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मजबूत गणतंत्र की नीव, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था

गणतंत्र केवल संविधान की किताबों में दर्ज शब्दों से नहीं बनता, बल्कि वह 26 जनवरी की सुबह फहराते तिरंगे की तरह जनता के जीवन में महसूस होता है. यह उन सांसों में बसता है जो सुरक्षित हों, उन शरीरों में जो स्वस्थ हों और उस भरोसे में जो नागरिक अपने देश पर करते हैं. जब हम गणतंत्र दिवस मनाते हैं, तो यह केवल परेड और उत्सव का दिन नहीं होता, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर भी होता है कि क्या हमारा लोकतंत्र सचमुच हर नागरिक तक पहुंच पा रहा है. 

नागरिक स्वस्थ होंगे तभी लोकतंत्र जीवित, सक्रिय और सशक्त रहेगा. स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ विचार जन्म लेते हैं और वही विचार राष्ट्र को प्रगति की राह दिखाते हैं. इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मजबूत गणतंत्र की असली नींव मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था पर ही टिकी होती है. जिस देश में नागरिक बीमारी, कुपोषण और इलाज की चिंता में घिरे हों, वहां लोकतंत्र एक जीवंत व्यवस्था नहीं, बल्कि केवल औपचारिक ढांचा बनकर रह जाता है.

झारखंड जैसे राज्य में यह बात और भी अधिक महत्व रखती है. यह राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है. यहां जल, जंगल और जमीन की समृद्ध विरासत है, लेकिन इसके साथ ही कठिन भौगोलिक परिस्थितियां भी हैं. दूर-दराज के गांव, पहाड़ी इलाके, घने जंगल और बिखरी हुई आबादी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बड़ी चुनौती बनते हैं. झारखंड की एक बड़ी आबादी आज भी आदिवासी समुदाय से आती है, जो अपनी संस्कृति और परंपराओं के साथ जीवन जीती है. लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं की असमान पहुंच ने इस वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है.

स्वास्थ्य केवल बीमारी का इलाज नहीं है, बल्कि यह सम्मान के साथ जीने का अधिकार है. जब किसी गांव की गर्भवती महिला को समय पर अस्पताल नहीं मिल पाता, जब किसी बुजुर्ग को इलाज के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है, या जब किसी गरीब परिवार को अपने बच्चे के इलाज के लिए जमीन या गहने बेचने पड़ते हैं, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती. यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करती है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हमारा गणतंत्र वास्तव में सभी के लिए समान है.

हाल के वर्षों में झारखंड सरकार ने स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं. अबुआ स्वास्थ्य सुरक्षा योजना, मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी उपचार योजना, आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाओं के माध्यम से आम लोगों तक इलाज की पहुंच बढ़ाई गई है. सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का विस्तार हुआ है, जांच सेवाएं बेहतर हुई हैं और रिम्स जैसे संस्थानों को सशक्त बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. इन पहलों से यह संकेत मिलता है कि राज्य अब आत्मनिर्भर स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है.

 

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डॉ प्रभात कुमार

रांची के सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार का मानना है कि मजबूत गणतंत्र के लिए नागरिकों का स्वस्थ रहना सबसे जरूरी है. उनके अनुसार स्वास्थ्य का सीधा संबंध देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति से जुड़ा होता है. उन्होंने बताया कि एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार केवल डायबिटीज जैसी बीमारी से देश को लगभग 156 लाख करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति हुई है. यह नुकसान केवल इलाज का नहीं होता, बल्कि उस कार्यक्षमता का भी होता है जो बीमारी के कारण खत्म हो जाती है. एक बीमार व्यक्ति न केवल स्वयं प्रभावित होता है, बल्कि उसका परिवार भी आर्थिक और मानसिक संकट से गुजरता है. उसका समय अस्पतालों में बीतता है, काम प्रभावित होता है और उत्पादकता घट जाती है. इस तरह बीमारी पूरे समाज पर बोझ बन जाती है.

 

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रिम्स के निदेशक डॉ राजकुमार.

इसी क्रम में रिम्स (राजेन्द्र आयुर्विज्ञान संस्थान) के निदेशक डॉ. राजकुमार ने भी मजबूत गणतंत्र के लिए सुदृढ़ स्वास्थ्य व्यवस्था की भूमिका को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य ‘राइट टू लाइफ’ का महत्वपूर्ण हिस्सा है, और रिम्स झारखंड की स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ के रूप में कार्य कर रहा है. डॉ. राजकुमार के अनुसार रिम्स केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि राज्य का प्रमुख शैक्षणिक, उपचार और शोध संस्थान है, जहां इलाज के साथ-साथ डॉक्टरों का प्रशिक्षण और राज्य की स्वास्थ्य नीतियों के लिए शोध कार्य भी किया जाता है. उन्होंने बताया कि बीते एक वर्ष में रिम्स में लगभग दस नई परियोजनाएं पूरी हुई हैं. क्षेत्रीय नेत्र रोग केंद्र, सेंट्रल लैब, मैक्सिलोफेशियल ओटी कॉम्प्लेक्स, नया कैफेटेरिया, आधुनिक प्रवेश द्वार और अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों की स्थापना की गई है. लगभग 40 करोड़ रुपये की लागत से रेडियोथैरेपी मशीन लगाई गई है और कुल मिलाकर करीब 200 करोड़ रुपये के उपकरण जोड़े गए हैं. अब रिम्स में एमआरआई जैसी आधुनिक जांच सुविधाएं भी उपलब्ध हैं. उन्होंने बताया कि अस्पताल की क्षमता बढ़कर 2300 से अधिक बेड की हो चुकी है, हालांकि मानव संसाधन की कमी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. इस दिशा में संविदा के माध्यम से नियुक्तियां की जा रही हैं. डॉ. राजकुमार ने यह भी बताया कि वर्षों से चले आ रहे अतिक्रमण को हटाकर परिसर को व्यवस्थित किया गया है, जिससे मरीजों और डॉक्टरों दोनों को बेहतर वातावरण मिल सका है. गणतंत्र दिवस के अवसर पर उनका संदेश था कि संविधान देश की आत्मा है और जिस तरह घर नियमों से चलता है, उसी तरह देश भी संविधान से चलता है. उन्होंने सभी नागरिकों से ईमानदारी, जिम्मेदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ कार्य करने की अपील की, ताकि झारखंड और देश स्वस्थ, सशक्त और आत्मनिर्भर बन सके.

 

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डॉ लाल मांझी

झारखंड जैसे राज्य में, जहां बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, स्वास्थ्य सेवाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. डॉ. लाल माझी (SNO NCD/IEC NHM, Jharkhand) बताते हैं कि झारखंड की आबादी लगभग चार करोड़ है और यह राज्य छोटानागपुर पठार पर स्थित है, जहां लगभग 29 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र है. यहां भौगोलिक कठिनाइयों के साथ-साथ सामाजिक विषमताएं भी मौजूद हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य विभाग और केंद्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से गांव से लेकर शहर तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं.

आज गांवों और शहरी झुग्गी बस्तियों में सहिया और आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य की रीढ़ बन चुकी हैं. ये महिलाएं न केवल इलाज में मदद करती हैं, बल्कि लोगों को जागरूक भी करती हैं. पंचायत स्तर पर आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से लोगों को उनके गांव में ही प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं. इससे बीमारी को शुरुआती स्तर पर ही पहचान कर इलाज संभव हो पा रहा है. प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की तैनाती की जा रही है. 108 एंबुलेंस सेवा ने आपात स्थितियों में हजारों जानें बचाई हैं.

राज्य में 30 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की गैर संचारी बीमारियों की जांच कर उन्हें समय पर इलाज दिया जा रहा है. फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं. पेयजल स्वच्छता विभाग के साथ मिलकर स्वच्छ पानी और जागरूकता पर काम किया जा रहा है. मां और नवजात शिशु के स्वास्थ्य के लिए सहिया और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता घर-घर जाकर स्वास्थ्य और पोषण की जानकारी दे रही हैं. इन सभी प्रयासों से झारखंड की स्वास्थ्य तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है.

हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं. कोयला खनन क्षेत्रों में प्रदूषण के कारण फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं. दूरस्थ इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है. कई जगहों पर स्वास्थ्य केंद्र तो हैं, लेकिन संसाधन सीमित हैं. इन समस्याओं के समाधान के लिए निरंतर प्रयास और मजबूत नीति की जरूरत है.

 

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डॉ अभिषेक के रामाधीन

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, रांची के उपाध्यक्ष डॉ. अभिषेक के. रामाधीन का कहना है कि मजबूत गणतंत्र की नींव केवल संविधान या संस्थाओं से नहीं बनती, बल्कि एक मजबूत और सुलभ स्वास्थ्य व्यवस्था से बनती है. उनका मानना है कि जब तक देश का अंतिम व्यक्ति स्वस्थ नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र का लाभ अधूरा रहेगा. झारखंड जैसे राज्य में स्वास्थ्य सेवा केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का माध्यम है. यहां डॉक्टर तक पहुंचना कई बार संघर्ष बन जाता है, इसलिए जरूरी है कि स्वास्थ्य सेवाओं को हर व्यक्ति तक पहुंचाया जाए.

उनके अनुसार मजबूत गणतंत्र का अर्थ है कि हर नागरिक को समय पर इलाज मिले, हर मां को सुरक्षित प्रसव की सुविधा हो, हर बच्चे को पोषण और टीकाकरण मिले और हर गरीब को सम्मान के साथ स्वास्थ्य सुविधा मिले. सरकार, निजी क्षेत्र और समाज तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि स्वास्थ्य को खर्च नहीं बल्कि निवेश के रूप में देखा जाए.

 

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डॉ राजेश कुमार

इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक्स झारखंड के सचिव डॉ. राजेश कुमार भी इसी बात पर जोर देते हैं कि किसी भी देश का भविष्य उसके बच्चों के स्वास्थ्य से तय होता है. एक बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में वे प्रतिदिन देखते हैं कि समय पर टीकाकरण, सही पोषण और बेहतर देखभाल बच्चों के जीवन को कैसे बदल देती है. यदि बचपन स्वस्थ होगा तो आने वाली पीढ़ी शिक्षित, सक्षम और जिम्मेदार बनेगी.

उनका कहना है कि मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की मजबूती, प्रशिक्षित डॉक्टर, आधुनिक सुविधाएं और जन-जागरूकता उतनी ही जरूरी है. गणतंत्र तभी मजबूत होगा जब हर बच्चे को समान स्वास्थ्य अधिकार मिलेगा, चाहे वह शहर में रहता हो या किसी दूरदराज के गांव में.

आज जब भारत अपने गणतंत्र के अमृत काल में प्रवेश कर चुका है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम स्वास्थ्य को राष्ट्र निर्माण का आधार मानें. सड़कें, पुल और इमारतें विकास की पहचान हो सकती हैं, लेकिन स्वस्थ नागरिक ही किसी देश की असली ताकत होते हैं. यदि नागरिक स्वस्थ होंगे, तो देश आत्मनिर्भर बनेगा. यदि नागरिक कमजोर होंगे, तो विकास की गति रुक जाएगी.

झारखंड आज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह उम्मीद जगाने वाली है. स्वास्थ्य सेवाओं में हो रहा विस्तार, योजनाओं का प्रभाव और जमीनी स्तर पर काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मी इस बात का संकेत हैं कि राज्य सही दिशा में आगे बढ़ रहा है. अब आवश्यकता है निरंतरता की, पारदर्शिता की और इस सोच की कि स्वास्थ्य कोई सुविधा नहीं बल्कि मौलिक अधिकार है.

 

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बिनोद कुमार

एयरफोर्स (सेवानिवृत्त) बिनोद कुमार ने बताया की एयरफोर्स में सेवा के दौरान मैंने महसूस किया कि किसी भी आपात स्थिति में स्वास्थ्य सेवाएं राष्ट्र की पहली सुरक्षा पंक्ति होती हैं. आज भी ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में डॉक्टरों, उपकरणों और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी एक बड़ा सवाल है. गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किए बिना सामाजिक न्याय की कल्पना अधूरी है. जब हर नागरिक को समय पर और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिलेगा, तभी हमारा गणतंत्र वास्तव में मजबूत कहलाएगा.

अंततः मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था केवल अस्पतालों और मशीनों से नहीं बनती, बल्कि संवेदनशील नीति, ईमानदार प्रयास और जनभागीदारी से बनती है. जब हर नागरिक स्वस्थ होगा, तभी गणतंत्र वास्तव में मजबूत होगा. क्योंकि स्वस्थ नागरिक ही सशक्त लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान होते हैं. 

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