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गिरिडीह : जीना यहां…मरना यहां…इसके सिवा जाना कहां

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Abhay Verma Giridih : जब तक शरीर में ताकत थी, सबकुछ बच्चों के लिए झोंक दिया. और जब शरीर ने साथ देना छोड़ दिया तो बड़े हो चुके उन बच्चों ने ही उनसे मुंह फेर लिया. गिरिडीह के बिल्लू राम और गणेश की यही कहानी है. सदर अस्पताल ही बना घर, पर याद आता है घर बनियाडीह निवासी बिल्लू राम एक साल से सदर अस्पताल में ही ज़िंदगी काट रहे हैं. लकवाग्रस्त होने पर उन्हें सदर अस्पताल लाया गया था. महीनों पहले ही डॉक्टरों ने उन्हें फिट करार दे दिया. लेकिन शायद वो घरवालों के लिए अनफिट हैं. इसलिए सदर अस्पताल में करवटों में दिन रात गुज़ार रहे हैं. सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ उपेंद्र दास की माने तो बिल्लू को अब घर पर ही अपने के देखभाल की ज़रूरत है. लेकिन अपने अपनापन नहीं दिखा रहे. बिल्लू राम का भरा पूरा परिवार है. परिवार अपनापन जताने के लिए दो-दो सप्ताह बाद रात के अंधेरे मे अस्पताल में बिल्लू से मिलकर चला जाता है. और लाचार बिल्लू फ़िर से दो सप्ताह बाद के उसी अंधेरे के इंतज़ार में करवटें बदलता रहता है. [caption id="attachment_383280" align="alignnone" width="300"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/ganesh-300x225.jpg"

alt="" width="300" height="225" /> पांच महीने से भर्ती 64 वर्षीय गणेश[/caption] बिल्लू से मिलती जुलती ही कहानी बख्शीडीह रोड निवासी गणेश राम का है. 64 साल के गणेश बीते 5 महीने से से सदर अस्पताल में पड़े हैं. एक बेटी है,जो कभी-कभार आती है. पर उसकी माली हालत वैसी नहीं है कि वह अपने पिता को पनाह दे. सदर अस्पताल में कम से कम उसे दो वक्त की रोटी तो नसीब हो रही है. परिवार से कई बार किया गया संपर्क -   उपाधीक्षक सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. उपेंद्र दास ने बताया कि परिवार से कई बार संपर्क किया गया, लेकिन घर ले जाने के नाम पर सभी हाथ खड़े कर लेते हैं. मामले में स्थानीय थाना और प्रशासनिक अधिकारियों से भी संपर्क किया गया बावजूद कोई कदम नहीं उठाया गया. डॉ.दास ने कहा कि परेशानी तब बढ़ जाती है, जब रोगियों की संख्या अधिक हो जाती है. अस्पताल में कौन रहना चाहता है. बिल्लू और गणेश अपने ही घरवालों के लिए बोझ हो गये तो गिरिडीह सदर अस्पताल ही उनका घर हो गया. घरवाले ना रोटी दे पाए, ना प्यार, सदर अस्पताल में कम से कम उन्हें रोटी तो नसीब हो रही है. लेकिन सवाल है कि आखिर कब तक...? आज नहीं तो कल अस्पताल से उन्हें बाहर जाना होगा. उसके बाद उन्हें फ़िर से बीमार होना होगा ? भारत जैसे देश में परिवार को जीवन का एक मजबूत आधार माना गया है. लेकिन धीरे-धीरे अब वो पारिवारिक मूल्य और मान्यताएं दरकने लगी हैं. और उन दरारों में बिल्लू और गणेश जैसे लोगों की ज़िंदगी झूलस रही है. ऐसे कई बिल्लू और गणेश हमारे सभ्य समाज में चुपचाप तिरस्कार के घुटन में जी रहे होंगे. यह">https://lagatar.in/giridih-disability-check-up-camp-organized-in-sadar-hospital-people-arrived-in-large-numbers/">यह

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