Ranchi: गोपनीय सूचनाओं के आदान-प्रदान से लेकर पुलिसकर्मियों के मूवमेंट और आपात स्थिति में तत्काल संदेश पहुंचाने के लिए बनाए गए झारखंड पुलिस के वायरलेस विभाग की हालत लगातार खराब है. कभी पुलिस संचार व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इस विभाग में आज न पर्याप्त अधिकारी-कर्मचारी हैं और न ही जरूरत के मुताबिक संसाधन. विभाग में विभिन्न रैंक के कुल 1990 पद स्वीकृत हैं, जबकि वर्तमान में DG Wireless, DIG, SP Wireless समेत करीब 541 अधिकारी-कर्मचारी ही कार्यरत हैं.
सबसे गंभीर स्थिति कर्मियों की कमी है. वर्ष 1989 के बाद न तो एकीकृत बिहार के समय और न ही झारखंड बनने के बाद वायरलेस विभाग में नियमित नियुक्ति हुई. यानी करीब 37 वर्षों में विभाग में एक भी नई नियुक्ति नहीं हुई. इसका सीधा असर विभाग की कार्यक्षमता पर पड़ा है.
2550 वायरलेस सेट की कमी
वायरलेस सेट की उपलब्धता भी विभाग की बड़ी समस्या है. पुलिस को करीब 9550 से अधिक वायरलेस सेट की जरूरत है, जबकि विभाग के पास करीब 7000 सेट ही उपलब्ध हैं. इस हिसाब से करीब 2550 वायरलेस सेट की कमी है. ऐसे में सभी इकाइयों और पुलिसकर्मियों तक जरूरत के मुताबिक संचार सुविधा पहुंचाना चुनौती बना हुआ है.
वायरलेस विभाग में ऑपरेटर के 1078 स्वीकृत पदों के विरुद्ध सिर्फ 400 ही कार्यरत हैं. करीब 678 पद खाली हैं. DSP रैंक के 9 पद स्वीकृत हैं, इसके विरुद्ध सिर्फ एक डीएसपी की पोस्टिंग है. 8 पद रिक्त हैं. इंस्पेक्टर के 43 स्वीकृत पदों के मुकाबले सिर्फ 18 ही कार्यरत हैं.
विभाग की तकनीकी शाखा की स्थिति भी बेहतर नहीं है. ऑपरेशनल SI के 242 पदों में से 110 और टेक्निकल ASI के 19 पदों में से 9 ही भरे हुए हैं. वहीं LC टेक्निकल के पद पर कोई कर्मी कार्यरत नहीं है. जिस विभाग का काम ही आधुनिक संचार तकनीक को संभालना है, उसी विभाग में तकनीकी पदों का खाली रहना व्यवस्था पर बड़ा असर डाल रहा है.
लो बैंड वायरलेस को लेकर उठे थे सवाल
एकीकृत बिहार के समय वायरलेस विभाग को हाई बैंड फ्रिक्वेंसी के वायरलेस सेट उपलब्ध कराए जाते थे. झारखंड बनने के बाद वर्ष 2003-04 में विभाग ने लो बैंड के वायरलेस सेट खरीदने का फैसला लिया. उस समय जिलों में पदस्थापित कई पुलिस अधीक्षकों ने इस व्यवस्था को लेकर सवाल भी उठाए थे.
जानकारी के मुताबिक एक समय ऐसी शिकायतें सामने आयी थीं कि लो बैंड वायरलेस सेट पर होने वाली बातचीत को नक्सली सुन लेते थे. इसके बाद वायरलेस सेट की खरीद को लेकर कमीशनखोरी के आरोप भी सामने आए थे.
आरोप था कि जिस कंपनी की सलाह पर वायरलेस सेट खरीदने का फैसला लिया गया, उसी कंपनी से जुड़े लोगों की दूसरी कंपनी से सेट की खरीद की गयी. हालांकि इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय किए जाने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई और मामला आगे नहीं बढ़ सका. इसके बाद विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के वायरलेस विभाग से दूरी बनाने की बात भी सामने आती रही.
दूसरे राज्य डिजिटल संचार की ओर, झारखंड पुराने ढर्रे पर
एक तरफ झारखंड पुलिस का वायरलेस विभाग मैनपावर और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है, वहीं दूसरे राज्यों में पुलिस संचार व्यवस्था को डिजिटल और आधुनिक तकनीक से लगातार मजबूत किया जा रहा है. गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय संचार मानकों से जुड़े दस्तावेज में मुंबई पुलिस के लिए APCO Phase-II Radio Trunking System और DMR Tier-II आधारित VHF नेटवर्क का उल्लेख है.
केरल पुलिस भी एनालॉग व्यवस्था से डिजिटल कम्युनिकेशन की ओर बढ़ रही है. केरल पुलिस की आधिकारिक जानकारी के अनुसार राज्य में DMR Tier-3 डिजिटल मोबाइल रेडियो व्यवस्था लागू करने की दिशा में काम किया गया है और त्रिशूर में इसका पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया था. वर्ष 2026 में राज्यव्यापी वायरलेस नेटवर्क के लिए DMR Tier-II के डिजिटलीकरण और क्रियान्वयन से जुड़ी निविदा भी जारी की गयी.
टेट्रा सिस्टम में डूब गये करीब 4.50 करोड़
वायरलेस व्यवस्था को आधुनिक बनाने की कोशिश झारखंड में भी हुई, लेकिन कई योजनाएं अपेक्षित परिणाम तक नहीं पहुंच सकीं. वर्ष 2007-08 में रांची और जमशेदपुर शहर की पुलिसिंग तथा वीआईपी मूवमेंट के लिए पारंपरिक वायरलेस सेट की जगह TETRA सिस्टम शुरू करने का फैसला लिया गया था. दोनों शहरों में TETRA टावर और कंट्रोल रूम तैयार करने के लिए करीब 10 करोड़ रुपये की योजना बनायी गयी. रांची में पहाड़ी मंदिर और जमशेदपुर में दलमा हिल पर TETRA टावर लगाया गया. रांची में सिस्टम शुरू भी हुआ, लेकिन जमशेदपुर में यह व्यवस्था शुरू नहीं हो सकी. इससे सरकार के करीब 4.50 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद अपेक्षित उपयोग नहीं हो सका.
इस मामले में किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय किए जाने की जानकारी सामने नहीं आयी है. इससे जुड़ी कुछ फाइलें अब भी DGP स्तर पर लंबित बतायी जाती हैं.
रांची में शुरू किए गए थे TETRA सिस्टम के मेंटेनेंस का काम नोकिया-सीमेंस कंपनी को दिया गया था. विभाग ने मेंटेनेंस का काम कराया, लेकिन भुगतान समय पर नहीं होने के कारण वर्ष 2015 में कंपनी ने काम छोड़ दिया. इसके बाद आधुनिक संचार व्यवस्था को लेकर किया गया यह प्रयोग भी सवालों के घेरे में आ गया.
यानी 37 वर्षों से नियुक्ति नहीं, जरूरत के मुकाबले करीब 3000 वायरलेस सेट की कमी, तकनीकी पद खाली और करोड़ों की आधुनिक परियोजनाएं भी अपने मुकाम तक नहीं पहुंच सकीं. ऐसे में पुलिस संचार की रीढ़ माने जाने वाले वायरलेस विभाग की बदहाली को लेकर अब गंभीरता से समीक्षा की जरूरत है.
विभाग में मैन पावर की स्थिति
| पद | स्वीकृत पद | कार्यरत |
| एसपी | 01 | 01 |
| सीनियर, डीएसपी | 01 | 01 |
| डीएसपी, ऑपरेशनल | 04 | 00 |
| डीएसपी, टेक्निकल | 02 | 00 |
| डीएसपी, सामान्य | 00 | 01 |
| इंस्पेक्टर, ऑपरेशनल | 33 | 17 |
| इंस्पेक्टर, टेक्निकल | 09 | 01 |
| एसआई, ऑपरेशन | 242 | 110 |
| एसआई, टेक्निकल | 19 | 00 |
| एएसआई, ऑपरेशनल | 468 | 00 |
| एएसआई, टेक्निकल | 30 | 00 |
| स्टेनो एएसआई | 02 | 00 |
| एलसी ऑपरेटर | 1078 | 400 |
| एलसी टेक्निकल | 26 | 00 |
| हवलदार | 04 | 00 |
| हवलदार चालक | 01 | 04 |
| सिपाही | 20 | 01 |
| चालक सिपाही | 06 | 00 |
| एलडीसी | 04 | 04 |
| एकाउंटेंट | 02 | 01 |
| फिटर | 06 | 00 |
| हेल्पर | 31 | 00 |
