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रीजनल पार्टीज का गेम ओवर!

महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे), ओड़िशा में बीजद, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) व जद (यू) के बाद अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की जो गत बनी है, क्या वह यह बता रही है कि देश की राजनीति में रीजनल पार्टीज का गेम ओवर हो गया है. यानी क्षेत्रिय पार्टियों का समय खत्म होता जा रहा है. इससे पहले यूपी में बसपा, समाजवादी, दक्षिण में वाइएसआर, टीआरएस, पीडीपी, बिहार में एलजेपी, दिल्ली में आप के साथ देश ने यही सब देखा. 

 

क्या यह एक संदेश है कि भाजपा के साथ रहो या विपक्ष में आप रीजनल पार्टी हैं, तो आपका खत्म होना तय है. या यह संदेश है कि आप रीजनल पार्टी हैं, तो आपको भाजपा या कांग्रेस में से एक को चुनना होगा. एक साथ मस्त रहेंगे और दूसरे के साथ थोड़े त्रस्त.

 

राजनीति विश्लेषक अब यह मान रहे हैं कि रीजनल पार्टियों में एक अलग तरह की बीमारी है. उनके पास संगठन जैसा कुछ खास होता नहीं है. जो होता है, वह परिवार और दो-चार विश्वस्त लोग. 

 

रीजनल पार्टियां राज्य की अस्मिता, सम्मान के नाम पर खड़ी तो हो जाती हैं, लेकिन वह संवेदनशील शासन देने में विफल रह जाती है. ले देकर जनता को मिलता है आम जनता और मीडिया से दूर रहने वाला शासक और असंवेदनशील ब्यूरोक्रेट्स, जो हेरारकी तक की परवाह नहीं करता. बंगाल में यही चल रहा था, वसूली का गुंडा गिरोह, जिसे अभिषेक बनर्जी का अप्रत्यक्ष संरक्षण था.

 

ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय पार्टियों के शासन में यह सब नहीं होता. होता है, बल्कि बड़े पैमाने पर होता है. लेकिन वह कुछ इस तरह होता है कि आम जनता को पता नहीं चलता. शासन संवेदनशील दिखता है और सत्ता को एक अप्रत्यक्ष डर बना रहता है. 

 

विपक्षी पार्टियों के गठबंधन की बात करें, तो वह बनता ही है मौकापरस्ती की नींव पर. जैसे ही मौका मिलता है, कोई पार्टी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से अलग राह पकड़ लेती है. थोड़े-बहुत नफा-नुकसान के सवाल पर ही तलवारें निकाल ली जाती हैं. पश्चिम बंगाल और असम को ही देख लें विपक्षी पार्टियों का गठबंधन (इंडिया) कहीं नजर आया. सबकी अपनी डफली-अपना राग.

 

मीडिया पर यह सवाल उठते हैं कि वह भाजपा की गुलाम बन चुकी है. भाजपा के पक्ष में प्रचार करती है. लेकिन कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियों के शासन वाले राज्य में मीडिया को कौन सी आजादी मिली हुई है, इसका कोई उदाहरण पेश करने में रीजनल पार्टियां विफल साबित हुई है. बड़ा सवाल यह कि विपक्ष व रीजनल पार्टियां मीडिया को क्यों नहीं साध पाती. 

 

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