: लंदन जैसे विकसित शहर की स्थापना में भारतीयों का भी योगदान- प्रो. चटर्जी अटेंडर के अभाव में युवक इलाज नहीं हो पा रहा था. स्थिति को देखते हुए पुतरु गांव के एक समाजसेवी मंगल कर्मकार ने निजी स्तर से पैसे देकर घुटिया सबर बस्ती के ही एक युवक को अटेंडर के रूप में खेसा सबर के साथ अस्पताल में रखा था. अब खेसा सबर स्वास्थ्य होकर सकुशल वापस घर लौटा आया है. उसका इलाज एक निजी अस्पताल में चल रहा था.
सरकार सबरों को बचाने में हो रही विफल
झारखंड के लुप्तप्राय आदिम जनजाति सबर खतरे में हैं. आंकड़े बताते हैं कि अधिकतम 45 वर्ष की उम्र के ही मरीज अंतिम अवस्था में अस्पताल पहुंचते हैं और इनमें से 50 फीसद मर जाते हैं. चिंता की बात यह कि अस्पताल में भर्ती होने वाले सबर में सबसे अधिक बच्चे, किशोर व युवा ही शामिल हैं। इस सबको देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि कहीं न कहीं सरकार सबरों को बचाने में विफल साबित हो रही है.
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