alt="" width="300" height="225" /> पांच महीने से भर्ती 64 वर्षीय गणेश[/caption] बिल्लू से मिलती जुलती ही कहानी बख्शीडीह रोड निवासी गणेश राम का है. 64 साल के गणेश बीते 5 महीने से से सदर अस्पताल में पड़े हैं. एक बेटी है,जो कभी-कभार आती है. पर उसकी माली हालत वैसी नहीं है कि वह अपने पिता को पनाह दे. सदर अस्पताल में कम से कम उसे दो वक्त की रोटी तो नसीब हो रही है. परिवार से कई बार किया गया संपर्क - उपाधीक्षक सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. उपेंद्र दास ने बताया कि परिवार से कई बार संपर्क किया गया, लेकिन घर ले जाने के नाम पर सभी हाथ खड़े कर लेते हैं. मामले में स्थानीय थाना और प्रशासनिक अधिकारियों से भी संपर्क किया गया बावजूद कोई कदम नहीं उठाया गया. डॉ.दास ने कहा कि परेशानी तब बढ़ जाती है, जब रोगियों की संख्या अधिक हो जाती है. अस्पताल में कौन रहना चाहता है. बिल्लू और गणेश अपने ही घरवालों के लिए बोझ हो गये तो गिरिडीह सदर अस्पताल ही उनका घर हो गया. घरवाले ना रोटी दे पाए, ना प्यार, सदर अस्पताल में कम से कम उन्हें रोटी तो नसीब हो रही है. लेकिन सवाल है कि आखिर कब तक...? आज नहीं तो कल अस्पताल से उन्हें बाहर जाना होगा. उसके बाद उन्हें फ़िर से बीमार होना होगा ? भारत जैसे देश में परिवार को जीवन का एक मजबूत आधार माना गया है. लेकिन धीरे-धीरे अब वो पारिवारिक मूल्य और मान्यताएं दरकने लगी हैं. और उन दरारों में बिल्लू और गणेश जैसे लोगों की ज़िंदगी झूलस रही है. ऐसे कई बिल्लू और गणेश हमारे सभ्य समाज में चुपचाप तिरस्कार के घुटन में जी रहे होंगे. यह">https://lagatar.in/giridih-disability-check-up-camp-organized-in-sadar-hospital-people-arrived-in-large-numbers/">यह
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