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Without Fear or Favour: सरकार के प्रति नरम थे पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़

कौल का मानना था कि सरकार उन जजों का ज्यादा सम्मान करती है जिनमें “रीढ़” होती है. चंद्रचूड़ के लंबे कार्यकाल और प्रतिष्ठा के बावजूद वे इस प्रैक्टिस को रोक नहीं पाए, जिससे भविष्य के छोटे कार्यकाल वाले CJI के लिए समस्या बढ़ सकती थी.
 
पुस्तक का कवर पेज.

Lagatar Desk: हाल के सालों में सबसे चर्चित रहे भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीशी डीवाई चंद्रचूड़ एक बार फिर से विवादों में घर गए हैं. इस बार वह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस संजय किशन कौल की पुस्तक Without Fear or Favour की वजह से विवाद में आ गए हैं. हालांकि सरकार के प्रति नरम रहने के आरोप पहले भी उन पर लगे हैं, पर इस बार एक जस्टिस की पुस्तक में विस्तार से इस पर बहुत कुछ कहा गया है. अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस ने किताब के कुछ अंश को प्रकाशित किया है. हालांकि किताब इस साल दिसंबर में बाजार में आयेगा.

 

इस विवाद के सामने आने के बाद पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उन्होंने किताब नहीं पढ़ी है. कॉलेजियम की बैठकें अच्छी और सम्मानजनक थीं. उन्हें बैठक छोड़ कर जाने (walkout) याद नहीं. सरकार की भूमिका होती है क्योंकि राष्ट्रपति वारंट जारी करते हैं.

 

सरकार के प्रति “बहुत ज्यादा नरम” रवैया

कौल ने अपनी पुस्तक में लिखा है- चंद्रचूड़ जजों की नियुक्ति के प्रशासनिक मामलों में सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम थे. उन्होंने कहा कि “परामर्श” और “पूर्व-अनुमोदन” (pre-approval) में फर्क है. कॉलेजियम की औपचारिक चर्चा से पहले सरकार की मंजूरी लेना गलत संकेत देता है. राजनीतिक वर्ग को दरवाजे की दरार मिल जाए तो वह और अधिकार मांगता है.

कौल का मानना था कि सरकार उन जजों का ज्यादा सम्मान करती है जिनमें “रीढ़” होती है. चंद्रचूड़ के लंबे कार्यकाल और प्रतिष्ठा के बावजूद वे इस प्रैक्टिस को रोक नहीं पाए, जिससे भविष्य के छोटे कार्यकाल वाले CJI के लिए समस्या बढ़ सकती थी.

 

छठे नाम का मामला

कॉलेजियम ने पहले पांच नामों पर सहमति बना ली थी. बैठक के दिन जाते समय चंद्रचूड़ ने छठा नाम सुझाया. अन्य जजों ने विरोध किया. कौल को शक था कि यह नाम सरकार के इशारे पर आया है. चंद्रचूड़ ने उन्हें एक अलग कमरे में ले जाकर पूछा कि क्या सरकार का रुख जानने के लिए फोन किया जाए. कौल ने कहा कि कॉलेजियम की बैठक के बीच ऐसा नहीं हो सकता. 

 

पांच नाम आगे बढ़े, छठा नहीं. कौल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में पद “सही कान में शब्द डालने” से नहीं मिलता. इंटरव्यू में उन्होंने संकेत दिया कि शायद कुछ नामों पर पहले ही सरकार की मंजूरी ली जा चुकी थी.

 

अल्पसंख्यक उम्मीदवार और “अजीबोगरीब” जाति का सवाल 

एक अल्पसंख्यक धर्म के उम्मीदवार पर सरकार ने दो सवाल उठाए- पहली यह कि क्या उस धर्म के और प्रतिनिधित्व की जरूरत है (जबकि अन्य अल्पसंख्यक जज पहले से हैं)? और दूसरी यह कि उम्मीदवार के परिवार की जाति क्या थी (धर्मांतरण से पहले)?

 

कौल ने इसे “अजीबोगरीब” (bizarre) और अप्रासंगिक बताया. परिवार कई पीढ़ियों से उस धर्म में था. चंद्रचूड़ ने सरकार का कुछ और रुख साझा किया (जिसे कौल ने विरोध किया) तो कौल नाराज हो गए और बोले- “अगर इसी तरह जज नियुक्त करने हैं तो आप खुद ही नियुक्त कर लें. कॉलेजियम से पहले चीफ जस्टिस ही करते थे. आप वैसे ही कर लें. मैं ऐसे फैसले का हिस्सा नहीं बन सकता.”

 

उन्होंने (कौल ने) फाइल बंद की और कमरे से बाहर निकल गए. बैठक स्थगित हो गई. कुछ समय तक कोई बैठक नहीं हुई. बाद में सरकार पीछे हटी और उम्मीदवार आगे बढ़ा. कौल लिखते हैं कि दोनों के बीच तनाव ऐसे मुद्दों पर चरम पर पहुंचा था.

 

Good-Cop Bad-Cop का सुझाव

जून 2022 में कॉलेजियम में शामिल होने के बाद कौल ने सुझाव दिया कि दोनों मिलकर सरकार का सामना करें. वे (CJI न होने के कारण) ज्यादा सख्त भूमिका निभा सकते हैं. सरकार को इससे कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि उसे कौल का स्वभाव पता था. लेकिन चंद्रचूड़ ज्यादातर मामलों में रिश्ता अकेले संभालना पसंद करते थे.

 

अन्य संबंधित आरोप व घटनाएं

PMLA केस: कौल की बेंच ने 2022 के Vijay Madanlal Choudhary फैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार की संभावना सूचीबद्ध की. सरकार ने इसे प्रतिकूल माना. बिना बताए मामला दूसरी बेंच में चला गया. कौल का कहना है कि “बेंच इस डर से नहीं बदली जानी चाहिए कि वह क्या फैसला दे सकती है. 

 

इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि चंद्रचूड़ ने उन्हें चैंबर में बुलाकर “मध्य मार्ग” (middle path) अपनाने और सावधानी बरतने को कहा. कौल ने जवाब दिया कि उन्होंने कभी मध्य मार्ग नहीं अपनाया और आगे बढ़े. सरकार adjournment मांगती रही और रिटायरमेंट के करीब बेंच भंग हो गई.

 

जजों की नियुक्ति में देरी वाला मामला: कौल की बेंच सरकार पर कॉलेजियम सिफारिशों पर बैठने और “pick and choose” के लिए सख्त थी. अचानक मामला उनकी बेंच से हटा दिया गया. रजिस्ट्रार ने बताया कि पुरानी असाइनमेंट में औपचारिक अनुमति नहीं ली गई थी. कौल ने कहा कि CJI दबाव में थे (हालांकि उन्होंने स्पष्ट नहीं कहा कि सरकार का दबाव था).

 

सीनियर एडवोकेट पदनाम: कौल को बाद में पता चला कि कुछ लोगों ने चंद्रचूड़ को सलाह दी कि उनकी रिटायरमेंट तक पदनाम टाल दें क्योंकि वे सख्त होंगे. पदनाम जनवरी 2024 (उनकी रिटायरमेंट के बाद) हुए. 

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