सीजेपी आंदोलन के दौरान दिल्ली में पुलिस ने जो सख्ती की, वो तो की ही, कुछ ऐसे लोगों ने भी विरोध-प्रदर्शन करने पहुंचे युवक-युवतियों के साथ मारपीट की. वे लोग नक़ाब से चेहरा ढ़ंके हुए थे, जैसा पहले भी देश ने देखा है. आखिर वो कौन लोग हैं, किनके इशारे पर आतंक मचा रहे हैं और पुलिस सबकुछ देख कर भी कुछ नहीं करती, यह सवाल बड़ा होता जा रहा है. अब तक की घटनाएं

05 जनवरी 2020, JNU: नक़ाबपोशों का हमला, छात्र घायल, पुलिस गेट पर. हिंदू रक्षा दल के पिंकी चौधरी ने जिम्मेदारी ली थी.
30 जनवरी 2020, जामिया: तमंचे से छात्र पर गोली चलायी. पुलिस पीछे खड़ी देखती रही. आरोपी पकड़ से बाहर, फिर सांप्रदायिक भाषण.
23 फ़रवरी 2020, मौजपुर: कपिल मिश्रा का अल्टीमेटम, फिर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा.
29 जनवरी 2021, सिंघु बॉर्डर: किसानों के तंबुओं पर पथराव, पुलिस की मौजूदगी में यह सब हुआ.
20 जुलाई 2026, जंतर-मंतर: स्वतंत्र भारद्वाज पर एक नाबालिग के पिता पर हमले का आरोप. गिरफ्तारी के बाद रिहाई. फिर प्रदर्शन से पहले मारने-पीटने की धमकी. कोई कार्रवाई नहीं.
8-9 अक्टूबर 2026: न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट में जवाबी लामबंदी और लाखों कार्यकर्ताओं के दावे. आजतक और क्विंट के मुताबिक़ पिंकी चौधरी और स्वतंत्र भारद्वाज की तरफ से फिर हमले की धमकियां. बजरंग दल और VHP ने ऐसी योजना से इनकार किया.
10 अक्टूबर 2026, कनॉट प्लेस: धारा 163 के बीच प्रदर्शनकारियों की सरेआम पिटाई. पुलिस मौजूद, लेकिन रात तक किसी की गिरफ्तारी की खबर नहीं.
तारीखें जरुर अलग हैं, लेकिन पैटर्न एक ही जैसा है. हर तारीख को सब कुछ पहले जैसा ही हुआ. पहले धमकी दी गई. फिर हिंसा की गई. पुलिस मौजूद रही. पुलिस ने रोका नहीं. पुलिस इतनी बेबस क्यों है?
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