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सामुदायिक वन पट्टा तो मिला, लेकिन संसाधनों पर मालिकाना हक नहीं – ग्रामसभा

Pravin Kumar Garhwa: सामुदायिक वन पट्टे की मांग झारखंड में वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) के लागू होने के बाद तेज हो गई थी. ग्राम सभा स्तर पर इस कानून के तहत पट्टे के आवेदन भी अंचल कार्यालय में जमा किए गए थे. ग्राम सभाओं को सामुदायिक पट्टे तो मिल गए, लेकिन अब भी गढ़वा जिले के 56 ग्राम सभाओं को निर्गत पट्टों में वन प्रबंधन के अधिकार से वंचित रखा गया है. इसे लेकर ग्रामीण गोलबंद होने लगे हैं. सामाजिक कार्यकर्ता जेम्म का कहना है कि सामुदायिक वन संसाधनों पर ग्राम सभाओं का सदियों से मालिकाना हक रहा है. गांव के लोग वन संसाधनों की संरक्षा, पुनर्जीवित करने, परिरक्षित करने और प्रबंधन करते आ रहे हैं. यही कारण है कि भारत सरकार ने अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासियों (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम की धारा 3 (1) (झ) में पारंपरिक रूप से संरक्षण और परीक्षण करने का अधिकार दिया है. लेकिन जिले के 7 प्रखंडों के 56 ग्राम सभाओं को इस अधिकार से वंचित रखा गया है. जेम्म कहते हैं कि जनवरी में सामुदायिक वन पट्टे के तहत मिले अधिकार को प्राप्त करने के लिए पारंपरिक अगुओं की बैठक हुई. यह बैठक बड़गढ़ प्रखंड के गड़िया गांव में वन अधिकार संघ के बैनर तले आयोजित की गई थी. आदिवासी मामलों के जानकार सुनील मिंज ने कहा कि पारंपरिक ग्राम सभा को कानून ने अब गांव सरकार का दर्जा प्रदान किया है. ग्राम सभाओं को पेसा अधिनियम 1996 के तहत असीमित अधिकार दिए गए हैं, जिसके अंतर्गत ग्राम सभाएं विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका निभाएंगी. उन्होंने कहा कि विधायी शक्ति के तहत गांव के विकास और भाषा-संस्कृति के लिए स्थानीय स्तर पर नियम बनाए जा सकते हैं. कार्यपालिका के तहत वे बनाए गए नियमों और योजनाओं का क्रियान्वयन कर सकेंगे और यदि उक्त नियमों का पालन नहीं होता, तो ग्राम न्यायालय के द्वारा फैसले किए जाएंगे. चिनिया प्रखंड की सामाजिक कार्यकर्ता कविता सिंह खरवार ने हाल के दिनों में वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण के नाम पर ट्रेंच खुदाई, पिट खुदाई जैसे कार्यों का ग्राम सभा से प्रस्ताव पारित कर विरोध करने की अपील की. उन्होंने कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि वन विभाग बिना ग्राम सभा से पारित योजनाओं को जबरन थोपने का प्रयास कर रहा है. विभाग का यह कृत्य पूर्णतया असंवैधानिक है. इसे ग्राम सभाओं को हर हाल में रोकना चाहिए. वहीं साहित्यकार ज्योति लकड़ा ने ग्राम सभाओं से अपील की कि वन विभाग द्वारा वन अधिकार कानून के विरुद्ध गांव में गठित वन सुरक्षा समितियों को तत्काल ग्राम सभा से प्रस्ताव पारित कर भंग करने की वकालत की. इसके स्थान पर कानून सम्मत वन अधिकार समिति का गठन कर सरकार के संबंधित विभागों को लिखित में सूचित करने की पहल करने की बात कही. गढ़वा जिले के पारंपरिक नेताओं का मानना है कि अबुआ दिशुम, अबुआ सरकार के होते हुए भी रोजगार के लिए युवा वर्ग बाहर पलायन करने को विवश हैं, जिससे मानव तस्करी में तेजी आ रही है. गांव का सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई ताना-बाना विकृत हो रहा है, जिसे ग्रामसभा को सशक्त करके रोका जाना जरूरी है. प्रमंडलीय वनाधिकार संघ के संयोजक माणिकचंद कोरवा कहते हैं कि बड़गढ़ प्रखंड के गड़िया गांव में हुई बैठक में ग्राम सभा ने वन अधिकार संघ के बैनर तले आंदोलन की घोषणा की है, जिसमें आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ कानूनी लापरवाही को लेकर बड़गढ़ प्रखंड से रंका अनुमंडल के सात प्रखंडों होते हुए पैदल मार्च कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा. यह मार्च जिला मुख्यालय पहुंचकर अनिश्चितकालीन धरने और प्रदर्शन में तब्दील हो जाएगा. मार्च के दौरान जगह-जगह नुक्कड़ सभा, जन सभा, वृत्तचित्र प्रदर्शन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पर्चे, पोस्टर आदि के जरिए लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी दी जाएगी. इस अनिश्चितकालीन धरने में अलग-अलग गांव से प्रत्येक दिन न्यूनतम 30 आंदोलनकारी शामिल रहेंगे. इसे भी पढ़ें -डोनाल्ड">https://lagatar.in/donald-trump-is-strict-18-thousand-indians-without-valid-documents-are-facing-the-threat-of-deportation/">डोनाल्ड

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