- - अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहे हैं सवाल.
- - जांच टीम ने प्राथमिकी दर्ज करने की अनुशंसा की थी.
- - आखिर कौन बचा रहा है आरोपियों को?
- - प्रशासनिक हलकों में लाखों रुपये के लेन-देन की चर्चा.
Gumla : गुमला जिले के चैनपुर थाना क्षेत्र के छतरपुर गांव में जमीन की कथित फर्जी रजिस्ट्री का मामला अब प्रशासनिक लापरवाही, ढिलाई और संदिग्ध चुप्पी का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है. एक ओर पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, तो दूसरी ओर जांच पूरी होने और कार्रवाई की अनुशंसा किए जाने के बावजूद गुमला जिला प्रशासन का हाथ पर हाथ धरे बैठना पूरे सिस्टम की नीयत और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.
जानकारी के मुताबिक चैनपुर प्रखंड के ग्राम छतरपुर निवासी लोचनाथ रोतिया ने गुमला उपायुक्त को आवेदन देकर आरोप लगाया था कि मौजा छतरपुर, थाना चैनपुर अंतर्गत खाता संख्या 25, 26 और 27 की जमीन की रजिस्ट्री कथित रूप से फर्जी तरीके से कर ली गई. आरोप है कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया, बिना वास्तविक सहमति और बिना पूरी राशि का भुगतान किए ही कुछ लोगों ने गलत दस्तावेज और संदिग्ध हस्ताक्षरों के आधार पर जमीन अपने नाम करा ली. शिकायतकर्ता का कहना है कि पूरी प्रक्रिया में नियम-कानून को ताक पर रखकर सुनियोजित तरीके से जमीन हड़पने की साजिश रची गई.

तीन सदस्यीय जांच टीम ने की थी अनुशंसा.
इस पूरे मामले में संध्या देवी (पति रितेश कुमार गुप्ता), लक्ष्मी देवी (पति लोचनाथ रोतिया), रंजीत कुमार (पिता महेश प्रसाद), मुकेश कुमार सिंह (पिता जयराम सिंह) तथा रंजीत महतो (पिता स्व. ननक महतो) सहित अन्य लोगों के नाम सामने आए हैं.
शिकायतकर्ता का आरोप है कि जमीन के हस्तांतरण में नियमों की खुलेआम अनदेखी की गई और प्रभाव तथा पहुंच का इस्तेमाल कर रजिस्ट्री करा ली गई. स्थानीय लोगों का भी कहना है कि यदि प्रभावशाली लोगों का साथ न होता, तो इस तरह की फर्जी रजिस्ट्री संभव ही नहीं थी.
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने 14 नवंबर 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था. इस समिति में अपर समाहर्ता को अध्यक्ष बनाया गया, जबकि चैनपुर अंचल पदाधिकारी और भूमि सुधार उप समाहर्ता को सदस्य बनाया गया. समिति को पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया था. जांच के दौरान दोनों पक्षों को कई बार नोटिस जारी कर बुलाया गया, उनके बयान दर्ज किए गए और जमीन से जुड़े दस्तावेजों की बारीकी से जांच की गई.
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से अनियमितता और प्रक्रियागत खामियों की पुष्टि की है. इतना ही नहीं, रिपोर्ट में यह भी साफ तौर पर कहा गया है कि बिना संबंधित अधिकारियों और कर्मियों की मिलीभगत के इस तरह फर्जी तरीके से जमीन की रजिस्ट्री कराना संभव नहीं है.
जांच टीम ने संबंधित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और सख्त कार्रवाई करने की अनुशंसा भी की है. इसके बाद गुमला जिला प्रशासन ने चुप्पी साध ली. ना प्राथमिकी दर्ज की गई और न ही पीड़ित को जमीन वापस कराने की कार्यवाही. पीड़ित परिवार का कहना है कि जिस जमीन पर उनके परिवार की रोजी-रोटी टिकी हुई है, उसी जमीन को फर्जी तरीके से छीन लिया गया और अब न्याय पाने के लिए उन्हें बार-बार अधिकारियों के सामने गुहार लगानी पड़ रही है.
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