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अलविदा दिशोम गुरू: एक युग का अवसान

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फैसल अनुराग

आदिवासियों की वह बुलंद आवाज जिसने भारत के 11 करोड़ लोगों के दुखों, आकांक्षाओं और उम्मीदों को स्वर दिया अनंत यात्रा की ओर प्रस्थान कर गया. आदिवासी प्रतिरोध आंदोलन के एक युग का यह अवसान है. झारखंडी आदिवासियों और आमजन की एक ऐसी आवाज जो पूरी प्रतिबद्धता के साथ झारखंडी मूल्यों, विचार, परंपरा और प्रतिरोध  की निरंतरता का वाहक था, झारखंडी जनगण को सशक्त बना कर विदा हो गया. 

शिबू सोरेन ने आदिवासी चेतना संसार की थाती भावी पीढ़ी को सौंप दी है. समाज के सर्वाधिक वंचित जन समुदाय की अपराजेय आवाज बनने की प्रक्रिया आसान नहीं रही है और ना ही यह सफर किसी बड़े पूंजी घराने से पोषित रही. जंगलों, खेत खलिहानों से हर कदम पर प्रतिरोध करते हुए झारखंड आंदोलन को सर्वव्यापी बना देना कोई मामूली बात नहीं रही है. 

एक ऐसे समय पर जब झारखंड आंदोलन पस्ती का शिकार हो गया था, नया आयाम देने का संघर्ष सामान्य परिघटना नहीं थी. सादगी और सहजता के साथ झारखंड की आवाज को बुलंद करना गुरूजी की पहचान रही है. झारखंडी अस्तित्व और अस्मिता को दिशोम गुरु ने न केवल नया तेवर दिया बल्कि संघर्ष का शांतिमय तरीका भी ईजाद किया. 

आदिवासी चेतना, प्रतिरोध स्वर, सामाजिक इतिहासबोध के सहारे राजनीति को प्रखर स्वरूप देने वाले नेताओं में अग्रणी शिबू सोरेन वास्तव में संताल हूल और मुंडा उलगुलान की विरासत को गति देने वाले प्रतीक हैं. एक ऐसा राजनेता जिसने झारखंडी सांस्कृतिक चेतना को नया तेवर प्रदान किया. जयपाल सिंह मुंडा और एनई होरो ने जिस झारखंडी अवधारणा को सृजित किया था, शिबू सोरेन यानी दिशोम गुरू ने उसे व्यापक फलक प्रदान किया.

शिबू सोरेन को आम लोगों ने दिशोम गुरू की उपाधि दिया, जिस तरह बिरसा मुंडा को धरती आबा का दिया था. 

दरअसल, आदिवासी समाज प्रतिरोध और निर्माण की दोहरी प्रक्रिया की चेतना से लैस है. आदिवासी समाज की विशिष्टता उसकी उस मूलभूत वैचारिक संरचना में अंतरनिहित है जो समानता, सहकार, सहयोग और सर्वानुमातिमूलक लोकतंत्र के आधार पर विकसित हुई है और झारखंड आंदोलन के लंबे  संघर्ष के दौरान उसे नयी चेतना प्रदान की गयी है. 

शिबू सोरेन और उनके साथियों ने संघर्ष के सहारे इसे नया तेवर दिया. यही कारण है कि आदिवासी समाज शिबू सोरेन में तिलका मंझी, सिदो-कानू, बुधु भगत और बिरसा मुंडा की विरासत को आगे बढ़ाने वाले नायक का प्रतिरूप देखता है.

गुरु जी ने  झारखंड आंदोलन काल में ही विकास के एक नए दर्शन की वकालत अपनी शैली में की थी. इससे उनका मकसद संतुलित और समन्वित विकास वाले झारखंड का नव निर्माण था. यह एक बड़ी चुनौती थी. यह एक दूरदर्शी नेता की गहरी सामाजिक समझ का परिचायक है. गुरुजी के लिए झारखंड राज्य बनने का मतलब एक समानतामूलक समाज का निर्माण का सपना जमीन पर उतरना रहा. 

विकास के नाम पर विस्थापन को किस तरह कम किया जा सकता है, सब के लिए खुशहाली लाने के लिए देशज संसाधनों का किस तरह उपयोग हो और इसकी आर्थिकी गढ़ने पर भी उनका जोर रहा. इसके साथ ही शिक्षा ओर स्वास्थ्य हर एक के लिए सुलभ बनाने की एक पूरी रणनीति का खाका आंदोलन के समय ही गुरू जी ने बना ली थी.

झारखंड आंदोलन में शिबू सोरन ने एक ऐसे हस्तक्षेप के साथ प्रवेश किया जो उनके किसी भी पूर्ववर्ती नेता नहीं नहीं किया था. यानी आदिवासियों और मूलवासियों को एक मंच पर लाने का महत्तर कार्य. यह हस्तक्षेप था सामाजिक सुधार के साथ आर्थिक सवालों पर आदिवासियों और मूलवासियों को गोलबंद करना. धनबाद के पास टुंडी के प्रयोग को से इस पूरी प्रवृति और प्रक्रिया को समझा जा सकता है, जहां एक ओर सूदखोरी मुक्ति और जमीन मुक्ति का सवाल था तो दूसरी ओर नशापान ओर अशिक्षा से मुक्ति का सवाल. 

सही अर्थो में यह प्रयोग वर्ग चेतना की वह भूमि थी जिसने झारखंड आंदोलन की वैचारिकता को नया स्वर दिया. उलगुलान के समय बिरसा मुंडा ने भी नशापान और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद किया था. शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखंड आंदोलन एक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में भी बदल गया और इसका व्यापक असर हुआ. 

दरअसल, झारखंड आंदोलन शिबू सोरेन, एके राय और बिनोद बिहारी महतो के साथ आने से एक जनमुक्ति अभियान में बदल गया. इसके साथ ही शिबू सोरेन ने झारखंड में व्यापक गोलबंदी बनाने में भी बड़ी भूमिका बनायी. इस कारण झारखंडी समाज के राजनीतकि स्वर में सभी जनसमुदायों का स्वर शामिल हुआ. इसे आदिवासी मूलवासी चेतना निर्माण के संदर्भ में भी देखा समझा जाता है.

यही कारण है कि शिबू सोरेन देश भर में आदिवासियों के बीच सम्मानित रहे है. जयपाल सिंह मुंडा के बाद गुरू जी को इस बात का श्रेय है कि देश भर के आदिवासियों के राजनीतिक महत्व को गरिमा दिलाया. हालांकि संसदीय राजनीति के अनेक उतार-चढ़ाव के बीच वे कुछ विवादों में भी उलझे, लेकिन संघर्ष की उनकी थाती इन विवादों पर हमेशा हावी रही. 

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