Search

 
 
 

Exclusive: सरकार पर भरोसा करके बंदूक छोड़ी, अब SIR के लिए भी भटक रहे पूर्व नक्सली

Ranchi News: सरकार पर भरोसा करके जंगल और संगठन छोड़ चुके पूर्व नक्सलियों को अगर समय पर पहचान, रोजगार और पुनर्वास की सुविधाएं नहीं मिलती हैं तो उनके भीतर निराशा बढ़ सकती है.
 
सरेंडर करती महिला नक्सली
  • SIR प्रक्रिया से दूर पूर्व नक्सली के पास न पहचान पत्र, न बैंक पासबुक
  • हजारीबाग ओपन जेल में 86 आत्मसमर्पित नक्सली
  • केंद्र की पुनर्वास नीति, लेकिन जमीन पर सवाल
  • सरेंडर के बाद जिंदगी नहीं बदली तो कमजोर होगा सरकार का भरोसा
  • वोटर बनने से अयोग्यता का आधार नहीं पूर्व नक्सली होना - के. रवि

Ranchi News: झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में सरकार और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के साथ आत्मसमर्पण नीति को भी बड़ी सफलता के तौर पर पेश किया जाता रहा है. सरकार लगातार कहती रही है कि हथियार छोड़ने वाले नक्सलियों को मुख्यधारा में लाया जाएगा, सम्मान के साथ नई जिंदगी दी जाएगी और पुनर्वास के तहत जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी. लेकिन इसी दावे के बीच झारखंड में नक्सलवाद छोड़कर मुख्यधारा में लौटे कई पूर्व नक्सलियों की जिंदगी की दर्द भरी तस्वीर सामने आई है. एक तरफ हथियार छोड़कर सामान्य जीवन जीने की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ पहचान के जरूरी दस्तावेजों का संकट. कई लोगों के पास आधार कार्ड, पैन कार्ड, पहचान पत्र और बैंक पासबुक तक नहीं है. ऐसे में राज्य में चल रही SIR प्रक्रिया से भी कई लोग दूर हैं.

 

चिंता सिर्फ दस्तावेजों की नहीं है. सरकार पर भरोसा करके जंगल और संगठन छोड़ चुके लोगों को अगर समय पर पहचान, रोजगार और पुनर्वास की सुविधाएं नहीं मिलती हैं तो उनके भीतर निराशा बढ़ सकती है. यही निराशा भविष्य में उन्हें फिर उसी रास्ते की ओर धकेलने का खतरा पैदा कर सकती है. जिस आत्मसमर्पण नीति के जरिए सरकार नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने का दावा करती है, उसकी असली परीक्षा अब यह है कि हथियार छोड़ने के बाद इन लोगों की जिंदगी कितनी बदली.

 

Uploaded Image

सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए बना ओपेन जेल.

 

झारखंड पुलिस के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2021 से जुलाई 2026 तक राज्य में 167 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. वर्ष 2021 में 20, 2022 में 14, 2023 में 26, 2024 में 24, 2025 में 38 और जुलाई 2026 तक 45 नक्सलियों ने हथियार छोड़े. इन लोगों ने संगठन से दूरी बनाई और हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जिंदगी में लौटने का फैसला किया.

 

देशभर की तस्वीर देखें तो केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2024 से मार्च 2026 तक 3,927 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि अकेले वर्ष 2025 में 2,337 नक्सलियों ने हथियार डाले. केंद्र सरकार नक्सलवाद के खिलाफ अपनी रणनीति में आत्मसमर्पण और पुनर्वास को भी महत्वपूर्ण हिस्सा बताती रही है.

 

हजारीबाग ओपन जेल में 86 आत्मसमर्पित नक्सली रह रहे हैं. यहां से सामने आई जानकारी में पुनर्वास से जुड़ी कई समस्याएं सामने आई हैं. कुछ के पास आधार कार्ड नहीं है, किसी के पास पैन कार्ड नहीं है, पहचान से जुड़े दूसरे दस्तावेज अधूरे हैं और बैंक पासबुक तक नहीं है. आधार नहीं होने के कारण बैंक खाता खुलने में परेशानी की बात भी सामने आई है. इसके अलावा जमीन, आवास, कौशल प्रशिक्षण, बच्चों की पढ़ाई और इलाज से जुड़ी सुविधाएं भी कई मामलों में लंबित बताई गई हैं.

 

यानी बंदूक छोड़ने के बाद भी इनके सामने एक दूसरी लड़ाई खड़ी है. यह लड़ाई जंगल की नहीं, बल्कि कागज और सरकारी दफ्तरों की है. और यही स्थिति SIR प्रक्रिया के दौरान और गंभीर हो जाती है. जिन लोगों के पास अपनी नागरिक पहचान से जुड़े जरूरी दस्तावेज नहीं हैं, उनके लिए मतदाता सूची की प्रक्रिया में शामिल होना स्वाभाविक तौर पर मुश्किल हो सकता है.

 

Uploaded Image

पुलिस अधिकारियों के समक्ष सरेंडर करते नक्सली.

 

हजारीबाग ओपन जेल में रह रहे एक वरिष्ठ आत्मसमर्पित नक्सली ने नाम नहीं छापने की शर्त पर अपना दर्द साझा किया. उन्होंने कहा कि सरकार पर भरोसा करके हथियार छोड़ा, संगठन छोड़ा और जंगल की जिंदगी से बाहर निकलने का फैसला किया. लेकिन सामान्य जिंदगी शुरू करने के लिए जरूरी कागजात ही नहीं मिल पाए.

 

उन्होंने कहा, “हमने सरकार के सामने हथियार डाल दिया. संगठन छोड़ दिया. जंगल की जिंदगी छोड़कर सामान्य जीवन में आने का फैसला किया. लेकिन आज भी कई लोगों के पास आधार कार्ड नहीं है, पैन कार्ड नहीं है, पहचान पत्र नहीं है और बैंक की पासबुक तक नहीं है. बिना कागज के सामान्य जिंदगी कैसे चलेगी?”

 

पूर्व नक्सली ने कहा, “हमने सरकार की बात पर भरोसा किया. अब हम वापस उस रास्ते पर नहीं जाना चाहते. लेकिन सरकार को भी देखना चाहिए कि जिसने बंदूक छोड़ दी, उसे समाज में सम्मान से जीने के लिए पहचान और जरूरी सुविधाएं मिलें. अगर आदमी को लगे कि बंदूक छोड़ने के बाद भी उसका भविष्य अंधेरे में है, तो यह बहुत बड़ी निराशा की बात होगी.”

 

मामला सामने आने के बाद झारखंड स्पेशल ब्रांच मुख्यालय ने हजारीबाग जेल अधीक्षक को पत्र लिखा है. पत्र के जरिए आत्मसमर्पित नक्सलियों को मिल रही पुनर्वास सुविधाओं और लंबित मामलों की जानकारी मांगी गई है. साथ ही आत्मसमर्पित नक्सलियों के आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाते समेत जरूरी दस्तावेज तैयार कराने की दिशा में भी कार्रवाई करने को कहा गया है.

 

स्पेशल ब्रांच की इस पहल से यह स्पष्ट है कि आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास से जुड़ी समस्याएं अब सरकारी स्तर पर भी गंभीरता से देखी जा रही हैं. अब यह पता लगाने की जरूरत है कि किसे कौन-कौन सी सुविधा मिली, किसका मामला लंबित है और आखिर किन कारणों से वर्षों बाद भी कुछ लोग बुनियादी दस्तावेजों से वंचित हैं.

 

इधर, राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया चल रही है. ऐसे में आत्मसमर्पित नक्सलियों के दस्तावेजों का सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है. हालांकि पूर्व नक्सली होना किसी व्यक्ति को मतदाता बनने से अयोग्य नहीं करता. पात्र भारतीय नागरिक मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं.

 

Uploaded Image

मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रविकुमार

 

मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार ने भी स्पष्ट किया है कि नक्सली रहा होना अपने आप में मतदाता बनने से अयोग्यता का आधार नहीं है. जो भारत के नागरिक हैं और मतदाता बनने की निर्धारित पात्रता पूरी करते हैं, वे मतदाता सूची में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकते हैं. ऐसे लोग अपने परिवार के माध्यम से भी आवेदन कर सकते हैं और कुछ जगहों पर ऐसा किया भी जा रहा है.

 

केंद्र सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए आर्थिक सहायता, मासिक वजीफा, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार और आवास जैसी सुविधाओं की बात करती है. मौजूदा केंद्रीय नीति के तहत वरिष्ठ कैडर के लिए पांच लाख रुपये और अन्य कैडर के लिए 2.5 लाख रुपये की सहायता, 36 महीने तक 10 हजार रुपये मासिक वजीफा तथा हथियार और गोला-बारूद जमा करने पर अतिरिक्त सहायता का प्रावधान है.

 

झारखंड में भी आत्मसमर्पण नीति के तहत आर्थिक सहायता, हथियारों के बदले मुआवजा, कौशल प्रशिक्षण, जमीन और पुनर्वास से जुड़ी सुविधाएं देने की व्यवस्था है. लेकिन हजारीबाग ओपन जेल से सामने आई तस्वीर बताती है कि नीति और जमीन पर उसके क्रियान्वयन के बीच अभी भी दूरी है.

 

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में जंगल में अभियान चलाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उन लोगों को समाज में टिकाए रखना है जो हथियार छोड़कर वापस लौट रहे हैं. सरकार आज भी सक्रिय नक्सलियों से हथियार छोड़कर मुख्यधारा में आने की अपील करती है. ऐसे में पहले से आत्मसमर्पण कर चुके लोगों की जिंदगी ही उस अपील की सबसे बड़ी मिसाल है.

 

अगर बंदूक छोड़ने वाले को पहचान, सम्मान, रोजगार और सुरक्षित भविष्य मिलता है तो जंगल में मौजूद दूसरे लोगों के लिए भी सरकार पर भरोसा करने की वजह बनती है. लेकिन अगर आत्मसमर्पण के वर्षों बाद भी कोई व्यक्ति आधार, पैन, बैंक खाता, जमीन, आवास और बच्चों की पढ़ाई के लिए परेशान है, तो यह पुनर्वास नीति की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़ा करता है

 

झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे व्यापक अभियान के बीच अब इनामी नक्सलियों की संख्या घटकर महज 18 रह गई है. झारखंड पुलिस की ओर से दी गई जानकारी के मुताबुक, सूची में राज्य में सक्रिय या वांछित ऐसे 18 नक्सलियों के नाम शामिल है, जिन पर सरकार ने उनकी संगठनात्मक भूमिका और नक्सली गतिविधियों के आधार पर इनाम घोषित कर रखा है. इनामी और वांटेड नक्सलियों की सूची की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें अलग-अलग नक्सली संगठनों से जुड़े कई शीर्ष स्तर के नक्सली कमांडर भी शामिल हैं. इनमें CPI (Maoist), TPC, JJMP और PLFI जैसे संगठन शामिल हैं. वांटेड सूची में सबसे अधिक नक्सली CPI (Maoist) से जुड़े हैं.

 

Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.

Comments
Leave a Comment
Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही