल को विलेन के रूप में थोड़ा और एस्टेब्लिश करना चाहिए था. 

 

पहले भाग की तरह ही इस बार भी फिल्म को अलग-अलग चैप्टर्स में बांटा गया है, जो इसकी नैरेटिव शैली को और दिलचस्प बनाता है. खास बात यह है कि इन चैप्टर्स के नाम सीधे-सीधे न होकर बेहद शट्ल और रोचक अंदाज में कहानी की दिशा का संकेत देते हैं. हर चैप्टर एक नई परत खोलता है और दर्शकों को कहानी से जोड़े रखता है. पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में भारत के दुश्मनों को खत्म करने वाले अज्ञात हमलावरों को समर्पित एक चैप्टर फिल्म के थ्रिल और इंटेंसिटी को खासा बढ़ाता है.

 

यदि पहले और दूसरे भाग की तुलना करें, तो मेजर इकबाल के किरदार में वह खौफ और प्रभाव पूरी तरह से उभरकर नहीं आता, जो पहले भाग में रहमान डकैत जैसे किरदारों में देखने को मिला था. इसके बावजूद, संजय दत्त और राकेश बेदी अपने अभिनय से फिल्म को मजबूती देते हैं. रणवीर सिंह जैसे ऊर्जावान और अक्सर लाउड माने जाने वाले अभिनेता से नियंत्रित और प्रभावशाली प्रदर्शन निकलवाना निर्देशक आदित्य धर की बड़ी उपलब्धि है.

 

फिल्म में कई राजनीतिक घटनाओं को भी पिरोया गया है, जो कहानी को सिर्फ एक एक्शन ड्रामा न बनाकर एक व्यापक और यथार्थपरक परिप्रेक्ष्य देता है. यही वजह है कि यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक विचार भी छोड़ जाती है.

 

पाकिस्तान से जुड़े ड्रग तस्करी, आईएसआई की साजिशें और हिंदुस्तान की औरतों के लिए ‘माल-ए-गनीमत’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल फिल्म को एक सख्त और असहज यथार्थ से जोड़ता है. मेजर इकबाल द्वारा हमजा को ‘दज्जाल’ कहना और बलूचों पर शौकिया अत्याचार जैसे दृश्य यह दर्शाते हैं कि पड़ोसी देश में किस तरह आतंकवाद को पनपाया जाता है. फिल्म इन संवेदनशील मुद्दों को बारीकी से पेश करती है. कुछ कमियों के बावजूद, इसका क्लाइमेक्स इतना प्रभावशाली है कि दर्शक बाकी खामियों को भूल जाते हैं. 

 

कुल मिलाकर, यह फिल्म देखी जानी चाहिए, खासकर उन लोगों के लिए जो भावनात्मक और देशभक्ति से जुड़ी कहानियों को पसंद करते हैं. हौसला, ईंधन और बदला- ये कॉकटेल अपनी खुमारी देने में सफल है. 

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