गांधी की कांग्रेस, राहुल की कांग्रेस
Dr. Pramod Pathak देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी आज विघटन की ओर अग्रसर है. देश और लोकतंत्र के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. वह पार्टी जिसका एक जमाने में कोई विकल्प नहीं था आज विकल्प तो क्या, विपक्ष बनने की स्थिति में भी नहीं दिख रही. गांधी की कांग्रेस और राहुल की कांग्रेस में यह फर्क है. ऐसा क्यों है इस पर चर्चा जरूरी है. कांग्रेस के भी लिहाज से और देश के भी लिहाज से. कांग्रेस के लिहाज से इसलिए कि वह पार्टी जिसने आजादी के 75 वर्षों में से करीब 60 वर्षों तक राज किया, आज इस कगार पर पहुंच गई है कि उसे विपक्षी पार्टी का भी दर्जा नहीं मिल रहा. देश के लिहाज से इसलिए कि एक मजबूत विपक्षी पार्टी का न होना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. सत्ता पर अंकुश न रहने से तानाशाही प्रवृत्ति बढ़ जाती है. सत्ता पर काबिज लोगों की मनमानी चलने लगती है और लोकतंत्र समाप्त हो जाता है. कांग्रेस को राष्ट्रीय चरित्र देने का श्रेय गांधीजी को: पहले गांधी के कांग्रेस की बात. भले ही कांग्रेस की नीव 1885 में एक विदेशी ए ओ ह्यूम द्वारा रखी गई हो, लेकिन कांग्रेस को कांग्रेस बनाने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को जाता है तो वह थे मोहनदास करमचंद गांधी. गांधी जी के अफ्रीका से भारत आने से पहले कांग्रेस एक अभिजात्य वर्ग के लोगों का समूह थी, जिसमें कुछ वकील और उद्योगपति शामिल थे. गांधी के आने के बाद ही कांग्रेस आम लोगों तक पहुंचने में सफल हो पाई. स्वयं गांधी ने ही कांग्रेस से जुड़ने के अपने शुरुआती दौर में गोखले के साथ बातचीत के क्रम में एक टिप्पणी की थी कि कुछ थोड़े से वकील और उद्योगपति भारत की जनता का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं. कांग्रेस को राष्ट्रीय चरित्र देने का श्रेय पूरी तरह से गांधी को दिया जा सकता है. गांधी के भारत आने से पहले कांग्रेस द्वारा चलाए गए अभियान मुख्य रूप से पत्र लेखन तक ही सीमित थे, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत को पत्रों के माध्यम से कांग्रेस अपना विरोध जताया करती थी. इसीलिए इतिहासकारों ने गांधी के पहले की कांग्रेस के कार्यों को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के संवैधानिक अध्याय की संज्ञा दी थी. सबसे बड़ा जन आंदोलन चलाने का श्रेय कांग्रेस को: सच कहा जाए तो वह आंदोलन का दौर ही नहीं था. निवेदन का दौर था. किंतु गांधी ने अपने दक्षिण अफ्रीका के अनुभव और संघर्ष से कांग्रेस को एक नई दिशा दी, एक धार दिया. गांधी के आने के बाद ही कांग्रेस एक जन आंदोलन का रूप ले सकी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की अगुवाई करने में सफल रही. मजे की बात यह थी कि गांधी कांग्रेस के सर्वमान्य नेता भले ही रहे, लेकिन उन्होंने कभी भी कांग्रेस पार्टी की सदस्यता नहीं ली थी. उन दिनों कांग्रेस पार्टी का सदस्यता शुल्क चार आने होता था. गांधी ने सीधा जनता से संबंध जोड़ा और उनके ही नेतृत्व में कांग्रेस आम लोगों तक पहुंच सकी और आम लोगों को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में सफल रही. इतिहास में शायद सबसे बड़ा जन आंदोलन चलाने का श्रेय कांग्रेस को ही जाता है. और ऐसा इसलिए हो सका कि गांधी ने आम लोगों से जुड़ने और आम लोगों का प्रतिनिधित्व करने को प्राथमिकता दी. वे कमांडो और गिरोह से नहीं घिरे रहते थे. आम लोगों से जुड़ने के लिए ही गांधी ने रेल की तृतीय श्रेणी में संपूर्ण भारत भ्रमण किया था. लोगों से जुड़कर ही, लोगों की समस्याएं समझ कर ही आप लोगों का नेतृत्व कर सकते हैं. कांग्रेस संघर्ष से निकला एक जन आंदोलन था: याद रहे कि यह वही गांधी थे जो दक्षिण अफ्रीका में प्रथम श्रेणी का टिकट लेकर यात्रा करना चाह रहे थे और उन्हें अंग्रेज टिकट परीक्षक ने कंपार्टमेंट से धक्के देकर निकाल दिया था. गांधी को महात्मा गांधी बनाने में इस घटना की बड़ी भूमिका रही. कांग्रेस संघर्ष से निकला एक जन आंदोलन था, जो बाद में राजनैतिक दल बना. लेकिन उसका जन आंदोलन का स्वरूप काफी दिनों तक बना रहा. यह गांधी की कांग्रेस थी, जो करीब 60 वर्षों तक भारत की सत्ता पर काबिज रही और विपक्ष के नाम पर उसका विकल्प ढूंढना मुश्किल था. यही फर्क है गांधी के कांग्रेस और राहुल के कांग्रेस में. आज कांग्रेस विपक्षी दल की मान्यता पाने के लिए भी संघर्षरत है. आम लोगों से कटी हुई है आज की कांग्रेस : गांधी का यह मानना था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस को विघटित कर देना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस की भूमिका उतने ही तक थी. दरअसल कांग्रेस सत्ता पाने के लिए नहीं, अपितु अंग्रेजी हुकूमत को सत्ता से हटाने के लिए बनी थी. सत्ता विरोध का एक हथियार था, जिसमें आम लोगों की संपूर्ण भागीदारी थी. आज की कांग्रेस, राहुल की कांग्रेस आम लोगों से कटी हुई है और इसे पुनर्गठित करना है तो एक गांधी सरीखा नेतृत्व ढूंढ़ना होगा. संघर्ष ,सादगी और साहस वाला नेतृत्व. जिससे आम लोग जुड़ सकें और जिसको अपना सकें. लोगों से कटकर नहीं बल्कि लोगों के कंधा से कंधा मिलाकर चलना होगा. वैसे आज की जमीनी सच्चाई यह है कि लोगों को कांग्रेस की जरूरत है और कांग्रेस को लोगों की. किंतु फिर भी यह नहीं हो रहा. इसके लिए गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है. सिर्फ भारत जोड़ो का नारा काफी नहीं होगा. इसके लिए ईमानदार प्रयास करने होंगे. कुछ नयी और कारगर रणनीति बनानी होगी. लोगों में असंतोष है, हताशा है, अनिश्चितता है. उन में आशा का संचार करना होगा. कर्मठता और जीवटता वाला नेतृत्व चाहिए: यह सब संभव तो है, लेकिन उसके लिए कर्मठता और जीवटता वाला नेतृत्व चाहिए. एक सूट बूट वाली सर्व शक्तिमान सरकार को एक धोती वाले कमजोर से दिख रहे व्यक्ति ने अपने चरित्र और प्रतिबद्धता की ताकत से परास्त किया था. आज उसी स्तर की प्रतिबद्धता और उतना ही पक्का चरित्र चाहिए. आमजन की पीड़ा समझने वाली समानुभूति पैदा करनी पड़ेगी. कांग्रेस खड़ी तो हो सकती है, लेकिन इसी शर्त पर. ट्विटर पर तूफान खड़ा करने से कुछ नहीं होगा. ताकत का मुकाबला त्याग से करना होगा. धन बल का मुकाबला जन बल से करना होगा. भय के माहौल को सत्य से परास्त करना होगा. गांधी यह सब कर पाए क्योंकि उन्होंने सुविधा को त्याग दिया था. प्रश्न यह है कि क्या यह सब आज के कांग्रेस के नेतृत्व का दावा करने वाले लोग कर पाएंगे? झूठ और कुप्रचार के दौर में खरा सत्य ही टिक सकता है. क्या राहुल की कांग्रेस यह सब कर पाएगी : भारतीय लोकतंत्र एक संक्रमण काल से गुजर रहा है जहां विपक्ष विघटित है. प्रगति और विकास से लेकर महंगाई और ईमानदारी की नई परिभाषाएं गढ़ दी जा रही हैं. जहां विकास के मापदंड का आधार टीवी चैनल तय करें, जहां आप की ईमानदारी इस बात पर निर्भर है कि आप किस पार्टी के साथ हैं, जहां वरिष्ठता की आयु जीवन प्रत्याशा से अधिक हो, जहां गरीबी की परिभाषा आंकड़ों से निर्धारित हो वहां आसान नहीं होगा खुद को साबित करना. क्या राहुल की कांग्रेस यह सब कर पाएगी? डिस्क्लेमर : लेखक स्तंभकार और आईआईटी -आइएसएम के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं, ये उनके निजी विचार हैं.

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