- इस गाली-गलौज से कौन परेशान है और क्यों?

श्रीनिवास
गालियों या गाली-संस्कृति पर इन दिनों हो रही चर्चा का संदर्भ जंतर-मंतर पर जेन-जी, यानी कम उम्र की लड़कियों द्वारा धड़ल्ले से दी गयी गालियां हैं. इससे लोग हतप्रभ रह गये. उन लड़कियों की गाली गलौज की भाषा सुन कर मैं भी चौंका था, लेकिन बहुत नहीं, क्योंकि सोशल मीडिया पर, यूट्यूब पर आजकल स्टैंड अप कॉमेडी करने वाली कुछ लड़कियां बेहद अश्लील चुटकुले सुनाती हैं, ऑडियंस में भी लड़कियां होती हैं, और सब मजा लेती हैं!
ये कौन लोग हैं? आम तौर पर खाते पीते घरों के बच्चे हैं, हिंदी पट्टी के परिवारों के हैं, जिनमें अधिकतर मोदी और भाजपा को पसंद करते रहे होंगे. यह भी मान कर चलना चाहिए कि ये संघ की ‘विचारधारा’ से प्रभावित होंगे! 'संस्कारित' होंगे. उनकी भाषा ऐसी हो सकती है, यह इनको अनुमान नहीं था! भारत की ‘महान संस्कृति' पर इतराने वालों को तो चुभना ही था, जो दावा करते हैं कि वे सौ साल से भारतीय (पढ़ें हिंदू) समाज को संस्कारित करने का काम कर रहे हैं.
जंतर-मंतर या ऐसे किसी जमावड़े में ऐसी गलियां राहुल गांधी या अखिलेश यादव को दी जातीं, तो मेरे खयाल से इनको बुरा नहीं लगता या इतना बुरा नहीं लगता. इनको खुद से पूछना चाहिए कि हम कैसा संस्कार देते रहे अब तक? और कहां चूक हो गयी?
वैसे यह स्पष्ट हो गया है कि संघ इस 'गाली संस्कृति' को पूरा महत्व देता है, अपने तरीके से उसका इस्तेमाल भी करता है. इस जमात के ट्रोलरों की भाषा देख लीजिए, भाजपा आईटी सेल विपक्षी दलों व नेताओं के खिलाफ जो अभियान चलाता है, उसमें भी अभद्र भाषा की भरमार होती है.
भाजपा नेता माननीय रमेश विधूड़ी ने सांसद रहते हुए संसद में एक मुसलिम सांसद के लिए जिन विशेषणों (कटुआ, आतंकवादी आदि) का प्रयोग किया था, उसे पार्टी ने ‘गाली’ माना? कोई कार्रवाई नहीं की. बस विपक्ष और मीडिया के एक हिस्से द्वारा शोर मचाने पर 2024 के चुनाव में बेचारे का टिकट कट गया. लेकिन आज भी गाली उनका यूएसपी बना हुआ है. अभी एक ट्वीट में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा को 'छिनाल' बता दिया. हल्ला मचने पर ट्वीट डिलीट कर दिया, फिर से ट्वीट किया, जिसमें वह शब्द बदल दिया. मुझे नहीं लगता कि उनकी इस हरकत से पार्टी में उनकी 'प्रतिष्ठा' कम होगी.
भाजपा-मोदी और हिंदू राष्ट्र के समर्थकों, सड़कों पर ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने वाले युवाओं का संस्कार कैसा है, यह देखना हो तो सोशल मीडिया पर, फेसबुक पर, भाजपा-मोदी के आलोचकों के बारे में ये कैसी भाषा का प्रयोग करते हैं, इसको देखिए. मां-बहन की गाली तो आम है! कमेंट में या तो ‘जय श्रीराम’ या ‘हर हर मोदी’ या सीधे गाली! खुद शाखा से प्रशिक्षित प्रचारक रहे बड़े-बड़े जो नाम हैं- प्रधानमंत्री सहित- सार्वजनिक मंचों से बोलते हुए उनकी भाषा कैसी और कितनी मर्यादित होती है?
जब रमेश विधूड़ी ने संसद में गाली बकी थी तो क्या मोहन भागवत को चिंता हुई थी कि संघ से प्रेरित पार्टी का एक जनप्रतिनिधि कैसी भाषा बोल रहा है? नहीं. क्योंकि यह उनको सूट करता था, क्योंकि जिसको गाली दी जा रही थी, उसके पूरे समुदाय के प्रति हिंदुओं मे नफरत भरने का ही काम करते रहे हैं! मगर आज वही या उससे भी भद्दी गाली आपको पड़ने लगी तो बुरा लग रहा है. दरअसल, इनको यह देख कर झटका लगा कि जिन बच्चों के बारे में इनको भरोसा था कि उनको अपने हिसाब से ‘संस्कारित’ कर चुके हैं, वे तो कुछ और निकले!
गाजा में जो इसराइल ने जो किया, इसराइल और अमेरिका ने मिल कर ईरान में जो किया, उस पर ताली बजाने वाले युवा किस संस्कार का परिचय देते हैं? स्कूल पर हमला हो रहा है, छोटी-छोटी बच्चियां मारी गयी हैं और आप खुश हो रहे हैं कि ‘संपोले’ मारे गये! उनको ऐसा यह संस्कार किसने दिया? ‘कश्मीर फाइल्स’ और ‘छावा’ जैसी फिल्में देखने वाले बाहर निकल कर या हॉल में ही नफरती नारे लगाते हैं, ‘मारो मारो’ चिल्लाते हैं, यह संस्कार दिया है आपने! लेकिन उनमें से कुछ उस जहालत से बाहर निकल रहे हैं, कष्ट आपको इस बात से है.
इस्तीफा दे चुके धर्मेंद्र प्रधान ने सीजेपी को ‘दहशतगर्दों की बी टीम’ कहा, यह गाली नहीं है? उसी सीजेपी को, जिसके साथ केंद्र सरकार वार्ता कर रही है!
जंतर-मंतर पर कुछ ऐसे वाकये भी देखने को मिले, जहां एक लड़की हंस कर बता रही थी कि उसने अपने बॉयफ्रेंड से ब्रेकअप कर लिया, क्योंकि वह भाजपाई था! इसी तरह से एक लड़के ने घोषणा की कि मेरी गर्लफ्रेंड के मां-बाप भाजपा के नेता हैं, इसलिए मैं उससे अलग हो गया! एक लड़की ने तो अपने परिवार से ही रिश्ता खत्म करने की घोषणा कर दी, क्योंकि उसके मां-बाप मोदी समर्थक हैं! शायद यह मोहभंग है, और यही उनके लिए चिंता की बात है! इसीलिए इनको कुसंस्कारी, अर्बन नक्सल, देशद्रोही आदि कहा जा रहा है! अपने अनर्गल बयानों के लिए चर्चित एक महिला सांसद ने आंदोलन कर रहे युवाओं को गाली दी, गटर जेनरेशन कहा!
वैसे प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कभी मंच से कहा था कि वे रोज दो ढाई किलो गाली खाते हैं, मगर भगवान ने उनकी संरचना ऐसी बनायी है कि ये गालियां ऊर्जा में बदल जाती हैं! यदि यह सच है, तब तो गालियां उनके लिए अतिरिक्त ऊर्जा का स्रोत हैं. उनको और 'भक्तों' को तो इसके लिए गालीबाजों का आभार मानना चाहिए!
मैं गाली-गलौज का समर्थन नहीं करता, जिसमें थोड़ा भी विवेक है, नहीं कर सकता! पर सच यही है कि मैं जिस समाज में पला-बढ़ा हूं, वहां गालियों का आदान-प्रदान सहज है. हिंदुओं के बड़े तीर्थ बनारस की भाषा कैसी है, इसे प्रसिद्ध साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने बताया है. अपनी किताब 'काशी का अस्सी’ की भूमिका में ही लिख दिया था कि यह बनारस की 'राष्ट्रीय भाषा’ है, जिनको इससे कष्ट है, वे कृपया आगे न पढ़ें. प्रसिद्ध उपन्यास 'आधा गंव' में प्रयुक्त गालियों के बारे में पूछने पर लेखक राही मासूम रजा ने कहा था कि मैंने वही लिखा है, जो उस कथा के पात्र बोलते हैं.
मैंने एक बार हरिवंश जी से (जब वे 'प्रभात खबर' के संपादक थे) पूछा था- बनारस में होली के मौके पर जो जमावड़ा होता है, जिसमें तमाम सम्मानित लोग जुटते हैं, कहा जाता है कि उसमें अश्लील भाषा का प्रयोग होता है, यह कितना सच है? उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ कहा था- 'आपने जितना सुना है, कम सुना होगा.
सच यह भी है कि गाली-गाली में अंतर होता है! समर्थ कमजोर को गाली देना अपना अधिकार मानता है, तो कमजोर अपना क्रोध गाली देकर निकालता है! और खुद दूसरों को गाली देते रहे समर्थ लोगों को वह चुभ जाता है!
बनारस की गाली के पीछे किसी को अपमानित करने की मंशा नहीं होती, बस एक संस्कार बन गया है, वहां के लिए यही सहज है! पंजाबियों और हरियाणा वालों की जुबान पर गाली रहती है. बिहार भी बहुत पीछे नहीं होगा. मगर जंतर-मंतर की गाली अंदर के आक्रोश की अभिव्यक्ति भी थी! उस आक्रोश के कारणों को न समझ कर सिर्फ गाली पर चर्चा का कोई मतलब नहीं है.
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