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खेलों के प्रति रूझान के लिए भविष्य की सुरक्षा जरूरी- राजेश

Shubham Kishore Ranchi: इंटरनेशनल वॉलीबॉल कोच राजेश कुमार सिंह को इस बात का मलाल है कि खिलाड़ियों को सरकारी स्तर पर जो सुविधा मिलनी चाहिए, वह नहीं मिली रही. यही वजह है कि खिलाड़ियों का खेल स्तर और वॉलीबॉल के प्रति रूझान घट रहा है. राजेश कुमार सिंह ने यह बात झारखंड में वॉलीबॉल की घटती लोकप्रियता और युवा खिलाड़ियों के उभर कर सामने नहीं आने के सवाल पर कही. उन्होंने कहा कि पहले के दौर में हर विभाग में खेल के नाम पर भर्तियां होती थी. बड़ी-बड़ी कंपनियां भी खेल कोटे में भर्तियां लेती थी. बीएसएल, टाटा, टिस्को, सीसीएल, पुलिस विभाग और भी अनेक कंपनियां थी जिससे युवाओं में खेल के प्रति ज्यादा रुझान देखने को मिलता था. लेकिन आज के दौर में खेल कोटे में नहीं के बराबर नौकरियां मिल रही है, जिससे युवा खेल में कम भागीदारी निभा रहे हैं. अफसोस की बात है कि खिलाड़ियों को नौकरी के तौर पर जो सुरक्षा मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पा रही है. वॉलीबॉल प्रतियोगिताओं के आयोजन पर उन्होंने कहा कि पहले एक सीजन में रांची में 14 से 15 प्रतियोगिताओं के आयोजन होते थे, लेकिन मौजूदा समय में इसकी संख्या काफी घट गई है. [caption id="attachment_550857" align="aligncenter" width="1200"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2023/02/1-8.jpg"

alt="" width="1200" height="1599" /> इंटरनेशनल वॉलीबॉल कोच राजेश कुमार सिंह शुभम संदेश से खास बातचीत करते हुए[/caption] आपको बता दें कि पिछले 23 साल में पहली बार झारखंड की टीम राष्ट्रीय प्रतियोगिता के क्वार्टर फाइनल में खेली है. इस प्रतियोगिता का आयोजन गुवाहाटी में हुआ. टीम में सेंट्रल और रेलवे से प्लेयर ज्यादा हैं. खिलाड़ियों को निखारने के लिए ज्यादा आयोजन कराने की आवश्यकता है, और खिलाड़ियों को नौकरी मुहैया कराने की भी जरूरत है. इसे भी पढ़ें-सुप्रीम">https://lagatar.in/supreme-court-rejected-the-petition-to-ban-bbc-said-this-is-a-completely-false-idea/">सुप्रीम

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1964 में ओलंपिक में शामिल हुआ

आज से 128 साल पहले जब मोरगन साहब ने बास्केटबॉल से अलग वॉलीबॉल लाया था, तो इस गेम की ओर सबका ध्यान गया.  क्योंकि बास्केटबॉल सब लोग नहीं खेल सकते थे. 1964 में इसे ओलंपिक में भी शामिल किया गया. इसके बाद इस खेल की लोकप्रियता बढ़ती गई. बाद में बीच वॉलीबॉल भी सामने आया. जिससे इस खेल की लोकप्रियता और ज्यादा बढ़ी. झारखंड की बात करें तो 2010 तक झारखंड महिला टीम अच्छा प्रदर्शन कर रही थी, उस दौर में रांची में साई का एक सेंटर हुआ करता था. बाद में यह सेंटर बंद हो गया. फिर महिलाओं के लिए और कोई वैक्ल्पिक व्यवस्था नहीं बची. जिससे महिलाएं वॉलीबॉल से दूर होने लगी. पुरूष टीम की बात करें तो उनका भी मिला-जुला प्रदर्शन देखने को मिला है. इन दिनों वॉलीबॉल से बहुत कम खिलाड़ी जुड़ते नजर आते हैं. सवाल पर राजेश सिंह ने कहा कि किसी भी खेल को खेलने के लिए खिलाड़ियों में प्रेरण और सुरक्षा की आवश्यकता होती है. यहां खिलाड़ी सब जूनियर स्तर तक खेलते हैं. फिर ड्रॉप आउट हो जाते हैं. वजह यह है कि खिलाड़ियों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है. इसे भी पढ़ें-ध्वनि">https://lagatar.in/hc-strict-on-noise-pollution-ban-on-loudspeaker-after-10-pm-instructions-to-ranchi-dc-ssp-and-municipal-commissioner/">ध्वनि

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अपना जीवन ही वॉलीबॉल हो गया है

राजेश सिंह अपने निजी जिंदगी को याद कर उदाहरण के तौर पर कहते हैं कि उन्हें उस दौर में 4 सरकारी नौकरी के ऑफर मिले थे. आज भी स्पोर्टस कोटे से नौकरी करने की बात भी उन्होंने कही. राजेश सिंह कहते हैं कि उनके लिए गर्व की बात है कि उन्होंने वॉलीबॉल को पूरे मन से खेला. 35 सालों से वॉलीबॉल से जुड़े राजेश सिंह कहते हैं कि अब तो उनका जीवन ही वॉलीबॉल हो गया है. इस दौरान वह थोड़े भावुक हो गए. फिर कहा कि जीवन में वॉलीबॉल के प्रति योजनाएं हैं जो भविष्य में नजर आएंगी. उदयीमान खिलाड़ियों को संदेश के तौर पर उन्होंने कहा कि वॉलीबॉल के खिलाड़ियों को मौका दिया जाए और उनमें जागरूकता फैलाई जाए. जो भी वॉलीबॉल से जुड़े हैं. उन्हें इस खेल के लिए कुछ न कुछ करना चाहिए. [wpse_comments_template]

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